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कहीं चलो ना, जी !

आज स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अपने संस्थान में कवि सम्मेलनों का आयोजन करते-करते कैलाश जी से अच्छी मित्रता हो गई थी, बहुत सरल हृदय व्यक्ति थे| उनकी रचनाएँ जो बहुत प्रसिद्ध थीं, उनमें ‘अमौस्या का मेला’ और ‘कचहरी’ – ‘भले डांट घर में तू बीवी की खाना, भले जाके जंगल में धूनी रमाना,—- मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना’| बहुत जबर्दस्त माहौल बनाती है ये कविता|

फिलहाल आज की कविता का आनंद लीजिए, यह भी कैलाश गौतम जी की एक सुंदर रचना है-

आज का मौसम कितना प्यारा
कहीं चलो ना, जी !
बलिया, बक्सर, पटना, आरा
कहीं चलो ना, जी !

हम भी ऊब गए हैं इन
ऊँची दीवारों से,
कटकर जीना पड़ता है
मौलिक अधिकारों से ।
मानो भी प्रस्ताव हमारा
कहीं चलो ना, जी !


बोल रहा है मोर अकेला
आज सबेरे से,
वन में लगा हुआ है मेला
आज सबेरे से ।
मेरा भी मन पारा -पारा
कहीं चलो ना, जी !

झील ताल अमराई पर्वत
कबसे टेर रहे,
संकट में है धूप का टुकड़ा
बादल घेर रहे ।
कितना कोई करे किनारा
कहीं चलो ना, जी !


सुनती नहीं हवा भी कैसी
आग लगाती है,
भूख जगाती है यह सोई
प्यास जगाती है ।
सूख न जाए रस की धारा
कहीं चलो ना, जी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं।
आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग!


जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।


एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।
पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-
महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।


दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!


खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।


दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।


अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-


किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,
हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।


जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा। (यह पोस्ट मैंने पिछले सप्ताह ही शेयर की है|)


फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,
जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,
पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,
नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,
तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,
आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।



फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।
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लंदन का एक और प्रवास !

आज फिर से लंदन प्रवास के प्रसंग शेयर कर रहा हूँ| अब जो विवरण दूंगा वे उससे अगले साल अगस्त-सितंबर के हैं |

पिछले वर्ष (2018) लंदन आया था जून में और एक माह तक यहाँ रहने के बाद जुलाई में वापस गोवा गया था। इस बार फिर लंदन आ पहुंचा हूँ, आशा करता हूँ कि इस बार के प्रवास में भी कुछ अच्छा शेयर कर पाऊंगा।

लंदन में मेरे बेटा-बहू रहते हैं, उनके घर ही इस बार भी आया हूँ, फर्क़ इतना है कि पिछली उनका घर ‘कोल्ड हार्बर’ में थेम्स नदी के किनारे था, वैसे लंदन में मुझे लगता है कि हजारों या शायद लाखों घर थेम्स नदी के किनारे हैं, काफी बड़ी नदी है जिसमें बड़े-बड़े जहाज चलते हैं, और इस नदी से एकदम सटे हुए घर बने हैं लाइन से, यहाँ किसी को बाढ़ का डर नहीं है, कारण मैं नहीं समझ पाया। ऐसा लगता है कि यहाँ जल के बहाव को नियंत्रित और दिशा परिवर्तित करने के लिए काफी प्रभावी इंतज़ाम किए गए हैं।

पिछली बार आया था तब मैं बेटे के घर से ‘इवनिंग वॉक’ के लिए या तो नदी के नीचे ग्रीनविच के निकट बनी टनल तक या टनल के रास्ते कभी ‘ग्रीनविच’ तक भी जाता था, जहाँ एक पुराना विशाल जलयान अब प्रदर्शनी के रूप में रखा है, मैंने उसके बारे में पहले के ब्लॉग्स में लिखा है। ‘इवनिंग वॉक’ की मेरी दूसरी मंज़िल होती थी ‘कैनेरी व्हार्फ’ ट्यूब रेलवे स्टेशन! इस बार सबसे बड़ा अंतर यह है कि बेटे का नया घर अब कैनेरी व्हार्फ रेलवे स्टेशन के पास ही है, इसलिए मुझे ‘वॉक’ के लिए इसको स्टार्टिंग पॉइंट बनाकर कोई नई मंज़िल देखनी पड़ेगी।

यहाँ घर के पास ही दो स्टेशन हैं, एक अंडरग्राउंड ट्यूब स्टेशन और दूसरा ओवर ग्राउंड स्टेशन, जिससे जाने वाली खिलौने जैसी लगने वाली लाल रंग की ट्रेन लगातार दिखाई देती रहती हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं लगता कि दो-दो स्टेशन निकट ही होने के कारण कोई शोर महसूस हो।

घर के बगल से ही अब भी थेम्स नदी से जुड़ी एक नहर जैसी है, जिसके ऊपर बने छोटे से हैंगिंग ब्रिज से होकर स्टेशन से लोग इस पार आते हैं, लगातार देखकर लगता है कि अरे अंग्रेज लोग भी इतनी मेहनत करते हैं, वे भी हम हिंदुस्तानियों की तरह हंसते और रोते भी हैं। एक बात तो यहाँ खास है कि ट्रेन-बस में भी लोग आराम से अपने डॉगी को साथ लेकर चलते हैं और उनके डॉगी भी ‘रिस्पोंसिबली’ बिहेव करते हैं, हाँ अगर कोई गलती कर दें, तब तो उनको अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करनी होगी, मेरा मतलब सफाई करने की!

आज बस इतना ही बताने के लिए था, आगे और बातें करेंगे ना। हाँ नए घर की बॉल्कनी से कैनेरी-व्हार्फ एरिया के कुछ चित्र शेयर कर रहा हूँ, जहाँ बहुत सी कॉर्पोरेट कंपनियों के ऑफिस भी हैं।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।


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