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बदली क्या जाने है पागल, किसी के मन का मोर!

अपने प्रिय गायक मुकेश जी के अमर गाने शेयर करने के क्रम में, आज मैं 1966 में रिलीज़ हुई फिल्म- लाल बंगला का यह गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत को लिखा है- इंदीवर जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- उषा खन्ना जी ने|


गीत के बोल पढ़ने पर यही खयाल आता है कि ये छोटा सा गीत और इसकी याद, इसकी छाप कितनी लंबी है, जो मन से धुंधली ही नहीं हो पाती| गीत में उपमा भी बहुत सुंदर दी गई, ऐसे प्रेमी के लिए, जिसकी प्रेमिका को मालूम ही नहीं कि वह उसको चाहता है|

लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

चाँद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर,
वो बेचारा दूर से देखे,
करे न कोई शोर|
चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

दूर से देखे, और ललचाए,
प्यास नज़र की बढ़ती जाए|
बदली क्या जाने है पागल,
किसी के मन का मोर|

चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

साथ चले तो साथ निभाना,
मेरे साथी भूल न जाना|
मैंने तुम्हारे हाथ में दे दी,
अपनी जीवन डोर|

चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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