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ऑनलाइन इंटरव्यू!

अपनी पुरानी और कुछ नई कविताएं शेयर करने का सिलसिला फिलहाल बंद करता हूँ, आज इस क्रम की अंतिम कविता के साथ|

फिर कोई नई कविता जन्म लेगी तो शेयर करूंगा, लीजिए आज यह गीत प्रस्तुत है-

इंटरव्यू देते हैं रोज हम,
रोज मुस्कुराते हैं|

रोज़गार पाने को,
आवश्यक मुस्काना,
उनको क्या गरज हमारी पतली हालत से,
नीचे जो पहने हों,
ऊपर टाई बांधकर
ऑनलाइन इंटरव्यू निपटाते हैं|


जब तक है काम नहीं,
इंटरव्यू काम है,
जब भी मौका मिले,
हम इसे निभाते हैं|

सबको है इंतज़ार, सुनहरे दिनों का,
उनके लिए सदा पलकें बिछाते हैं,
रोने से क्या होगा, अपनी जीवट शक्ति को,
प्रतिदिन भरपूर हम दिखाते हैं|


और क्या करें हम, बस
रोज मुस्कुराते हैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

+_+_+_

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सूर्यमुखी का प्रण!

अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में आज यह अंतिम पुरानी रचना है, जो बहुत प्रयास करने पर भी पूरी याद नहीं आ सकी| इसे मैं कुछ जगह इसकी तुरपाई करने के बाद प्रस्तुत कर रहा हूँ|

इस रचना में मैंने जीवन के, दिन के और मौसम के तीन चरणों को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है|

लीजिए प्रस्तुत हैं आज की रचना-

प्रिय तेरा विश्वास लिए मैं कब से सोच रहा हूँ,
सूर्यमुखी के प्रण पर मुझे हँसी किसलिए आई|

बन कागज की नाव, तैरतीं बालक की आशाएं,
इंद्रधनुष के रंग निरूपित करते नव-उपमाएं,
उदित सूर्य की किरणों में बचपन को खोज रहा हूँ,
ताकि कर सकूँ उस सपने की, हल्की सी तुरपाई|

सूरज तपता, धरती तपती, चलतीं गर्म हवाएं,
ताप-ताप संयोग, चैन से कैसे समय बिताएं,
भीतर-बाहर ताप लिए आकुल हो खोज रहा हूँ,
वह आंचल की छाँव जहां यौवन पाए ठंडाई |


धुंधलाया आकाश, धरा अलसाई सी लगती है,
प्रकृति ठिठुरती किन्तु सूर्य को जाने की जल्दी है,
तुलसी की मंजरियों में, स्मृतियों को सूंघ रहा हूँ,
ताकि पा सकूं बीते कल की हल्की सी परछाईं|


सूर्यमुखी के प्रण पर मुझको हँसी किसलिए आई||

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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सागर किनारे – अज्ञेय

आज हिन्दी साहित्य के एक विराट व्यक्तित्व – सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|


अज्ञेय जी ने वैसे तो साहित्य की हर विधा में अपनी छाप छोड़ी है परंतु हिन्दी कविता को नया स्वरूप प्रदान करने वालों में उनकी प्रमुख भूमिका थी|


लीजिए प्रस्तुत है अज्ञेय जी की एक कविता-

सागर के किनारे
तनिक ठहरूँ, चाँद उग आये, तभी जाऊँगा वहाँ नीचे
कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे। चाँद उग आये।
न उसकी बुझी फीकी चाँदनी में दिखें शायद

वे दहकते लाल गुच्छ बुरूँस के जो
तुम हो। न शायद चेत हो, मैं नहीं हूँ वह डगर गीली दूब से मेदुर,
मोड़ पर जिसके नदी का कूल है, जल है,
मोड़ के भीतर-घिरे हों बाँह में ज्यों-गुच्छ लाल बुरूँस के उत्फुल्ल।


न आये याद, मैं हूँ किसी बीते साल के सीले कलेंडर की
एक बस तारीख, जो हर साल आती है।
एक बस तारीख-अंकों में लिखी ही जो न जावे
जिसे केवल चन्द्रमा का चिह्न ही बस करे सूचित-

बंक-आधा-शून्य; उलटा बंक-काला वृत्त,
यथा पूनो-तीज-तेरस-सप्तमी,
निर्जला एकादशी-या अमावस्या।
अँधेरे में ज्वार ललकेगा-


व्यथा जागेगी। न जाने दीख क्या जाए जिसे आलोक फीका
सोख लेता है। तनिक ठहरूँ। कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे
तभी जाऊँ वहाँ नीचे-चाँद उग आये।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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फ़ाइल के कोरे पन्ने भरते-भरते!


कविताओं के बारे में, एक बात कहना चाहूँगा, मैं यहाँ जो कविताएं शेयर करता हूँ, अधिकतर वे हमारे जमाने के कवियों की होती हैं, जो कवि सम्मेलनों में अपनी गीत-कविताओं के माध्यम से धूम मचाते थे| अब तो कवि सम्मेलनों का वैसा वातावरण नहीं रहा और मैं भी गोवा में हूँ, जहां ऐसी गतिविधियां देख-सुन पाना और भी मुश्किल है|

हाँ तो आज फिर से मैं कभी काव्य-मंचों के लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय बालस्वरूप राही जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने जीवन की, विशेष रूप से नौकरी-पेशा लोगों के जीवन की विसंगतियों का चित्रण किया गया है|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय डॉ बालस्वरूप राही जी का यह गीत-


जो काम किया, वह काम नहीं आएगा,
इतिहास हमारा नाम नहीं दोहराएगा|
जब से सुरों को बेच ख़रीदी सुविधा,
तब से ही मन में बनी हुई है दुविधा|
हम भी कुछ अनगढा तराश सकते थे,
दो-चार साल अगर समझौता न करते ।


पहले तो हम को लगा कि हम भी कुछ हैं,
अस्तित्व नहीं है मिथ्या, हम सचमुच हैं|
पर अकस्मात ही टूट गया वह संभ्रम,
ज्यों बस आ जाने पर भीड़ों का संयम|
हम उन काग़जी गुलाबों से शाश्वत हैं,
जो खिलते कभी नहीं हैं, कभी न झरते ।


हम हो न सके जो हमें होना था,
रह गए संजोते वही कि जो खोना था|
यह निरुद्देश्य, यह निरानन्द जीवन-क्रम,
यह स्वादहीन दिनचर्या, विफल परिश्रम|
पिस गए सभी मंसूबे इस जीवन के,
दफ़्तर की सीढ़ी चढ़ते और उतरते ।


चेहरे का सारा तेज निचुड़ जाता है,
फ़ाइल के कोरे पन्ने भरते-भरते|
हर शाम सोचते नियम तोड़ देंगे हम,
यह काम आज के बाद छोड़ देंगे हम|
लेकिन वह जाने कैसी है मजबूरी,
जो कर देती है आना यहाँ ज़रूरी|

खाली दिमाग़ में भर जाता है कूड़ा,
हम नहीं भूख से, खालीपन से डरते ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|


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दिन की बुझी शिराओं में, एक और उमर आई!

एक बार फिर से मैं आज अपने एक प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत है शाम का, बचपन में हमने गीत पढ़े थे ग्रामीण परिवेश पर शाम के, जब गोधूलि वेला में बैल रास्ते में धूल उड़ाते हुए घर लौटते हैं|

यह शहरी परिवेश में शाम का गीत है, जब लोग अपने-अपने काम से लौटते हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह नवगीत-

दिन अधमरा देखने
कितनी भीड़ उतर आई,
मुश्किल से साँवली सड़क की
देह नज़र आई ।

कल पर काम धकेल आज की
चिन्ता मुक्त हुई|
खुली हवाओं ने सँवार दी
तबियत छुइ-मुई|


दिन की बुझी शिराओं में
एक और उमर आई ।

फूट पड़े कहकहे,
चुटकुले बिखरे घुँघराले,
पाँव, पंख हो गए
थकन की ज़ंजीरों वाले|

गंध पसीने की पथ भर
बतियाती घर आई|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ, जिसमें कवि ऐसे भाव व्यक्त करता है कि अपने महान राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद भी हम उसका ऋण नहीं उतार सकते|


लीजिए प्रस्तुत है राष्ट्रप्रेम की भावना से भरपूर यह गीत –



मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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पुष्प – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Flower’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्प


इस नन्हे पुष्प को शाख से चुन लो, देर न करो! कहीं ऐसा न हो
कि यह मुरझाकर धूल में गिर जाए|

संभव है कि आपके पुष्पहार में इसे स्थान न मिल पाए, परंतु अपने हाथों की पीड़ा के स्पर्श द्वारा
इसका सम्मान करो और इसे चुन लो| मुझे डर है कि मुझे जानकारी होने से पहले ही, ऐसा न हो कि दिन ढल जाए,
और पूजा में भेंट चढ़ाने का समय निकल जाए|.


भले ही इसका रंग अधिक गहरा न हो और गंध भी हल्की सी हो, परंतु अपनी सेवा में उपयोग करो इस पुष्प का
और समय निकल जाने से पहले ही, इसको शाख से चुन लो |



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





Flower



Pluck this little flower and take it, delay not! I fear lest it
droop and drop into the dust.

I may not find a place in thy garland, but honour it with a touch of
pain from thy hand and pluck it. I fear lest the day end before I am
aware, and the time of offering go by.


Though its colour be not deep and its smell be faint, use this flower
in thy service and pluck it while there is time.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, आज की पीढ़ी उनको अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में अधिक जानती है, परंतु किसी ज़माने वे हिन्दी कवि सम्मेलनों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हुआ करते थे| उनकी ‘मधुशाला’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लोग इसको सुनकर झूम उठते थे| उन्होंने प्रेम के, विरह के और विद्रोह के भी गीत लिखे हैं, उनकी एक कविता तो फिल्म- अग्निपथ में काफी गूंजी थी| अनेक लोकगीत शैली के गीत भी उन्होंने लिखे थे- जैसे ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’|


मुझे याद है आकाशवाणी में उनके एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछ लिया था कि क्या उनकी ‘कविताओं की लोकप्रियता का कारण यह है कि उनकी भाषा बहुत सरल है’, इस पर वो बोले थे कि ‘भाषा सरल होना इतना आसान नहीं है, यदि आपका मन निर्मल नहीं होगा, तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं पाएगी’|


आज का उनका यह गीत, एक रूमानी गीत है, आइए इसका आनंद लेते हैं-



क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कागज़ की नावें- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Paper Boats’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



कागज़ की नावें!



प्रतिदिन मैं अपनी कागज की नावें, बहते जल की धारा में तैराता हूँ|
काले अक्षरों में, मैं उन पर लिखता हूँ, अपना और अपने गाँव का नाम |
मैं आशा करता हूँ कि किसी अजाने स्थान का व्यक्ति इन्हें देखेगा और जानेगा कि मैं कौन हूँ|


मैं इन नावों में अपनी बगिया में उगे शिउली के फूल भी लादता हूँ, और
आशा करता हूँ कि भोर के ये पुष्प सुरक्षित रूप से, रात्रि में किसी किनारे पहुँच जाएंगे|


मैं अपनी नावों को भेजता हूँ, और आकाश में देखता हूँ, कि छोटे-छोटे बादलों की
श्वेत उभरी हुई नौकाएँ यात्रा पर रवाना हो रही हैं|


मैं नहीं जानता कि मेरे खेल का कौन साथी, इनको हवा में तैरा देता है,
मेरी नावों के साथ दौड़ लगाने के लिए!


जब रात होती है, मैं अपना मुख, अपनी बाहों में ढक लेता हूँ, और स्वप्न देखता हूँ
कि कागज की नावें, मध्य रात्रि के सितारों पर और उनके नीचे तैर रही हैं|


उनमें बैठी निद्रा की परियाँ तैर रही हैं, और उनके साथ लदी हैं-
उनकी टोकरियाँ, स्वप्नों से भरी हुई|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Paper Boats



Day by day I float my paper boats one by one down the running
stream.
In bid black letters I write my name on them and the name of
the village where I live.
I hope that someone in some strange land will find them and
know who I am.
I load my little boats with shiuli flower from our garden, and
hope that these blooms of the dawn will be carried safely to land
in the night.
I launch my paper boats and look up into the sky and see the

little clouds setting thee white bulging sails.
I know not what playmate of mine in the sky sends them down
the air to race with my boats!
When night comes I bury my face in my arms and dream that my
paper boats float on and on under the midnight stars.
The fairies of sleep are sailing in them, and the lading ins
their baskets full of dreams.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

 

 

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएंगे।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,
मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,
मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी।

 

ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,
खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।
इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।

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