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जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेक़रार!

आज मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक अत्यंत मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे मुकेश जी और लता जी ने 1974 में रिलीज़ हुई फिल्म – फिर कब मिलोगी के लिए गाया था और इस गीत में प्रत्येक पंक्ति के बाद जो गूंज रह जाती है, वह विशेष प्रभाव छोड़ती है| मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत को मुकेश जी और लता जी ने, आर डी बर्मन साहब के संगीत निर्देशन में अनोखे अंदाज़ में गाया है|

 

 

लीजिए गीत के बोलों को सुनकर उस अनोखी अदायगी को याद कीजिए-

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

 

दूर ज़ुल्फों की छाँव से, कहता हूँ ये हवाओं से,
उसी बुत की अदाओं के, अफ़साने हज़ार|
वो जो बाहों मे मचल जाती, हसरत ही निकल जाती,
मेरी दुनिया बदल जाती, मिल जाता करार|

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

 

अरमां है कोई पास आए, इन हाथों मे वो हाथ आए,
फिर खवाबों की घटा छाये, बरसाए खुमार|
फिर उन्ही दिन रातों पे, मतवाली मुलाक़ातों पे,
उलफत भारी बातों पे, हम होते निसार|

 

कहीं करती होगी वो मेरा इंतज़ार,  जिसकी तमन्ना में फिरता हूँ बेकरार|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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बड़ी भूल हुई अरे हमने, ये क्या समझा, ये क्या जाना!

आज मोहम्मद रफी साहब का गाया एक बेहद खूबसूरत गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1967 मे रिलीज़ हुई फिल्म- ‘पत्थर के सनम’ के लिए मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लिखा था और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में रफी साहब ने बेहद खूबसूरती और फीलिंग्स की साथ गाया है|

 

 

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत गीत-

 

पत्थर के सनम, तुझे हमने मोहब्बत का खुदा जाना,
बड़ी भूल हुई अरे हमने, ये क्या समझा, ये क्या जाना|

 

चेहरा तेरा दिल में लिए चलते रहे अंगारों पे,
तू हो कहीं, सजदे किये, हमने तेरे रुखसारो के|
हमसा ना हो, कोई दीवाना|

 

सोचा था ये बढ़ जाएगी, तनहाईयाँ जब रातों की, 
रस्ता हमें दिखलाएगी, शम-ए-वफ़ा उन हाथों की|
ठोकर लगी, तब पहचाना|

 

ऐ काश के होती खबर, तूने किसे ठुकराया है,
शीशा नहीं, सागर नहीं, मंदिर सा एक दिल ढाया है|
ता-आसमां, है वीराना|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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