तुझमें कितनी गहराई है!

देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को,
पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है|

क़तील शिफ़ाई

रिश्ता था जब सराब के साथ!

तो फिर बताओ समंदर सदा को क्यूँ सुनते,
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ|

शहरयार

तक़दीर में ख़तरा भी नहीं!

कोई कहता था समुन्दर हूँ मैं
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं,
ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ
अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं|

कैफ़ी आज़मी

समंदर से जा मिले!

क़तरा अब एहतिजाज* करे भी तो क्या मिले,
दरिया जो लग रहे थे समंदर से जा मिले|

(*विरोध, आपत्ति)
वसीम बरेलवी

मैं तो मगर प्यासा नहीं!

जा दिखा दुनिया को मुझको क्या दिखाता है ग़ुरूर,
तू समुंदर है तो है, मैं तो मगर प्यासा नहीं|

वसीम बरेलवी

अपना मुकद्दर लेके आया है!

कोई इक तिशनगी कोई समुन्दर लेके आया है,
जहाँ मे हर कोई अपना मुकद्दर लेके आया है|

राजेश रेड्डी

वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ!

‘कैफ’ पैदा कर समंदर की तरह,
वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ|

कैफ़ भोपाली

और समुंदर क़रीब था!

बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे,
घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था|

अंजुम रहबर

सहरा भी है समुंदर भी!

ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी,
वो मेरी तिश्ना-लबी किसके नाम करता है।

वसीम बरेलवी