Categories
Uncategorized

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ, जिसमें कवि ऐसे भाव व्यक्त करता है कि अपने महान राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद भी हम उसका ऋण नहीं उतार सकते|


लीजिए प्रस्तुत है राष्ट्रप्रेम की भावना से भरपूर यह गीत –



मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********

Categories
Uncategorized

पुष्प – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Flower’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्प


इस नन्हे पुष्प को शाख से चुन लो, देर न करो! कहीं ऐसा न हो
कि यह मुरझाकर धूल में गिर जाए|

संभव है कि आपके पुष्पहार में इसे स्थान न मिल पाए, परंतु अपने हाथों की पीड़ा के स्पर्श द्वारा
इसका सम्मान करो और इसे चुन लो| मुझे डर है कि मुझे जानकारी होने से पहले ही, ऐसा न हो कि दिन ढल जाए,
और पूजा में भेंट चढ़ाने का समय निकल जाए|.


भले ही इसका रंग अधिक गहरा न हो और गंध भी हल्की सी हो, परंतु अपनी सेवा में उपयोग करो इस पुष्प का
और समय निकल जाने से पहले ही, इसको शाख से चुन लो |



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





Flower



Pluck this little flower and take it, delay not! I fear lest it
droop and drop into the dust.

I may not find a place in thy garland, but honour it with a touch of
pain from thy hand and pluck it. I fear lest the day end before I am
aware, and the time of offering go by.


Though its colour be not deep and its smell be faint, use this flower
in thy service and pluck it while there is time.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Categories
Uncategorized

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, आज की पीढ़ी उनको अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में अधिक जानती है, परंतु किसी ज़माने वे हिन्दी कवि सम्मेलनों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हुआ करते थे| उनकी ‘मधुशाला’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लोग इसको सुनकर झूम उठते थे| उन्होंने प्रेम के, विरह के और विद्रोह के भी गीत लिखे हैं, उनकी एक कविता तो फिल्म- अग्निपथ में काफी गूंजी थी| अनेक लोकगीत शैली के गीत भी उन्होंने लिखे थे- जैसे ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’|


मुझे याद है आकाशवाणी में उनके एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछ लिया था कि क्या उनकी ‘कविताओं की लोकप्रियता का कारण यह है कि उनकी भाषा बहुत सरल है’, इस पर वो बोले थे कि ‘भाषा सरल होना इतना आसान नहीं है, यदि आपका मन निर्मल नहीं होगा, तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं पाएगी’|


आज का उनका यह गीत, एक रूमानी गीत है, आइए इसका आनंद लेते हैं-



क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********

Categories
Uncategorized

कागज़ की नावें- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Paper Boats’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



कागज़ की नावें!



प्रतिदिन मैं अपनी कागज की नावें, बहते जल की धारा में तैराता हूँ|
काले अक्षरों में, मैं उन पर लिखता हूँ, अपना और अपने गाँव का नाम |
मैं आशा करता हूँ कि किसी अजाने स्थान का व्यक्ति इन्हें देखेगा और जानेगा कि मैं कौन हूँ|


मैं इन नावों में अपनी बगिया में उगे शिउली के फूल भी लादता हूँ, और
आशा करता हूँ कि भोर के ये पुष्प सुरक्षित रूप से, रात्रि में किसी किनारे पहुँच जाएंगे|


मैं अपनी नावों को भेजता हूँ, और आकाश में देखता हूँ, कि छोटे-छोटे बादलों की
श्वेत उभरी हुई नौकाएँ यात्रा पर रवाना हो रही हैं|


मैं नहीं जानता कि मेरे खेल का कौन साथी, इनको हवा में तैरा देता है,
मेरी नावों के साथ दौड़ लगाने के लिए!


जब रात होती है, मैं अपना मुख, अपनी बाहों में ढक लेता हूँ, और स्वप्न देखता हूँ
कि कागज की नावें, मध्य रात्रि के सितारों पर और उनके नीचे तैर रही हैं|


उनमें बैठी निद्रा की परियाँ तैर रही हैं, और उनके साथ लदी हैं-
उनकी टोकरियाँ, स्वप्नों से भरी हुई|


-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-




Paper Boats



Day by day I float my paper boats one by one down the running
stream.
In bid black letters I write my name on them and the name of
the village where I live.
I hope that someone in some strange land will find them and
know who I am.
I load my little boats with shiuli flower from our garden, and
hope that these blooms of the dawn will be carried safely to land
in the night.
I launch my paper boats and look up into the sky and see the

little clouds setting thee white bulging sails.
I know not what playmate of mine in the sky sends them down
the air to race with my boats!
When night comes I bury my face in my arms and dream that my
paper boats float on and on under the midnight stars.
The fairies of sleep are sailing in them, and the lading ins
their baskets full of dreams.



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

 

 

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएंगे।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,
मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,
मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी।

 

ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,
खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।
इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।

————–

Categories
Uncategorized

जैसे कोई हंस अकेला, आंगन में उतरे!

आज हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत-कविता आदि स्वयं ही अपनी बात कहते हैं, उसके बारे में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती| किसी की याद को लेकर कितनी सुंदर अभिव्यक्ति इस गीत में दी गई है, आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे।
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

 

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे,
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे।

 

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे|
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

प्रतीक्षा – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Waiting’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

प्रतीक्षा

 

जो गीत मैं गाने के लिए आई हूँ
वह गीत आज तक गाया नहीं जा सका है|
मैंने पूरा समय अपने वाद्य यंत्र के तार
कसने और उनको ढीला करने में बिता दिया है|

 

वास्तव में अभी समय नहीं आया है,
गीत के बोल अभी ठीक से सजाए नहीं गए हैं;
अभी तक केवल मेरे हृदय में
इस कामना की यंत्रणा है…..

 

मैंने अभी तक उनका चेहरा नहीं देखा है,
और न उनका स्वर सुना है;
मैंने केवल उनके कदमों की सौम्य आहट
अपने घर के सामने वाले मार्ग पर सुनी है…..

 

परंतु अभी दीप भी नहीं जला है
और मैं उनको अपने घर में आमंत्रित नहीं कर सकती;
मैं उनसे मिलने की आस में जीवित हूँ;
परंतु यह मिलन अभी नहीं हुआ है|

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Waiting

 

The song I came to sing
remains unsung to this day.
I have spent my days in stringing
and in unstringing my instrument.

 

The time has not come true,
the words have not been rightly set;
only there is the agony
of wishing in my heart…..

 

I have not seen his face,
nor have I listened to his voice;
only I have heard his gentle footsteps
from the road before my house…..

 

But the lamp has not been lit
and I cannot ask him into my house;
I live in the hope of meeting with him;
but this meeting is not yet.

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************

Categories
Uncategorized

प्रेम का दीप – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Lamp of Love’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

प्रेम का दीप

 

प्रकाश, ओह कहाँ है प्रकाश?
अभिलाषा की धधकती ज्वाला से इसको सुलगाओ!

 

वहाँ एक दीप है परंतु कभी भी लौ की टिमटिमाहट नहीं– ऐसा है तुम्हारा भाग्य, मेरे हृदय?
आह, मृत्यु कहीं बेहतर होती तुम्हारे लिए!

 

मुसीबत तुम्हारे द्वार पर दस्तक देती है,
और उसका संदेश है कि तुम्हारा प्रभु जागृत है,
और वह तुम्हे बुलाता है, रात्रि के अंधकार के माध्यम से, प्रेम-मिलन स्थल पर।

 

आकाश पर बादलों से ढका हुआ है और वर्षा थम नहीं रही है।
मुझे नहीं मालूम कि वह क्या है जो मेरे भीतर घुमड़ रहा है—मैं इसका अर्थ नहीं जानता।

 

बिजली कौंधने के एक क्षण से, मेरी आंखों मेरी दृष्टि में और अंधेरा छा जाता है,
और मेरा हृदय उस मार्ग को टटोलता है, जहाँ रात्रि का संगीत मुझे बुला रहा है।

 

प्रकाश, ओह कहाँ है प्रकाश!
अभिलाषा की धधकती ज्वाला से इसको सुलगाओ!
बादल गर्जना करते हैं और वायु चीखते हुए, शून्य में दौड़ती है।
रात्रि काली है, काले पत्थर की तरह।
घंटों को ऐसे ही अंधेरे में न गुजरने दो।
अपने प्राणों से प्रेम का दीप सुलगाओ।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Lamp of Love

 

Light, oh where is the light?
Kindle it with the burning fire of desire!
There is the lamp but never a flicker of a flame–is such thy fate, my heart?
Ah, death were better by far for thee!
Misery knocks at thy door,
and her message is that thy lord is wakeful,
and he calls thee to the love-tryst through the darkness of night.
The sky is overcast with clouds and the rain is ceaseless.
I know not what this is that stirs in me–I know not its meaning.
A moment’s flash of lightning drags down a deeper gloom on my sight,
and my heart gropes for the path to where the music of the night calls me.
Light, oh where is the light!
Kindle it with the burning fire of desire!
It thunders and the wind rushes screaming through the void.
The night is black as a black stone.
Let not the hours pass by in the dark.
Kindle the lamp of love with thy life..

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************

Categories
Uncategorized

संडे के दिन रास रचा जाइयो, बुला गई राधा प्यारी!

एक बार फिर से मैं, होली के पावन अवसर पर, सभी को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ, स्व. अल्हड़ बीकानेरी जी की लिखी इस आधुनिक रसिया के साथ-

 

कान्हा बरसाने में आ जइयो,
बुला गई राधा प्यारी।
असली माखन कहाँ मिलैगो, शॉर्टेज है भारी,
चर्बी वारौ बटर मिलैगो, फ्रिज में हे बनवारी,
आधी चम्मच मुख लिपटाय जइयो,
बुला गई राधा प्यारी।
नंदन वन के पेड़ कट गए, बने पार्क सरकारी,
ट्विस्ट करत गोपियां मिलैंगी, जहाँ तुम्हें बनवारी,
संडे के दिन रास रचा जइयो,
बुला गई राधा प्यारी।

आप सभी के लिए होली शुभ, समृद्धिवर्धक और आनंददायक हो।
नमस्कार।

================

Categories
Uncategorized

स्रोत- गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Source’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

स्रोत!

 

वह निद्रा जो आकर चुपचाप, नन्हे शिशु की आंखों में बैठ जाती है-

क्या किसी को मालूम है, वह कहाँ से आती है?

हाँ, लोग ऐसा कहते हैं कि इसका अपना बसेरा है वहाँ,

परियों के देश में,  वन की छाया में,

जो जुगनुओं के कारण बहुत हल्के प्रकाश में डूबा है,

मोहकता की दो शर्मीली कलियां लटकी हुई हैं, वहाँ से यह नींद आती है,

शिशु की आंखों को चूमने के लिए।

 

वह मुस्कान जो सोते हुए शिशु की आंखों में टिमटिमाती है-

क्या कोई जानता है कि वह कहाँ पैदा हुई थी?

हाँ, ऐसा बताते हैं लोग बढ़ते हुए चांद से निकली एक नाज़ुक सी किरण ने

पतझड़ के एक मिटते हुए बादल के किनारे को छुआ,

और वहीं यह मुस्कान सबसे पहले पैदा हुई थी,

ओस से धुली एक सुबह के स्वप्न में-

वह मुस्कान जो सोते हुए शिशु के होठों पर खेलती है।

 

वह मधुर, मृदुल ताज़गी जो शिशु के अंगों में खिलती है-

क्या कोई जानता है कि वह इतने लंबे समय से कहाँ छिपी थी?

हाँ, जब उसकी मां, एक नवयुवती थी,

यह उसके हृदय में व्याप्त थी, प्रेम के सुकोमल और शांत रहस्य के रूप में,

वह मधुर, सुकोमल ताज़गी, जो शिशु के

अंगों में खिल रही है। 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Source!

The sleep that flits on baby’s eyes- does anybody know from where it comes? Yes, there is a rumour that it has its dwelling where,
in the fairy village among shadows of the forest dimly lit with glow-worms,
there hang two shy buds of enchantment. From there it
comes to kiss baby’s eyes.
The smile that flickers on baby’s lips when he sleeps- does anybody know where it was born? Yes, there is a rumour that a young pale beam
of a crescent moon touched the edge of a vanishing autumn cloud,
and there the smile was first born
in the dream of a dew washed morning- the smile that flickers on baby’s lips when he sleeps.
The sweet, soft freshness hat blooms on baby’s limbs-
does anybody know where it was hidden so long?
Yes, when the mother was a young girl,
it lay pervading her heart in tender and silent mystery
of love-the sweet, soft freshness that has
bloomed on baby’s limbs.top

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************