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किसी से हाय दिल को लगा के!

आज फिर से अपने प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा मानना है की मुकेश जी का गाया लगभग हर गीत अमर है| अपनी आवाज का दर्द जब वे गीत में पिरो देते थे, तब चमत्कार ही हो जाता था|


आज का यह गीत फिल्म- बारात से है, गीत के बोल लिखे हैं मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इस गीत का संगीत तैयार किया था, चित्रगुप्त जी ने, यह गीत वैसे अजित जी पर फिल्माया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है यह नायाब गीत-

मुफ्त हुए बदनाम
किसी से हाय दिल को लगा के,
जीना हुआ इल्जाम
किसी से हाय दिल को लगा के|
मुफ्त हुए बदनाम|


गए अरमान ले के
लुटे लुटे आते हैं,
लोग जहां में कैसे
दिल को लगाते हैं|
दिल को लगाते हैं,
अपना बनाते हैं,
हम तो फिर नाकाम,
किसी से हाय दिल को लगा के,
मुफ्त हुए बदनाम|


समझे थे साथ देगा,
किसी का सुहाना ग़म
उठी जो नज़र तो देखा
तनहा खड़े हैं हम,
तनहा खड़े हैं हम,
दिन भी रहा है कम|

रस्ते में हो गयी शाम,
किसी से हाय दिल को लगा के,
मुफ्त हुए बदनाम|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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बदली क्या जाने है पागल, किसी के मन का मोर!

अपने प्रिय गायक मुकेश जी के अमर गाने शेयर करने के क्रम में, आज मैं 1966 में रिलीज़ हुई फिल्म- लाल बंगला का यह गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत को लिखा है- इंदीवर जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- उषा खन्ना जी ने|


गीत के बोल पढ़ने पर यही खयाल आता है कि ये छोटा सा गीत और इसकी याद, इसकी छाप कितनी लंबी है, जो मन से धुंधली ही नहीं हो पाती| गीत में उपमा भी बहुत सुंदर दी गई, ऐसे प्रेमी के लिए, जिसकी प्रेमिका को मालूम ही नहीं कि वह उसको चाहता है|

लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

चाँद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर,
वो बेचारा दूर से देखे,
करे न कोई शोर|
चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

दूर से देखे, और ललचाए,
प्यास नज़र की बढ़ती जाए|
बदली क्या जाने है पागल,
किसी के मन का मोर|

चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

साथ चले तो साथ निभाना,
मेरे साथी भूल न जाना|
मैंने तुम्हारे हाथ में दे दी,
अपनी जीवन डोर|

चाँद को क्या मालूम,
चाहता है उसे कोई चकोर|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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