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कोरोना संकट- जनता, सरकार और विपक्ष!

आज एक बार फिर से मैं कोरोना संकट और लॉक डाउन के अनुभव के बारे में बात कर रहा हूँ| मैं वैसे पणजी, गोवा में रहता हूँ लेकिन लॉक-डाउन की पूरी अवधि बंगलौर में गुज़री है| लगे हाथ यहाँ के एक विशेष अनुभव का भी ज़िक्र कर दूँ| बंगलौर के हेगड़े नगर में एक विशाल रिहायशी कॉम्प्लेक्स में रह रहा हूँ, 17वीं मंज़िल पर और लॉक-डाउन के दौरान 17वीं मंज़िल से नीचे नहीं उतरा हूँ| हाँ तो एक विशेष अनुभव जिसका मैं ज़िक्र कर रहा था, वो यह कि हमारी सोसायटी में, दिन में सामान्यतः 20-25 बार बिजली जाती है, कुछ ही देर में वापस आ जाती है, शायद ‘बैक अप’ के कारण, परंतु इन्टरनेट जाता है तो उसके आने में अधिक टाइम लग जाता है| होता यह है कि कई बार जब रात में बिजली जाती है तो यह सोचकर संतोष होता है कि बिजली विभाग वाले अभी भी काम कर रहे हैं!

 

 

खैर मैं बात कर रहा था भारतवर्ष में लॉक डाउन के अनुभव के बारे में| हमारे देश ने एक सच्चे जन नायक के नेतृत्व में लॉक डाउन का प्रारंभ किया तथा क्रमशः इसके विभिन्न चरणों में हम इस महा संकट का मुक़ाबला कर रहे हैं| मोदी जी परिस्थितियों के संबंध में मुख्य मंत्रियों और विशेषज्ञों की सलाह लेने के बाद आगामी कदमों का निर्णय लेते हैं तथा समय-समय पर जनता के साथ एक सच्चे जन-नायक, एक अभिभावक की तरह संवाद करते हैं| परंतु उनके राजनैतिक विरोधी तो स्वाभाविक रूप से उनमें एक तानाशाह को ही देखते हैं, क्योंकि मोदी जी के कारण ही जनता ने उन्हें कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है|

लॉक डाउन लागू होने के समय यह आवश्यक था कि जो जहां है, वहीं रहे और हम इस बीच चिकित्सा व्यवस्था और अन्य आवश्यक ढांचे का निर्माण कर सकें, तब तक संक्रमण अधिक न फैल पाए और हम इसमें व्यापक रूप से सफल हुए हैं, इसका प्रमाण अनेक बड़े देशों के मुक़ाबले हमारी स्थिति देखकर समझा जा सकता है|

कुछ लोग शायद ये कह सकते हैं कि हमारा वर्तमान नेतृत्व कोरोना के खतरे के बारे में पहले से नहीं जानता था, इसलिए वह परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद ही उनका उपाय खोजता है| शायद कोई राहुल गांधी जैसा महाज्ञानी और त्रिकालदर्शी नेता होता तो वह कोरोना को यहाँ बिलकुल पनपने ही नहीं देता| खैर मैं इस विषय में अधिक चर्चा नहीं करना चाहूँगा!

आज हम कोरोना संकट से निपटने की दृष्टि से बेहतर स्थिति में हैं और हमें धीरे-धीरे सावधानी के साथ सामान्य स्थितियाँ बहाल करने की ओर आगे बढ़ना है| इस बीच प्रवासी मजदूरों की घर वापसी का एक बड़ा संकट आया| इस संकट में कुछ स्थानों पर विपक्षी सरकारों द्वारा न केवल प्रवासी मजदूरों पर ध्यान न दिया जाना अपितु उनको वापस जाने के लिए उकसाना भी शामिल था|

इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि क्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर के रूप में कार्य करते हैं| इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इन दो प्रदेशों में लंबे समय तक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियों ने शासन किया है, जिनके पास केवल जातिवादी राजनीति थी, यह हिसाब था कि किनको ‘चार जूते’ मारने हैं| विकास तो उनका एजेंडा था ही नहीं, बस कुछ जाति और संप्रदायों को साथ लेकर उनको सत्ता में बने रहना था| वे चाहे यू पी में मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव हों या बिहार में चारा घोटाले के महानायक- लालू प्रसाद यादव हों|

मैं आशा करता हूँ कि यूपी और बिहार की वर्तमान सरकारें ऐसी व्यवस्था करेंगी कि इन प्रदेशों से मजदूरों का पलायन भविष्य में कम से कम हो| क्योंकि वैसे तो एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए जाना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी संख्या में लोग विदेशों में भी जाते हैं|

अंत में एक प्रसंग याद आ रहा है, लालू प्रसाद जी के जमाने के बिहार का| मैं उन दिनों जमशेदपुर के पास, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में काम करता था, जो अब झारखंड में हैं, उस समय बिहार में ही था, क्योंकि झारखंड राज्य बाद में बना था| हाँ तो हिंदुस्तान कॉपर की माइंस और कारखाने के बीच 8 किलोमीटर लंबी सार्वजनिक सड़क थी, जो जर्जर हालत में थी| उस कंपनी की तरफ से बिहार सरकार को पत्र लिखकर इस बात की अनुमति मांगी गई कि वे अपने खर्च पर उस सड़क की मरम्मत कर दें| इसके उत्तर में तब की बिहार सरकार से अनेक शर्तें लगाई गईं, जैसे कि सड़क पर पूरा अधिकार सरकार का रहेगा, सरकार कुछ खर्च नहीं करेगी और एक शर्त यह भी कि सरकार का एक इंजीनियर कंपनी का मेहमान बनकर काम को सुपरवाइज़ करेगा| हिंदुस्तान कॉपर प्रबंधन द्वारा यह शर्त स्वीकार नहीं की गई कि घोटालेबाज सरकार का प्रतिनिधि उनके काम को सुपरवाइज़ करे, उसमें अनावश्यक अड़ंगे लगाए और इस प्रकार वह काम नहीं हुआ|

फिर से, कोरोना संकट के बारे में बात करते हुए इतना ही कहूँगा कि हम इस अभूतपूर्व संकट का पूरी हिम्मत और विश्वास के साथ मुकाबला कर रहे हैं, और हमे विश्वास है कि हम अवश्य सफल होंगे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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