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कैसा मौसम है ये!

आज हम ऐसे समय में चल रहे हैं जिसकी न किसी ने पहले कल्पना की होगी और निश्चित रूप से किसी ने इसकी कामना तो नहीं ही की होगी| जी हाँ कोरोना की महामारी का यह काल, पूरी मानव जाति को इसने त्रस्त करके रखा है| सब यही सोचते रहते हैं कि कब यह दौर समाप्त होगा, कब हम पहले की तरह अपनी ज़िंदगी जी पाएंगे|


हम पहले फिल्मों आदि में देखते थे कि किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों के चेहरे कुछ अलग तरह के होते हैं, या जैसा ‘पेपा पिग’ आदि में हम देखते हैं, आज इंसानों की हालत कुछ वैसी ही हो गई है|


मैं अब गोवा में रहता हूँ (यद्यपि फिलहाल बंगलौर में हूँ)| गोवा जैसे अनेक नगर और राज्य तो ऐसे हैं जिनकी आमदनी का मुख्य स्रोत ही पर्यटन है| लेकिन फिलहाल जहां अर्थव्यवस्था पर अनेक गंभीर संकट आए हैं, वहीं पर्यटन पर तो शायद इस महामारी की मार सबसे ज्यादा पड़ी है|


ऐसे में कवि बिहारी जी की एक सतसई याद आ गई, जिसमें वह प्रेमी नायक द्वारा सिर्फ अपने नयनों से ही की जाने वाली विभिन्न अभिव्यक्तियों का बहुत सुंदर चित्रण कराते हैं –


कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात॥


इस सतसई के प्रसंग को याद करके ये खयाल आया कि जब प्रेमी-प्रेमिका नयनों के माध्यम से ही ये सारे संप्रेषण, ये अभिव्यक्ति करते हैं, तब वे भले ही कोई शब्द न बोलते हों, परंतु उनके होंठ, उनकी नासिका, उनके गाल आदि भी कुछ योगदान उनके इस संप्रेषण में करते हैं, जैसे गालों में गड्ढे पड़ जाना, जैसे कहते हैं सुर्ख लाल हो जाना आदि| मतलब ऐसी बॉडी लैंग्वेज़, जिसका संबद्ध उनके चेहरे से ही है| आज मुह पर मास्क लगाकर, जबकि केवल आँखें ही दिखाई देती हैं, आँखों से ही किया जाने वाला, ये संप्रेषण कुछ और मुश्किल हो जाता न बिहारी जी!


कहते हैं न- ‘बरबादियों का जश्न मनाता चला गया’| तो इस तरह की बातें सोचकर ही हम कोरोना से कह सकते हैं कि ऐसी मुसीबत हमने पहले नहीं देखी है, लेकिन हम मनुष्य, हम भारतवासी इसका सामना करने के लिए तैयार हैं| एक तरह से हमारे सक्रिय जीवन-काल से यह अवधि, शायद कुल मिलाकर 7-8 महीने की, कम हो गई है| हम आशा करते हैं कि तब तक कोरोना वेक्सीन के कारण और हमारे सम्मिलित प्रयासों के बल पर इस दुष्ट दानव का अंत हो जाएगा|


सामाजिकता की सारी गतिविधियों को, सारे आयोजनों को इस दुष्ट महामारी ने ध्वस्त करके रख दिया है| कई ऐसी घटनाएँ हुईं कि जरा सी लापरवाही बहुत महंगी पड़ गई| जैसे एक विवाह में दूल्हा कहीं से बीमारी लेकर आ गया था और वैवाहिक आयोजन के माध्यम से बहुत सारे लोगों को अपने साथ लेकर चला गया| इसलिए इस माहौल में बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखने की ज़रूरत है| यह समय बहादुरी दिखाने का बिलकुल नहीं है| कहते हैं न कि ‘दिल की बाज़ी, जो हारा- वही जीता’ इसी तरह इस दुष्ट महामारी का मुक़ाबला धैर्य और सावधानी के साथ करना होगा| इसको चुनौती देने से काम नहीं चलेगा|

यही कामना है कि मानव समुदाय इस संकट पर शीघ्र विजय प्राप्त करे और हम सभी फिर से अपना जीवन पूर्णता के साथ जी सकें| जहां मन हो वहाँ आने-जाने का मौसम फिर से लौटकर आए|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोरोना के असहाय शिकार!

आज कोरोना के खतरे के बाद देश में बनी परिस्थितियों की चर्चा कर रहा हूँ| कितनी भयंकर विपदा यह संपूर्ण मानव जाति पर आई है, ये आप सभी जानते हैं| चीन से शुरू होकर कोरोना के इस दैत्य ने इटली, अमरीका आदि में जैसी तबाही मचाई है, शुक्र है हम अभी वैसी स्थिति में नहीं हैं और ईश्वर ने चाहा तो वैसा यहाँ नहीं होगा, लेकिन जो हुआ है वह भी बहुत डराने वाला है| आज इन परिस्थितियों पर ही कुछ चर्चा कर लेते हैं|

 

 

समाचार चैनल ‘टीवी 18’ के एक एंकर हैं – प्रतीक त्रिवेदी जो ‘भैया जी कहिन’ नाम से चर्चा का एक लोकप्रिय कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं| शाम के समय प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम पहले आउटडोर लोकेशन से सीधे प्रसारित होता था, जिनमें एक लोकेशन अक्सर कनॉट प्लेस की होती थी| काफी भीड़ एकत्रित होती थी इस कार्यक्रम में! अब तो लोगों को इकट्ठा करने वाले कार्यक्रम बंद ही हैं| बहस के कार्यक्रम भी अब स्काइप आदि के माध्यम से चर्चा द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं|

हाँ तो ‘भैया जी’ ने भी जहां तक मुझे याद है 2-3 दिन तो स्टूडिओ से कार्यक्रम प्रस्तुत किए, लेकिन उसके बाद उन्होंने बाहर लोकेशन्स पर जाना शुरू कर दिया| एक लंबी डंडी वाला माइक अब वे इस्तेमाल करते हैं, जिससे दूर खड़े होकर प्रश्न पूछे जा सकते हैं| अब भी वे बाज़ारों, बैंकों, अस्पतालों आदि में जाकर प्रश्न पूछते हैं और बहस के लिए जबकि उनके मेहमान स्काइप के माध्यम से जुडते हैं, वे बाहर की ही किसी लोकेशन पर होते हैं और वहाँ से ही कार्यक्रम का संचालन करते हैं| अक्सर कनॉट प्लेस का उनका शॉट दिखाया जाता है, जिसमें वे कहते हैं – यहाँ पर ही हजारों लोगों की भीड़ जमा होती थी| कुछ स्थितियाँ अतीत की ऐसी होती हैं, जिनकी कमी हमें खलती है| हमें भरोसा है की वे परिस्थितियाँ फिर से वापस लौटेंगी|

लॉक डाउन बढ़ता ही जा रहा है, जरूरत तो यही है कि पूरे अनुशासन के साथ, सभी मिलकर इस स्थिति का सामना करें, परंतु सभी के लिए ऐसा करना संभव नहीं है| कुछ लोगों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना भी संभव नहीं है और जबकि प्रदेश की सरकारों द्वारा ऐसा दावा तो किया जा रहा है कि सभी के भोजन और आर्थिक सहायता का प्रबंध किया जा रहा है, लेकिन ये सरकारी प्रयास कितने प्रभावी होते हैं, ये विचारणीय है|

एक समस्या जो भारत में विशेष रूप से है, वह है प्रवासी मजदूरों की| अन्य शहरों में पढ़ने वाले छात्रों को तो पिछले दिनों उनके घरों तक पहुंचाने का काम किया गया और अब मजदूरों को उनके मूल स्थान पर ले जाने का काम भी शुरू किया गया है| मजदूरों को वापस ले जाने का ये काम एक तो आसान नहीं है, ऐसे मजदूर असंख्य हैं| इसके अलावा अब जरूरत इस बात की भी है कि लॉक डाउन को धीरे-धीरे सावधानी के साथ खोला जाए| और जहां ये मजदूर अभी हैं, वहाँ ये रोजगार के लिए आए हैं और रोजगार इनको यहाँ ही मिल पाएगा| इन परिस्थितियों में आवश्यकता इस बात की है कि इनका हौसला बढ़ाया जाए, आवश्यक सहायता सुनिश्चित की जाए और इनको यथाशीघ्र कमाई का साधन उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि अभी लौट जाने पर जल्दी ही इनको फिर वापस आने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा|

महाराष्ट्र में रेल पटरी पर हुई 16 मजदूरों की मृत्यु एक हृदय विदारक घटना थी और हमको इस विषय में सोचने के लिए विवश करती है कि इन प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करने और इनको सहायता और परामर्श प्रदान करने और इनका हौसला बढ़ाने की आवश्यकता है|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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आज सड़क के जीव उदास हैं!

आज बाबा नागार्जुन जी की एक प्रसिद्ध कविता याद आ रही है- ‘अकाल और उसके बाद’। इस कविता में अकाल के प्रभाव को बड़े सुंदर तरीके से दर्शाया गया है। जब घर में चूल्हा जलता है तब केवल घर के मानव सदस्य ही तृप्त नहीं होते अपितु ऐसे अनेक जीव भी भोजन पाते हैं, जिनमें से कुछ पर तो हमारा ध्यान जाता है और कुछ पर नहीं।

आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में यह भी हुआ है कि हमने खुद को अपने घरों में बंद कर लिया है। मानव समाज की रक्षा के लिए यह एक प्रभावी कदम लगता है, लेकिन हम देखते हैं कि जब हम बाहर निकलते हैं, तब वहाँ भी अनेक ऐसे जीव हैं जिनका पेट हमारे कारण ही भरता है। कुछ के सामने तो हम स्वयं खाने के लिए कुछ डाल देते हैं और कुछ को हमारे खाने-पीने की गतिविधियों के परिणामस्वरूप कुछ मिल जाता है। आजकल सड़कों पर वे प्राणी, मैं यहाँ श्वान अथवा सड़क के कुत्तों और गायों का तो ज़िक्र कर ही सकता हूँ, वैसे तो अनेक जीव हैं, हम जहाँ चाट ठेले पर, चाय की दुकान या रेस्टोरेंट में कुछ खाते-पीते हैं, तब हम इनके आगे कुछ डालें य न डालें, इनको कुछ मिल ही जाता है। आजकल वे कितनी आस से देखते होंगे, यही खयाल आता है।

 

 

खैर मानव-जाति को इस महामारी से शीघ्र छुटकारा मिले, इस कामना के साथ, लीजिए प्रस्तुत है इससे बिल्कुल अलग परिस्थिति की यह कविता, जिसमें घर के भीतर के प्राणी अभाव झेलते हैं, जबकि आजकल इसका सामना बाहर के प्राणी इस अभाव का सामना कर रहे हैं, कोरोना की महामारी जल्द दूर हो यह इन मूक प्राणियों के लिए भी अच्छा रहेगा।

लीजिए प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता-

 

अकाल और उसके बाद

 

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिन तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

 

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

 

मानव मात्र की भलाई के लिए और विशेष रूप से भारत में सड‌क के जीवों के लिए भी यह कामना है कि इस दुष्ट रोग का शीघ्र नाश हो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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