जो अक्सर हमें याद आए हैं!

हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें,
हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं|

राही मासूम रज़ा

आदमी में होते हैं दस बीस आदमी!

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,
जिस को भी देखना हो कई बार देखना|

निदा फ़ाज़ली

दिल से उतर जाए तो अच्छा!

दुनिया की निगाहों में भला क्या है बुरा क्या,
ये बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा|

साहिर लुधियानवी

लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं!

हमारे शहर के मंज़र न देख पाएँगे,
यहाँ के लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं|

राहत इन्दौरी

जो अक्सर हमें याद आए हैं!

हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें,
हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं|

राही मासूम रज़ा

मिलने लगे हर किसी से हम!

अच्छे बुरे के फ़र्क़ ने बस्ती उजाड़ दी,
मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम|

निदा फ़ाज़ली

दुनिया भी आई तो कहाँ आई!

अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता,
बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई|

मुनव्वर राना

ईश्वर!

आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसे ईश्वर हर जगह पहुँचने के लिए स्वतंत्र होते हैं उसी प्रकार कवि की स्वतंत्रता भी अनंत है| अब इस कविता में ही देखी सर्वेश्वर जी ने ईश्वर को कौन सी ड्रेस पहना दी और उससे क्या काम करवा लिया| एक अलग अंदाज़ में सर्वेश्वर जी ने इस कविता में अपनी बात काही है
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता –


बहुत बडी जेबों वाला कोट पहने
ईश्वर मेरे पास आया था,
मेरी मां, मेरे पिता,
मेरे बच्चे और मेरी पत्नी को
खिलौनों की तरह,
जेब में डालकर चला गया
और कहा गया,
बहुत बडी दुनिया है
तुम्हारे मन बहलाने के लिए।

मैंने सुना है,
उसने कहीं खोल रक्खी है
खिलौनों की दुकान,
अभागे के पास
कितनी जरा-सी पूंजी है
रोजगार चलाने के लिए।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

दूर तलक मरहबा के नारे हैं!

फ़िज़ा में दूर तलक मरहबा के नारे हैं,
गुज़रने वाले हैं कुछ लोग याँ से ख़्वाब के साथ|

शहरयार

वो वहाँ पर नहीं रहा!

वापस न जा वहाँ कि तेरे शहर में ‘मुनीर’,
जो जिस जगह पे था वो वहाँ पर नहीं रहा|

मुनीर नियाज़ी