गूँगी ही सही, गाती तो है!

एक खँडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है|

दुष्यंत कुमार

इतना दर्द कहाँ से आया!

गीत है या फ़रियाद किसी की, नग़मा है या दिल की तड़प,
इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झंकारों में।

नक़्श लायलपुरी

फिर दर्द कोई बोने का!

जो फ़स्ल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो,
कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का|

जावेद अख़्तर

किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में!

जाने किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में,
दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में|

गुलज़ार

इक दर्द से दो-चार होगा!

वो निकला है फिर इक उम्मीद लेकर,
वो फिर इक दर्द से दो-चार होगा|

राजेश रेड्डी

गम छुपाने के लिए भी!

हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं,
गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग|

क़तील शिफ़ाई

मेरे इश्क़ का सितारा!

भारतीय फिल्म जगत के तीन प्रमुख पुरुष गायकों में से एक स्वर्गीय मोहम्मद रफी साहब का एक दर्द भरा गीत आज शेयर कर रहा हूँ| रफी-मुकेश-किशोर ये एक ऐसी त्रिवेणी थे जिसने भारतीय फिल्म संगीत पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है| वैसे इनके अलावा भी मन्ना डे, हेमंत कुमार, स्वयं सचिन देव बर्मन जी आदि-आदि अनेक गायक थे|

आज मैं रफी साहब का एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ| रफी साहब की रेंज ऐसी लाजवाब थी जो उनको एक बहुत ऊंचा स्थान गायकी के क्षेत्र में दिलाती है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस रफी साहब का एक दर्द भरा गीत, जिसे फिल्म- ‘दो बदन’ के लिए शकील बदायुनी साहब ने लिखा था, रवि साहब ने इसका संगीत तैयार किया था और रफी साहब ने इस गीत में अपनी वाणी के माध्यम से भरपूर दर्द उंडेल दिया था, लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल:

रहा गर्दिशों में हरदम
मेरे इश्क़ का सितारा
कभी डगमगायी कश्ती,
कभी खो गया किनारा|

कोई दिल का खेल देखे,
कि मुहब्बतों की बाज़ी
वो क़दम क़दम पे जीते,
मैं क़दम क़दम पे हारा|

ये हमारी बदनसीबी
जो नहीं तो और क्या है
कि उसी के हो गये हम,
जो न हो सका हमारा|


पड़े जब ग़मों के पाले,
रहे मिट के मिटनेवाले
जिसे मौत ने न पूछा,
उसे ज़िंदगी ने मारा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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किस्मत में ईनाम नहीं होता!

हँस- हँस के जवां दिल के, हम क्यों न चुनें टुकडे़,
हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता|

मीना कुमारी

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है!

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है,
उनकी आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं |

ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी