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ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया!

आज मन हो रहा कि संत कबीर दास जी को याद कर लें| कवि-कलाकार आदि आज की ज़िंदगी का चित्रण अपने हिसाब से करते रहते हैं और हम उनकी प्रस्तुति को देखते/पढ़ते रहते हैं| आज देखते हैं कि संत कबीर दास जी के इस बारे में क्या विचार हैं| वैसे इस भजन की पंक्तियों का अनेक फिल्मी गीतों आदि में भी प्रयोग किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, संत कबीर साहब का यह भजन–



झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी,
कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥

इडा पिङ्गला ताना भरनी,
सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥

आठ कँवल दल चरखा डोलै,
पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥

साँ को सियत मास दस लागे,
ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,
ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥

दास कबीर जतन करि ओढी,
ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय शायर रहे स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब ने गीत, ग़ज़ल, दोहे- हर विधा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और उनमें जो कबीर साहब जैसी साफ़गोई और फक्कड़पन दिखाई देता है, वह आज के समय में दुर्लभ है|


इस ग़ज़ल में भी उन्होंने सादगी के साथ कितनी गहरी बात कही है, वह महसूस करने लायक है| लीजिए आज प्रस्तुत है निदा फ़ाज़ली साहब की यह रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने अनूठे अंदाज़ में गाया है-

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला|

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला|

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें,
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला|

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला|


तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो,
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह!

आज स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी ने फिल्मों में बहुत से गीत लिखे, वे काव्य मंचों पर किसी समय बहुत लोकप्रिय थे और उनको ‘गीतों का राजकुमार’ कहा जाता था|


लीजिए आज प्रस्तुत है उनकी एक हिन्दी ग़ज़ल, जिसे वे गीतिका कहते थे-

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह।

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा,
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह।

कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो,
ज़िन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह।


दाग़ मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह।

हर किसी शख़्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह।

जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन ‘नीरज’,
शायरी तो है वह अख़बार की कतरन की तरह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है!

आज ज़नाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ जी की एक खूबसूरत सी गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है। ‘नूर’ साहब उर्दू अदब के जाने-माने शायर थे, इस गज़ल में कुछ बेहतरीन फीलिंग्स और जीवन का फल्सफा भी है।

वैसे इस गज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया भी है, इसलिए कभी तो आपने इसको सुना ही होगा, लीजिए आज इसको दोहरा लेते हैं-

 

 

बस एक वक़्त का ख़ंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज़ भेस बदल कर मेरी तलाश में है।

 

ये और बात कि पहचानता नहीं मुझको,
सुना है एक सितमग़र मेरी तलाश में है।

 

अधूरे ख़्वाबों से उकता के जिसको छोड़ दिया,
शिकन नसीब वो बिस्तर मेरी तलाश में है।

 

ये मेरे घर की उदासी है और कुछ भी नहीं,
दिया जलाये जो दर पर मेरी तलाश में है।

 

अज़ीज़ मैं तुझे किस कदर कि हर एक ग़म,
तेरी निग़ाह बचाकर मेरी तलाश में है।

 

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।

 

मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है।

 

मैं जिसके हाथ में इक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है।

 

वो जिस ख़ुलूस की शिद्दत ने मार डाला ‘नूर,’
वही ख़ुलूस मुकर्रर मेरी तलाश में है।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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