तुम हमें प्यार करो या ना करो!

स्वर्गीय शैलेन्द्र जी का लिखा एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी कहा है शैलेन्द्र जी फिल्म नगरी में विशाल बैनरों से जुड़े रहकर भी अंत तक एक जनकवि बने रहे|
यह गीत 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘कैसे कहूँ’ के लिए लता मंगेशकर जी ने अपने सुमधुर स्वर में गाया था| इसका मधुर संगीत तैयार किया था सचिन देव बर्मन जी ने|

लीजिए प्रस्तुत है, शैलेन्द्र जी का लिखा और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी का गाया यह भावपूर्ण गीत-

तुम हमें प्यार करो या ना करो,
हम तुम्हें प्यार किये जायेगें
चाहे किस्मत में ख़ुशी हो के ना हो,
गम उठाकर ही जिए जायेगें
तुम हमें प्यार करो या ना करो…

हम नहीं वो जो गमे-इश्क से घबरा जाएं
हो के मायूस जुबां पर कोई शिकवा लाये
चाहे कितना ही बढ़े दर्दे जिगर,
अपने होंठो को सिये जायेंगे
तुम हमें प्यार करो या ना करो…..

तुम सलामत हो तो हम चैन भी पा ही लेंगे
किसी सूरत से दिल की लगी लगा ही लेंगें
प्यार का जाम मिले या ना मिले,
हम तो आंसू भी पिए जायेंगें
तुम हमें प्यार करो या ना करो…


तोड़ दी आस तो फिर इतना ही एहसान करो
दिल में रहना जो ना चाहो तो नज़र ही में रहो
ठेस लगती जो है दिल पर तो लगे,
गम उठाकर ही जिए जायेगें
तुम हमें प्यार करो या ना करो


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तुम न जाने किस जहाँ में खो गये!

गायक सोनू निगम का एक इंटरव्यू सुन रहा था, जिसमें उन्होंने स्वर्गीय लता मंगेशकर जी के एक गीत को मिसाल के रूप में याद किया था| मुझे लगा कि आज इसी गीत को शेयर कर लेना चाहिए| यह गीत है फिल्म- ‘सज़ा’ से जिसे लिखा था – साहिर लुधियानवी जी ने और इसका संगीत तैयार किया था स्वर्गीय सचिन देव बर्मन साहब ने|

लीजिए प्रस्तुत है, फिल्म- सज़ा के लिए साहिर लुधियानवी साहब का लिखा और सचिन देव बर्मन जी के संगीत निर्देशन में लता जी द्वारा लाजवाब अंदाज़ में गाया गया यह भावपूर्ण गीत-



तुम न जाने किस जहाँ में खो गये
हम भरी दुनिया में तनहा हो गये|
तुम न जाने किस जहाँ में …

एक जां और लाख ग़म,
घुट के रह जाये न दम
आओ तुम को देख लें,
डूबती नज़रों से हम
लूट कर मेरा जहाँ
छुप गये हो तुम कहाँ – २
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ
तुम न जाने किस जहाँ में …

मौत भी आती नहीं,
रात भी जाती नहीं
दिल को ये क्या हो गया,
कोई शै भाती नहीं
लूट कर मेरा जहाँ,
छुप गये हो तुम कहाँ – २
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ
तुम न जाने किस जहाँ में …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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अगर मुझे न मिली तुम!

आज साहिर लुधियानवी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘काजल’ के लिए महेंद्र कपूर जी और आशा भौंसले जी ने गाया था| इसका मधुर संगीत तैयार किया था रवि जी ने|
लीजिए प्रस्तुत है, फिल्म- काजल के लिए साहिर लुधियानवी साहब का लिखा और रवि जी के संगीत निर्देशन में महेंद्र कपूर जी और आशा भौंसले जी का गाया यह भावपूर्ण गीत-

अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा
कि दिल की राह से होकर ख़ुशी नहीं गुज़री

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि सिर्फ़ उम्र कटी ज़िंदगी नहीं गुज़री

फ़िज़ा में रंग नज़ारों में जान है तुमसे
मेरे लिए ये ज़मीं आसमान है तुमसे
ख़याल-ओ-ख़्वाब की दुनिया जवान है तुमसे,
अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि ख़्वाब ख़्वाब रहे बेकसी नहीं गुज़री
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा
कि दिल की राह से होकर ख़ुशी नहीं गुज़री

बड़े यक़ीन से मैंने ये हाथ माँगा है
मेरी वफ़ा ने हमेशा का साथ माँगा है
दिलों की प्यास ने आब-ए-हयात माँगा है
दिलों की प्यास ने आब-ए-हयात माँगा है

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि इंतज़ार की मुद्दत अभी नहीं गुज़री

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी

कि सिर्फ़ उम्र कटी ज़िंदगी नहीं गुज़री|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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हाल-चाल ठीक-ठाक है!


आज गुलज़ार साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गुलज़ार साहब शायरी में प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं, एक अनूठे अंदाज़ में वो अक्सर अपनी बात कह जाते हैं|

गुलज़ार साहब का यह गीत फिल्म ‘मेरे अपने’ के लिए किशोर कुमार साहब और मुकेश जी के स्वरों में फिल्माया गया था और इसके लिए संगीत दिया था सलिल चौधरी जी ने| लीजिए प्रस्तुत है गुलजार साहब का यह तंज़ से भरा गीत –

हाल-चाल ठीक-ठाक है
सब कुछ ठीक-ठाक है|
बी.ए. किया है, एम.ए. किया
लगता है वह भी ऐंवे किया
काम नहीं है वरना यहाँ
आपकी दुआ से सब ठीक-ठाक है|

आबो-हवा देश की बहुत साफ़ है
क़ायदा है, क़ानून है, इंसाफ़ है,
अल्लाह-मियाँ जाने कोई जिए या मरे
आदमी को खून-वून सब माफ़ है|

और क्या कहूं?
छोटी-मोटी चोरी, रिश्वतखोरी
देती है अपा गुजारा यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है|


गोल-मोल रोटी का पहिया चला
पीछे-पीछे चाँदी का रुपैया चला,
रोटी को बेचारी को चील ले गई
चाँदी ले के मुँह काला कौवा चला|

और क्या कहूं?
मौत का तमाशा, चला है बेतहाशा
जीने की फुरसत नहीं है यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है
हाल-चाल ठीक-ठाक है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तो कितना अच्छा होता!

आज शैलेन्द्र जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी मेरे अत्यंत प्रिय फिल्मी गीतकार हैं, जिनको मैं फिल्मों का जनकवि भी कहता हूँ| आज का यह गीत 1961 में रिलीज हुई फिल्म- ‘ससुराल’ कि लिए लिखा गया था और इसको शंकर जयकिशन की जोड़ी के संगीत निर्देशन में, मुकेश जी और लता जी ने बड़े खूबसूरत अंदाज में गाया है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल:

अपनी उल्फ़त पे ज़माने का न पहरा होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता|
प्यार की रात का कोई न सवेरा होता
तो कितना अच्छा होता|

पास रहकर भी बहुत दूर बहुत दूर रहे,
एक बन्धन में बँधे फिर भी तो मज़बूर रहे,
मेरी राहों में न उलझन का अँधेरा होता,
तो कितना अच्छा होता|

दिल मिले, आँख मिली, प्यार न मिलने पाए,
बाग़बाँ कहता है दो फूल न खिलने पाएँ,
अपनी मंज़िल को जो काँटों ने न घेरा होता,
तो कितना अच्छा होता|


अजब सुलगती हुई लकड़ियाँ हैं जग वाले,
मिलें तो आग उगल दें, कटें तो धुआँ करें
अपनी दुनिया में भी सुख चैन का फेरा होता
तो कितना अच्छा होता|
अपनी उल्फ़त पे …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मेरे इश्क़ का सितारा!

भारतीय फिल्म जगत के तीन प्रमुख पुरुष गायकों में से एक स्वर्गीय मोहम्मद रफी साहब का एक दर्द भरा गीत आज शेयर कर रहा हूँ| रफी-मुकेश-किशोर ये एक ऐसी त्रिवेणी थे जिसने भारतीय फिल्म संगीत पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है| वैसे इनके अलावा भी मन्ना डे, हेमंत कुमार, स्वयं सचिन देव बर्मन जी आदि-आदि अनेक गायक थे|

आज मैं रफी साहब का एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ| रफी साहब की रेंज ऐसी लाजवाब थी जो उनको एक बहुत ऊंचा स्थान गायकी के क्षेत्र में दिलाती है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस रफी साहब का एक दर्द भरा गीत, जिसे फिल्म- ‘दो बदन’ के लिए शकील बदायुनी साहब ने लिखा था, रवि साहब ने इसका संगीत तैयार किया था और रफी साहब ने इस गीत में अपनी वाणी के माध्यम से भरपूर दर्द उंडेल दिया था, लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल:

रहा गर्दिशों में हरदम
मेरे इश्क़ का सितारा
कभी डगमगायी कश्ती,
कभी खो गया किनारा|

कोई दिल का खेल देखे,
कि मुहब्बतों की बाज़ी
वो क़दम क़दम पे जीते,
मैं क़दम क़दम पे हारा|

ये हमारी बदनसीबी
जो नहीं तो और क्या है
कि उसी के हो गये हम,
जो न हो सका हमारा|


पड़े जब ग़मों के पाले,
रहे मिट के मिटनेवाले
जिसे मौत ने न पूछा,
उसे ज़िंदगी ने मारा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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हमने अपना सब कुछ खोया!

आज फिल्म- ‘सरस्वतीचन्द्र’ के लिए इंदीवर जी का लिखा एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ जिसे मुकेश जी ने अपने अनूठे अंदाज़ में गाया था| फिल्म- सरस्वतीचन्द्र के लिए कल्याणजी आनंदजी द्वारा संगीतबद्ध किए गए कई गीत काफी प्रसिद्ध हुए थे, जिनमें – ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’, ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश‘ भी शामिल हैं|

मुकेश जी को विशेष रूप से ऐसे दर्द भरे गीतों के लिए जाना जाता है , यद्यपि उन्होंने मस्ती भरे गीत भी बहुत गाये हैं, लेकिन उनकी पहचान दर्द भरे गीतों से ज्यादा बनी है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मुकेश जी के द्वारा गाये गए इस मधुर गीत के बोल:

हमने अपना सब कुछ खोया
प्यार तेरा पाने को,
छोड़ दिया क्यों प्यार ने तेरे
दर-दर भटकाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

वो आँसू जो बह नहीं पाए,
वो बातें जो कह नहीं पाए,
दिल में छुपाए फ़िरते हैं अब,
घुटकर मर जाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

उसकी रहे तू जिसकी हो ली,
तुझको मुबारक़ प्यार की डोली,
बैठ गए हम ग़म की चिता पर,
ज़िन्दा जल जाने को|
प्यार तेरा पाने को
हम ने अपना …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मेरे साजन हैं उस पार!

फिल्म- ‘बंदिनी’ के लिए शैलेन्द्र जी का लिखा एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ जिसे नूतन जी और अशोक कुमार जी पर फिल्माया गया था| शैलेन्द्र जी के लिखे इस भाव भरे गीत के लिए संगीत और स्वयं अपना स्वर दिया था स्वर्गीय सचिन देव बर्मन जी ने| बर्मन दा के स्वर में यह गीत आज भी हमारे मन में गूँजता है और फिल्म का वह दृश्य भी याद आ जाता है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस अनूठे गीत के बोल:

ओ रे माझी ! ओ रे माझी ! ओ ओ मेरे माझी !

मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूँ इस पार
ओ मेरे माझी, अबकी बार, ले चल पार, ले चल पार
मेरे साजन हैं उस पार…

मन की किताब से तू, मेरा नाम ही मिटा देना
गुन तो न था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना
मुझे आज की बिदा का…
मुझे आज की बिदा का मर के भी रहता इन्तज़ार
मेरे साजन…

मत खेल जल जाएगी, कहती है आग मेरे मन की
मत खेल…
मत खेल जल जाएगी, कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की मैं संगिनी हूँ साजन की
मेरा खींचती है आँचल…
मेरा खींचती है आँचल मन मीत तेरी हर पुकार
मेरे साजन हैं उस पार
ओ रे माझी ओ रे माझी ओ ओ मेरे माझी
मेरे साजन हैं उस पार…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तो मुश्किल होगी!

 एक बार फिर से आज मैं हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी का एक बहुत प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत फिल्म- ‘दिल ही तो है’ के लिए यह गीत साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा था और इसका संगीत रोशन साहब ने तैयार किया था|  

लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल, जो आज भी हमारे दिल में गूंजते है:

तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी|

अब अगर मेल नहीं है तो जुदाई भी नहीं
बात तोड़ी भी नहीं तुमने बनाई भी नहीं,
ये सहारा भी बहुत है मेरे जीने के लिये
तुम अगर मेरी नहीं हो तो पराई भी नहीं,
मेरे दिल को न सराहो तो कोई बात नहीं
गैर के दिल को सराहोगी, तो मुश्किल…

तुम हसीं हो, तुम्हें सब प्यार भी करते होंगे
मैं जो मरता हूँ तो क्या और भी मरते होंगे,
सब की आँखों में इसी शौक़ का तूफ़ां होगा
सब के सीने में यही दर्द उभरते होंगे,
मेरे ग़म में न कराहो तो कोई बात नहीं
और के ग़म में कराहोगी तो मुश्किल…


फूल की तरह हँसो, सब की निगाहों में रहो
अपनी मासूम जवानी की पनाहों में रहो,
मुझको वो दिन न दिखाना तुम्हें अपनी ही क़सम
मैं तरसता रहूँ तुम गैर की बाहों में रहो,
तुम जो मुझसे न निभाओ तो कोई बात नहीं
किसी दुश्मन से निभाओगी तो मुश्किल…

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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ऐ मेरे दिल-ए-नादान

आज मैं स्वर सम्राज्ञी, कोकिल कंठी- सुश्री लता मंगेशकर जी का गाया एक अमर गीत आपको, उसके लिखित स्वरूप के माध्यम से याद दिला रहा हूँ, आपको इस दर्द भरे गीत का स्मरण अवश्य होगा, जिसे असद भोपाली जी ने लिखा था और रवि जी के संगीत निर्देशन में लता जी द्वारा बहुत पहले गाये गए इस गीत की स्वर लहरी आज भी हमारे मानस में गूँजती है|

लीजिए प्रस्तुत हैं लता मंगेशकर जी द्वारा फिल्म- ‘टावर हाउस’ के लिए गाये गए इस गीत के बोल –

ऐ मेरे दिल-ए-नादान
तू ग़म से न घबराना,
एक दिन तो समझ लेगी
दुनिया तेरा अफ़साना|
ऐ मेरे दिल-ए-नादान …

अरमान भरे दिल में
ज़ख्मों को जगह दे दे
भड़के हुए शोलों को
कुछ और हवा दे दे,
बनती है तो बन जाए
ये ज़िन्दगी अफ़साना|
ऐ मेरे दिल-ए-नादान …


फ़रियाद से क्या हासिल
रोने से नतीजा क्या,
बेकार हैं ये बातें
इन बातों से होगा क्या,
अपना भी घडी भर में
बन जाता है बेगाना
ऐ मेरे दिल-ए-नादान …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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