इक हमारी सहर नहीं होती!

रात आ कर गुज़र भी जाती है,
इक हमारी सहर नहीं होती|

इब्न ए इंशा

तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा!

ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा,
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा|

साहिर लुधियानवी

उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है!

अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह,
उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

रात है नींद है कहानी है!

कुछ न पूछो ‘फ़िराक़’ अहद-ए-शबाब,
रात है नींद है कहानी है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

ये दर्द जागता क्यूँ है!

कहानियों की गुज़रगाह पर भी नींद नहीं,
ये रात कैसी है ये दर्द जागता क्यूँ है|

राही मासूम रज़ा

तुम्हें मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी!

चराग़ों की लौ से सितारों की ज़ौ तक,
तुम्हें मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी|

बशीर बद्र

शाम-ए-बे-सहर फिर भी!

शब-ए-फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र,
कि कट ही जाएगी ये शाम-ए-बे-सहर फिर भी|

फ़िराक़ गोरखपुरी

ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला!

सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत,
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला|

अहमद फ़राज़

चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता!

घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी,
मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता|

वसीम बरेलवी