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सेवा की दरकार, सेवा का कारोबार!

कुछ दिन पहले मैंने सरकारी पेंशन की परेशानियों को लेकर एक ब्लॉग पोस्ट लिखी| उस पोस्ट का उद्देश्य मात्र इतना बताना था कि हमारा सिस्टम कितना क्रूर है, वह किसी भी परेशानी की स्थिति को समस्याएँ और बढ़ाने के लिए प्रयोग में ला सकता है, उनके पास किसी समस्या का हल कभी नहीं होता!

मेरी यह पोस्ट थी इपीएस-95 पेंशन के बारे में, और वास्तव में जो लोग इस पर ही निर्भर हैं, उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय है| मुझसे मेरे पुत्र ने पूछा कि किसलिए गए थे, कितनी पेंशन मिलती है? मैंने बताया 1200 तो वह बोला छोड़ो उसे, क्या करना है! मैंने कहा नहीं, जो मिलता है उसको क्यों छोड दें! क्योंकि जब सब कुछ बच्चे ही देखते हैं, मैं तो बहुत सी बार देख ही नहीं पाता कि पेंशन आई भी है या नहीं|


हाँ तो जहां समस्या होती है, उससे बहुत से लोग परेशान होते हैं, लेकिन कुछ लोग उसमें से भी अवसर खोज लेते हैं| जैसे इस मामले में सेवा का, सहायता का अवसर| अब जैसे कोरोना-काल में जहां नई किस्म की समस्या आई है, कुछ नई आवश्यकता पैदा हुई हैं, तो इससे जहां बहुत से लोगों के व्यवसाय और नौकरियों पर संकट आया, वहीं कुछ लोगों ने ‘मास्क’, सेनीटाइजर और ‘पीपीआई किट’ बनाने का काम शुरू कर दिया| इस प्रकार सेवा से संबंधित व्यवसाय में अनेक लोगों ने रोजगार का अवसर भी खोज लिया|


इसी प्रकार, मुझे वास्तव में पहले से यह जानकारी थी कि इस क्षेत्र में भी प्राइवेट सेवाएँ उपलब्ध हैं, लेकिन मेरा ध्यान पहले सरकारी ‘सर्विस सेंटर’ पर गया, वह जहां लोग काम से बचने का बहाना खोजते ही रहते हैं|


हाँ तो ऐसी बहुत सी सेवाएँ हैं जहां प्राइवेट लोगों को अब अवसर दिया गया है और वे हमारे जीवन को काफी आसान बना रहे हैं| जैसे मुझे याद है कि पहले रेलवे स्टेशनों पर टिकट के लिए इतनी लंबी लाइन लगती थी कि मन में यह खयाल आता था, कि क्या कभी यह लाइन समाप्त होगी और क्या हम टिकट लेकर यात्रा कर पाएंगे| अब जबसे प्राइवेट लोगों को टिकट बेचने की अनुमति दी गई है और ऑनलाइन रिज़र्वेशन भी होने लगा है, तब से ज़िंदगी बहुत आसान हो गई है|


बड़े पैमाने पर देखा जाए तो ‘ओला-ऊबर’ और ‘ओयो’ जैसे एक्सपेरीमेंट भी बहुत उपयोगी रहे हैं, यद्यपि इन पर ‘लॉक डाउन’ का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है|


आज के लिए मैं इतना ही कहना चाह रहा था कि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जहां प्राइवेट ‘सेवा केंद्र’ बनाए गए हैं, ऐसे और भी अनेक क्षेत्र उद्यमी लोगों द्वारा खोजे जा सकते हैं, जिनसे जहां लोगों को थोड़ा भुगतान करके बहुत आसानी हो जाएगी, वहीं सेवा देते हुए वे लोग भी कुछ कमाई कर पाएंगे, कितनी यह इस पर निर्भर करेगा कि कितने लोगों को और किस हद तक वे सुविधा उपलब्ध करा पाते हैं|

हाँ यह सावधानी रखा जाना आवश्यक है कि कोई अनैतिक और भ्रष्ट तरीके से यह काम न करे, जैसे रेलवे रिज़र्वेशन में कुछ दलाल करते हैं| मैं यहाँ सेवा का समर्थन कर रहा हूँ, बेईमानी या दलाली का नहीं|


हाँ तो कुल मिलाकर बात इतनी थी कि मैं पेंशन के लिए ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ नहीं भेज पाया था, क्योंकि मेरे फोन में ‘बायोमैट्रिक वेरिफिकेशन’ की सुविधा नहीं थी, मैं ऐसे प्राइवेट ‘सेवा केंद्र’ पर गया, वहाँ मेरा यह वेरिफिकेशन करते हुए, मेरा ऑनलाइन ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ भेज दिया गया| इस सेवा के लिए उनका जो शुल्क था, वह मैंने उनको दे दिया| मुझे लगता है कि इस प्रकार के रोजगार के और भी नए अवसर, उद्यमी साथी खोज सकते हैं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पेंशन की टेंशन -2

मैं सामान्यतः अपने ब्लॉग का प्रयोग इस तरह की पोस्ट लिखने के लिए नहीं करता, लेकिन शायद पहले भी मैंने एक बार ऐसा आलेख लिखा है, आज फिर से इस विषय पर लिख रहा हूँ|


हाँ तो ये पोस्ट है पेंशन के बारे में! मैं बता दूँ कि मैं एक सार्वजनिक उद्यम में काम करता था और रायबरेली, उत्तर प्रदेश से 1 मई 2010 को रिटायर हुआ| मेरा एकाउंट स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, ऊंचाहार, रायबरेली में था, जिसमें अब तक मेरी सरकारी पेंशन, ईपीएस-95 के अंतर्गत, ऊंट के मुंह में जीरे जैसी, लगभग 1200 रु आती है| मैं ये भी बता दूँ कि रिटायरमेंट के बाद मैं 5-6 साल गुड़गांव में रहा, और अब पिछले 3-4 साल से पणजी, गोवा में रहता हूँ|


ये पेंशन आती है- भविष्य निधि कार्यालय, लखनऊ से| पहले मैं और लोगों की तरह प्रतिवर्ष ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ स्टेट बैंक के माध्यम से भेजता था और उसको भी कम से कम एक बार तो लखनऊ का यह पेंशन कार्यालय नकार ही देता था|


हमारे प्रधान मंत्री जी ने पेंशन धारकों के इस दर्द को समझा और यह व्यवस्था की, कि हम अपने मोबाइल में उमंग एप्लिकेशन डाउनलोड करके उसके माध्यम से लाइफ सर्टिफिकेट भेज सकते हैं| माननीय प्रधानमंत्री जी की सोच बहुत अच्छी है लेकिन ये जो सिस्टम है ना, ये बड़ा जालिम है| मैं बहुत लंबी कहानी नहीं सुनाऊँगा, बस इतना ही बताऊंगा कि इस ‘ऐप’ के माध्यम से मैंने इस वर्ष 3 बार ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ भेजा| (इत्तफाक से मुझे, लॉक डाउन के दौरान, 6-7 महीने बंगलौर में भी रहना पड़ा), तीसरी बार जब मैं ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ भेज रहा था तब सिस्टम द्वारा पूछा गया कि मैं ‘इस सेवा से संतुष्ट हूँ, या नहीं’! इसके उत्तर मैं मैंने लिखा कि ‘तीसरी बार यह सर्टिफिकेट भेज रहा हूँ, अगर सफल हो गया तब मानूँगा’|


इसके बाद अभी संदेश मिला कि ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ न भेजने के कारण पेंशन बंद हो गई है| आप अपना लाइफ सर्टिफिकेट भेजिए| इसके बाद अभी भेजने की कोशिश की तो संदेश आया कि ‘बायोमैट्रिक सर्टिफिकेशन’ के साथ इसको भेजा जाए| मुझे नहीं मालूम कि कितने पेंशन धारकों के पास ऐसे मोबाइल सेट होंगे, जिनमें ‘बायोमैट्रिक सर्टिफिकेशन’ की व्यवस्था होगी| वैसे एक व्यवस्था जिसका लाभ मैंने पहले उठाया है, वह है कि स्थानीय ‘भविष्य निधि कार्यालय’ सर्विस सेंटर के रूप में काम करते हैं, अतः मैं वहाँ ही चला जाता हूँ| फिर मैं पणजी, गोवा के भविष्य निधि कार्यालय गया, तो मुझे बताया गया कि ‘बायोमैट्रिक’ वाला काम कोरोना के कारण बंद है, हाँ उन्होंने मुफ्त में मुझे बहुत सी सलाह दे डालीं, क्योंकि इस मामले में तो हमारे लोग एक्सपर्ट हैं|


यह भी बता दूँ कि मैंने इस बीच यह भी प्रयास किया था कि बैंक का अपना एकाउंट ट्रांसफर करा लूँ, और उसके बाद पेंशन भी ट्रांसफर करा लूँगा| गुड़गांव में रहते हुए इसके लिए वहाँ की ब्रांच के माध्यम से आवेदन भेजा था, परंतु पता ही नहीं चला कि वो आवेदन कहाँ गया|


दिक्कत यही है न कि पेंशन कार्यालय भी सरकारी है और बैंक भी सरकारी| फिर काम में गति आएगी तो कैसे|


अब हर बात प्रधान मंत्री जी तक ही तो पहुंचनी जरूरी नहीं है, संभव है कि इस सिस्टम में ही कुछ उच्च अधिकारी ऐसे हों, जो इस सिस्टम को प्रभावी बनाने में रुचि रखते हों, तो संभव है कुछ बेहतर हो जाए और लाखों पेंशन धारकों को सुविधा हो जाए| रही बात पेंशन की राशि को किसी हद तक सम्मान जनक बनाए जाए की, तो वह तो होना ही चाहिए|


बस यही सोचकर लिख रहा हूँ, क्योंकि आवाज उठाते रहना चाहिए, क्या मालूम कब वह सही कानों तक पहुँच जाए|


आज के लिए इतना ही|
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