मैंने समुद्र में अपना जाल फेंका!

आज पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Cast My Net Into The Sea’ का भावानुवाद-



गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मैंने समुद्र में अपना जाल फेंका

प्रातःकाल मैंने समुद्र में अपना जाल फेंका।
मैंने उस अंधेरे समुद्रतल से ऐसी अनोखे स्वरूप और दिव्य सौंदर्य वाली वस्तुएं घसीटकर निकालीं- जिनमें से कुछ चमकती थीं, मुस्कान की तरह, कुछ झिलमिला रही थीं – अश्रुओं की तरह, और कुछ दमक रही थीं, नववधू के कपोलों की तरह।

दिन भर में एकत्रित बोझ के साथ, जब मैं अपने घर गया, मेरी प्रेयसी बगीचे में अकेली बैठी, फूल की पंखुड़ियां नोच रही थी।
मैं संकोचवश एक क्षण के लिए ठिठक गया, और फिर मैंने वह संग्रह, जो घसीटकर लाया था, वह उसके कदमों में डाल दिया, और शांत खड़ा हो गया।
उसने उन पर एक निगाह डाली और बोली, ‘ये क्या अजीब चीजें हैं? मुझे नहीं मालूम कि ये किस काम आती हैं!’

मैंने शर्म से सिर झुका लिया और सोचा, ‘ मैंने इनके लिए संघर्ष नहीं किया है, बाजार से खरीदा भी नहीं इनको, ये सब उसको देने के लिए उचित उपहार नहीं हैं।’
और फिर पूरी रात, मैं उनको एक-एक करके मार्ग पर फेंकता रहा।
सुबह हुई, बहुत से यात्री उधर से निकले, उन्होंने उनको उठाया और अपने साथ दूर-दराज के देशों में ले गए।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

I Cast My Net Into The Sea


In the morning I cast my net into the sea.
I dragged up from the dark abyss things of strange aspect and strange beauty — some shone like a smile, some glistened like tears, and some were flushed like the cheeks of a bride.
When with the day’s burden I went home, my love was sitting in the garden idly tearing the leaves of a flower.
I hesitated for a moment, and then placed at her feet all that I had dragged up, and stood silent.
She glanced at them and said, ‘What strange things are these? I know not of what use they are!’
I bowed my head in shame and thought, ‘I have not fought for these, I did not buy them in the market; they are not fit gifts for her.’
Then the whole night through I flung them one by one into the street.
In the morning travellers came; they picked them up and carried them into far countries.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।
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अडिग- रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Unyielding’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

अडिग

जब मैंने तुम्हें, तुम्हारे बगीचे में बुलाया,
बौर आ चुके आमों में लुभावने वाली गंध आ रही थी-
तब भी तुम क्यों इतनी दूर रहीं,
अपने द्वार तुमने इतना कसकर बंद रखे?
बौर आने के बाद वे फलों के गुच्छों में बदल गए-
तुमने मेरे हाथों में भरे फलों को अस्वीकार कर दिया,
और अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं।.

बैसाख माह के भयंकर, प्रबल तूफानों के बीच,
सुनहरे पके फल शाखाओं से टूटकर नीचे गिर पड़े,
मैंने कहा, ऐसे प्रसाद को धूल अशुद्ध कर देती है:
अपने हाथों को इनके लिए स्वर्ग बन जाने दो’,
तुमने फिर भी कोई मैत्री भाव नहीं दिखाया।

संध्या के समय तुम्हारे द्वार पर कोई दीप नहीं जला था,
घनघोर अंधेरा था, जब मैंने अपनी वीणा बजाई।
किस प्रकार सितारों की रोशनी ने, मेरे हृदय के तारों को झंकृत किया!
किस प्रकार मैंने अपनी वीणा को नृत्य में लीन कर दिया!
पर तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

उदास पक्षी सोये नहीं, चहकते रहे,
अपने साथियों को पुकारते, पुकारते।
हमारे मिलन का सही समय निकल जाने के बाद-
नीचे पहुंच गया चांद, जबकि तुम अभी भी मान कर रही थीं,
और चांद अपनी एकांत समाधि में डूब गया।

कौन दूसरे को समझ सकता है !
हृदय अपने आवेग पर काबू नहीं कर पाता।
मुझे आशा थी कि कुछ बची हुई
आंसुओं में डूबी यादें, तुम्हे विचलित कर देंगी,
तुम्हारे एहसास को झकझोर कर सहज बना देंगी।

रात्रि के धुंधला रहे कंठहार की पकड़ ढीली होते-होते चांद, ,
धीरे-धीरे सुबह के कदमों पर गिर पड़ा।
जब तुम सो रही थीं, तब क्या मेरी वीणा ने
अपनी हृदय की पीड़ा से, तुम्हें थपकियां दी थीं? कम से कमतुमने
आनंद भरे स्वप्न ही देखे थे क्या?

रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Unyielding

When I called you in your garden
Mango blooms were rich in fragrance –
Why did you remain so distant,
Keep your doors so tightly fastened?
Blossoms grew to ripe fruit-clusters –
Your rejected my cuppded handfuls,
Closed your eyes to perfectness.

In the fierce harsh storms of Baisakh,
Golden ripened fruit fell tumbling.
‘Dust, I said, ‘defiles such offerings:
Let your hands be heaven to them.’
Still you showed no friendliness.

Lampless were your doors at evening,
Pitch-black as I played my vina.
How the starlight twanged my heartstrings!
How I set my vina dancing!
You showed no responsiveness.

Sad birds twittered sleeplessly,
Calling, calling lost companions.
Gone the right time for our union –
Low the moon while still you brooded,
Sunk in lonely pensiveness.

Who can understand another!
Heart cannot restrain its passion.
I had hoped that some remaining
Tear-soaked memories would sway you,
Stir your feet to lightsomeness.

Moon fell at the feet of morning,
Loosened from the night’s fading necklace.
While you slept, O did my Vina
Lull you with its heartache? Did you
Dream at least of happiness?

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।


इतना सा मेरापन!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Little Of Me’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

इतना सा मेरापन!


मुझमें इतना सा मेरापन रह जाने दो,
कि जिसके बाद मैं, अपने समूचे अस्तित्व को तुम्हारा नाम दे सकूं।

मेरी इच्छा को इतना भर रह जाने दो,
जिससे कि मैं हर तरफ तुमको ही महसूस करूं,
और मैं हर मामले में तुम्हारे पास ही पहुंचू,
और हर क्षण तुमको ही अपना प्रेम समर्पित करूं।

मुझमें, मेरा ‘मैं’ इतना कम रह जाने दो,
कि मैं कभी तुमको न छुपाऊं,
मुझसे बंधी अपनी डोर को इतना छोटा कर दो,
कि मैं तुम्हारी इच्छा से बंधा रहूँ,
और मेरा जीवन, तुम्हारे उद्देश्यों की पूर्ति का माध्यम बने-

और यह तुम्हारे प्रेम की ही डोर हो।


रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Little Of Me


Let only that little be left of me
whereby I may name thee my all.

Let only that little be left of my will
whereby I may feel thee on every side,
and come to thee in everything,
and offer to thee my love every moment.

Let only that little be left of me
whereby I may never hide thee.
Let only that little of my fetters be left
whereby I am bound with thy will,
and thy purpose is carried out in my life—

and that is the fetter of thy love.

Rabindranath Tagore



नमस्कार।

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सुनहरी नाव!

आज बारी है एक पुरानी पोस्ट को दोहराने की, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Golden Boat’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

सुनहरी नाव
आकाश में बादल गरज रहे हैं, जो लबालब भरे हैं वर्षा जल से,
और मैं बैठा हूँ नदी किनारे, उदास और एकाकी।
खेत में ढेरियां बनी हैं, फसल कट चुकी है,
नदी उफन रही है और उसका बहाव बहुत तेज है,
जैसे ही हमने धान की कटाई की, वर्षा प्रारंभ हो गई।

छोटा सा धान का खेत, कोई और नहीं, बस अकेला मैं –
हर तरफ बाढ़ का पानी उमड़ता-घुमड़ता हुआ,
दूर किनारे पर खड़े पेड़, जैसे स्याही के धब्बे हों,
जो गांव की गहरी भूरी सुबह के चित्र पर अंकित हों।
और इस तरफ धान का एक खेत, और कोई नहीं, बस अकेला मैं।

कौन है वह महिला, जो नाव पर किनारे की तरफ आ रही है,
गीत गा रही है? मुझे लगता है कि वह मेरी जानी-पहचानी है।
नौका काफी भरी हुई है, वह आगे गौर से देख रही है,
लहरें लाचार होकर नाव से दोनो तरफ टकराती हैं।
मैं ध्यान से देखता हूँ और महसूस करता हूँ, कि मैंने उसे पहले देखा है।

ओह, कौन सी विदेशी भूमि तक तुम नौकायन करती हो?
किनारे पर आओ, और अपनी नौका में कुछ क्षण के लिए लंगर डाल दो।
वहाँ जाओ, जहाँ तुम जाना चाहती हो, वहीं सामान दो, जहाँ देना चाहो,
परंतु कुछ क्षण के लिए किनारे पर आओ, अपनी मुस्कान बिखेरो-
और जब नौका लेकर जाओ, तब मेरा धान भी साथ ले जाओ।

ले जाओ इसे, जितना भी तुम नौका में लाद सकती हो,
क्या और भी है? नहीं और नहीं है, मैंने पूरा लाद दिया है।
मेरी घनघोर मेहनत, यहाँ नदी के किनारे-
मैंने इसे सबको त्याग दिया है, तह के ऊपर तह बिछाकर,
और अब मुझे भी ले जाओ, इतनी दया करो, मुझे भी अपनी नाव में ले जाओ।.

जगह नहीं है, कोई जगह नहीं, नाव बहुत छोटी है,
मेरे सुनहरे धान से लदी हुई, नाव पूरी तरह भर गई है।
दूर-दूर तक बारिश के बीच –आकाश में बादल, हाँफते हुए इधर-उधर हो रहे हैं,
नदी के निर्जन किनारे पर- मैं अकेला रह जाता हूँ-
जो कुछ था, वह चला गया: सुनहरी नाव सब लेकर चली गई।

रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


The Golden Boat

Clouds rumbling in the sky; teeming rain.
I sit on the river bank, sad and alone.
The sheaves lie gathered, harvest has ended,
The river is swollen and fierce in its flow.
As we cut the paddy it started to rain.

One small paddy-field, no one but me –
Flood-waters twisting and swirling everywhere.
Trees on the far bank; smear shadows like ink
On a village painted on deep morning grey.
On this side a paddy-field, no one but me.


Who is this, steering close to the shore
Singing? I feel that she is someone I know.
The sails are filled wide, she gazes ahead,
Waves break helplessly against the boat each side.
I watch and feel I have seen her face before.

Oh to what foreign land do you sail?
Come to the bank and moor your boat for a while.
Go where you want to, give where you care to,
But come to the bank a moment, show your smile –
Take away my golden paddy when you sail.


Take it, take as much as you can load.
Is there more? No, none, I have put it aboard.
My intense labour here by the river –
I have parted with it all, layer upon layer;
Now take me as well, be kind, take me aboard.


No room, no room, the boat is too small.
Loaded with my gold paddy, the boat is full.
Across the
rain-sky clouds heave to and fro,
On the bare river-bank, I remain alone –
What had has gone: the golden boat took all.

Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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मुझे मिले कुछ पुराने पत्र – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Found A Few Old Letters’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझे मिले कुछ पुराने पत्र

मुझे अपने कुछ पुराने पत्र मिले,
जो सावधानीपूर्वक तुम्हारे संदूक में छिपाकर रखे हुए थे—
कुछ छोटे खिलौने, तुम्हारे अपनी यादों से खेलने के लिए।
बहुत कातर हृदय से, तुमने प्रयास किया
चुराकर रखने का, इन नाज़ुक भावों को समय के उन थपेड़ों से-
जो उपग्रहों और सितारों को भी मिटा देते हैं,
और यह भी कहा, ‘ये केवल मेरे हैं, ओह !”
अब ऐसा कोई नहीं है, जो इन पर अपना दावा कर सके—
जो इनकी कीमत अदा कर सके, और ये अब भी यहाँ हैं।
क्या इस दुनिया में कहीं प्रेम नहीं बचा है,
जो तुम्हे इस घोर हानि से बचा सके,
तुम्हारे ऐसे प्रेम के बावज़ूद,
जिसने इन पत्रों को इतने जतन से सुरक्षित रखा?
ओ नारी, तुम मेरे पास एक क्षण के लिए आईं
और तुमने मुझे एक महिला के महान रहस्य से छू लिया,
कि इस सृष्टि में हृदय भी है—
वह नारी, जो ईश्वर को भी वापस लौटाती है,
उसी का अपना मधुरता वाला प्रवाह;
जो स्वयं में है अमर प्रेम और सौंदर्य और यौवन;
जो बुलबुले बनाती धाराओं में नृत्य करता है

और सुबह के प्रकाश में गाता है;
जो उत्तान तरंगों से धरती का पोषण करता है,
और जिसकी करुणा वर्षा के रूप में पिघलती है;
और जिसमें अविनाशी, उल्लास में दो भागों में बंट जाता है,
और इसके बाद, वे अपने आपको सीमित नहीं रख पाते
और प्रेम की पीड़ा में बह निकलते हैं।


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

I Found A Few Old Letters

I found a few old letters of mine carefully hidden in thy box—
a few small toys for thy memory to play with.
With a timorous heart thou didst try to steal
these trifles from the turbulent stream of time
which washes away planets and stars,
and didst say, “These are only mine!” Alas,
there is no one now who can claim them—
who is able to pay their price; yet they are still here.
Is there no love in this world to rescue thee from utter loss,
even like this love of thine that saved these letters with such fond care?
O woman, thou camest for a moment to my side
and touched me with the great mystery of the woman
that there is in the heart of creation—
she who ever gives back to God
his own outflow of sweetness;
who is the eternal love and beauty and youth;
who dances in bubbling streams and sings in the morning light;
who with heaving waves suckles the thirsty earth
and whose mercy melts in rain;
in whom the eternal one breaks in two in joy
that can contain itself no more and overflows in the pain of love.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।
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मेरी पराश्रितता – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘माई डिपेंडेंस’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मेरी पराश्रितता

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
जिसमें मेरी मां का दुलार और देखभाल शामिल हो,
मेरे पिता हों , प्रेम करने, चूमने और गले लगाने के लिए,
और मैं जीवन को खुशी तथा संपूर्ण मोहकता के साथ जिऊं।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और ऐसा रहना
अपने संबंधियों पर, जिससे वे मुझ पर बरसाते रहें
अपने कठोर और मृदुल परामर्श, शिकायतें,
पूर्ण चकित भाव, सत्य और सूचनाओं के भंडार।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
अपने मित्रों पर, गपशप और मेरे पास रहने की इच्छा के लिए,
घरेलू, पारिवारिक और रोमांटिक युक्तियां सुझाने के लिए,
सहकर्मी भी मेरा मार्गदर्शन करें, जोखिमों का सामना करने के लिए।

मुझे पसंद है पराश्रित रहना, और हमेशा रहना
अपने पड़ौसियों पर भी, जो कभी-कभी मुझसे ईर्ष्या करें,
जब मेरा भाग्य मुझे ऊंचाइयों पर ले जाए, और वे सुनें
प्रतिदिन मेरे उठते कदमों की आहट, सरल और कठिन स्थितियों में भी।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

My Dependence

I like to be dependent, and so for ever
with warmth and care of my mother
my father , to love, kiss and embrace
wear life happily in all their grace.

I like to be dependent, and so for ever
on my kith and kin, for they all shower
harsh and warm advices, complaints
full wondering ,true and info giants.

I like to be dependent, and so for ever
for my friends, chat and want me near
with domestic,family and romantic tips
colleagues as well , guide me work at risks.

I like to be dependent, and so for ever
for my neighbours too, envy at times
when at my rise of fortune like to hear
my daily steps , easy and odd things too.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।

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रवींद्रनाथ ठाकुर- वसंत का एक दिन

आज फिर से मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘वन डे इन स्प्रिंग’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

वसंत का एक दिन
वसंत के मौसम में एक दिन, एक महिला
मेरे एकाकी वनों में आई,
वह प्रेयसी के अति सुंदर रूप में आई-
मुझे सौंपने के लिए मेरे गीत, मेरी प्यारी धुनें,
मेरे स्वप्नों को, मिठास प्रदान करने के लिए,
अचानक एक तूफानी लहर आई,
उसने मेरे हृदय के किनारों ध्वस्त कर दिया,
और सभी भाषाओं को डुबो दिया।

मेरे होठों पर कोई नाम नहीं आया,
वह पेड़ के नीचे खड़ी थी, वह घूमी,
मेरे चेहरे की तरफ देखा, जो दर्द से उदास दिख रहा था,
वह तेज कदमों से आगे बढ़ी, और मेरे पास बैठ गई।
उसने मेरे हाथों को अपने हाथों में लिया, फिर वह बोली:
‘न तुम मुझे जानते हो और न मैं तुमको-
मुझे आश्चर्य है कि ऐसा कैसे हो सकता है?’
मैंने कहा:
‘हम दोनो मिलकर बना सकते हैं, हमेशा के लिए एक पुल
दो प्राणियों के बीच, जो एक-दूसरे से अनजान हैं,
यह उत्कंठापूर्ण अजूबा, सभी के दिल में शामिल है।’

मेरे दिल का जो क्रंदन है, वही उसके दिल का भी है;
जिस धागे से वह मुझे बांधती है, वही उसे भी बांधता है।
उसको मैंने हर जगह पाना चाहा है,
उसकी मैंने अपने भीतर पूजा की है,
उसी पूजा के भीतर छिपे रहते हुए ही, उसने भी मुझे पाना चाहा है।

विशाल समुद्रों को पार करते हुए, वह आई मेरा दिल चुराने के लिए।
जिसे वह वापस लौटाना भूल गई, क्योंकि उसने अपना खो दिया था।
उसका अपना सौंदर्य ही, उसको धोखा दे गया था,
वह अपना जाल फैलाती है, और यह नहीं जानती
कि वह इसमें किसी को पकड़ेगी, या खुद पकड़ी जाएगी।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

One Day In Spring


One day in spring, a woman came
In my lonely woods,
In the lovely form of the Beloved.
Came, to give to my songs, melodies,
To give to my dreams, sweetness.
Suddenly a wild wave
Broke over my heart’s shores
And drowned all language.

To my lips no name came,
She stood beneath the tree, turned,
Glanced at my face, made sad with pain,
And with quick steps, came and sat by me.
Taking my hands in hers, she said:
‘You do not know me, nor I you-
I wonder how this could be?’
I said:
‘We two shall build, a bridge for ever
Between two beings, each to the other unknown,
This eager wonder is at the heart of things.’

The cry that is in my heart is also the cry of her heart;
The thread with which she binds me binds her too.
Her have I sought everywhere,
Her have I worshipped within me,
Hidden in that worship she has sought me too.

Crossing the wide oceans, she came to steal my heart.
She forgot to return, having lost her own.
Her own charms play traitor to her,
She spreads her net, knowing not
Whether she will catch or be caught.

Rabindranath Tagore


नमस्कार।

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बादल और लहरें – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘क्लॉउड्स एंड वेव्स’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

बादल और लहरें

सुनो मां, बादलों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“सुबह हमारे जागने के समय से दिन के अंत तक, हम साथ खेलते हैं।
हम सुनहरी भोर के साथ खेलते हैं, हम खेलते हैं- चमकीले चांद के साथ।”
मैं उनसे पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे पास कैसे आ सकता हूँ?”
उनका जवाब होता है, “धरती के किनारे पर आ जाओ, अपने हाथ ऊपर उठाओ-
आकाश की तरफ, और तुम बादलों में पहुंचा दिए जाओगे।“
“मेरी मां घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रही है”, मैं कहता हूँ,”मैं उसे छोड़कर
कैसे आ सकता हूँ?”
ये सुनकर वे मुस्कुराते हैं, और तैरकर दूर चले जाते हैं।
परंतु मां, मैं उससे भी अच्छा एक खेल जानता हूँ।
मैं बादल बन जाऊंगा और तुम चांद बनोगी।
मैं तुमको अपने दोनों हाथों से ढक लूंगा, और हमारे घर की छत
नीला आकाश बन जाएगी।
लहरों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“हम सुबह से रात तक गाते रहते हैं; आगे और आगे हम सैर करते रहते हैं, और हम नहीं जानते
कि हम कहाँ से होकर जा रहे हैं।
मैं पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे बीच कैसे आ सकता हूँ?”
वे मुझे बताते हैं, “समुद्र के किनारे आओ और अपनी आंखें बंद करके खड़े रहो
और लहरें तुम्हे अपने ऊपर बिठाकर लेकर आ जाएंगी।”
मैं कहता हूँ, “मेरी मां घर पर है, वह चाहती है कि मैं हर समय उसके साथ रहूं-
मैं उसको छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?”
वे मुस्कुराते हैं और नाचते हुए आगे बढ़ जाते हैं।
परंतु मुझे इससे ज्यादा अच्छा खेल मालूम है,
मैं लहरें बन जाऊंगा और तुम एक अजाना किनारा बनोगी।
मैं बल खाता हुआ आगे बढ़ता जाऊंगा, तुम्हारी गोदी में आकर ठहाका मारकर हंसूगा,
और दुनिया में कोई नहीं जान पाएगा कि हम दोनों कहाँ हैं।


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Clouds And Waves


Rabindranath Tagore

Mother, the folk who live up in the clouds call out to me-
“We play from the time we wake till the day ends.
We play with the golden dawn, we play with the silver moon.”
I ask, “But how am I to get up to you ?”
They answer, “Come to the edge of the earth, lift up your
hands to the sky, and you will be taken up into the clouds.”
“My mother is waiting for me at home, “I say, “How can I leave
her and come?”
Then they smile and float away.
But I know a nicer game than that, mother.
I shall be the cloud and you the moon.
I shall cover you with both my hands, and our house-top will
be the blue sky.
The folk who live in the waves call out to me-
“We sing from morning till night; on and on we travel and know
not where we pass.”
I ask, “But how am I to join you?”
They tell me, “Come to the edge of the shore and stand with
your eyes tight shut, and you will be carried out upon the waves.”
I say, “My mother always wants me at home in the everything-
how can I leave her and go?”
They smile, dance and pass by.
But I know a better game than that.
I will be the waves and you will be a strange shore.
I shall roll on and on and on, and break upon your lap with laughter.
And no one in the world will know where we both are.


नमस्कार।
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रवीन्द्रनाथ ठाकुर – बादल और लहरें

एक बार फिर बारी है पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने की|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘क्लॉउड्स एंड वेव्स’ का भावानुवाद-



गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

बादल और लहरें

सुनो मां, बादलों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“सुबह हमारे जागने के समय से दिन के अंत तक, हम साथ खेलते हैं।

हम सुनहरी भोर के साथ खेलते हैं, हम खेलते हैं- चमकीले चांद के साथ।”

मैं उनसे पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे पास कैसे आ सकता हूँ?”
उनका जवाब होता है, “धरती के किनारे पर आ जाओ, अपने हाथ ऊपर उठाओ-
आकाश की तरफ, और तुम बादलों में पहुंचा दिए जाओगे।“

“मेरी मां घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रही है”, मैं कहता हूँ,”मैं उसे छोड़कर
कैसे आ सकता हूँ?”
ये सुनकर वे मुस्कुराते हैं, और तैरकर दूर चले जाते हैं।

परंतु मां, मैं उससे भी अच्छा एक खेल जानता हूँ।
मैं बादल बन जाऊंगा और तुम चांद बनोगी।
मैं तुमको अपने दोनों हाथों से ढक लूंगा, और हमारे घर की छत
नीला आकाश बन जाएगी।

लहरों में रहने वाले दोस्त मुझे बुलाते हैं-
“हम सुबह से रात तक गाते रहते हैं; आगे और आगे हम सैर करते रहते हैं, और हम नहीं जानते
कि हम कहाँ से होकर जा रहे हैं।

मैं पूछता हूँ, “लेकिन मैं तुम्हारे बीच कैसे आ सकता हूँ?”
वे मुझे बताते हैं, “समुद्र के किनारे आओ और अपनी आंखें बंद करके खड़े रहो
और लहरें तुम्हे अपने ऊपर बिठाकर लेकर आ जाएंगी।”

मैं कहता हूँ, “मेरी मां घर पर है, वह चाहती है कि मैं हर समय उसके साथ रहूं-
मैं उसको छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?”
वे मुस्कुराते हैं और नाचते हुए आगे बढ़ जाते हैं।

परंतु मुझे इससे ज्यादा अच्छा खेल मालूम है,
मैं लहरें बन जाऊंगा और तुम एक अजाना किनारा बनोगी।
मैं बल खाता हुआ आगे बढ़ता जाऊंगा, तुम्हारी गोदी में आकर ठहाका मारकर हंसूगा,
और दुनिया में कोई नहीं जान पाएगा कि हम दोनों कहाँ हैं।

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Clouds And Waves

Rabindranath Tagore

Mother, the folk who live up in the clouds call out to me-
“We play from the time we wake till the day ends.
We play with the golden dawn, we play with the silver moon.”
I ask, “But how am I to get up to you ?”

They answer, “Come to the edge of the earth, lift up your
hands to the sky, and you will be taken up into the clouds.”
“My mother is waiting for me at home, “I say, “How can I leave
her and come?”
Then they smile and float away.

But I know a nicer game than that, mother.
I shall be the cloud and you the moon.
I shall cover you with both my hands, and our house-top will
be the blue sky.

The folk who live in the waves call out to me-
“We sing from morning till night; on and on we travel and know
not where we pass.”
I ask, “But how am I to join you?”

They tell me, “Come to the edge of the shore and stand with
your eyes tight shut, and you will be carried out upon the waves.”
I say, “My mother always wants me at home in the everything-
how can I leave her and go?”
They smile, dance and pass by.

But I know a better game than that.
I will be the waves and you will be a strange shore.
I shall roll on and on and on, and break upon your lap with laughter.
And no one in the world will know where we both are.

नमस्कार।

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गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता- व्यापारी

एक बार फिर मैं आज एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘दा मर्चेंट’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

व्यापारी

कल्पना करो मां, कि तुम घर पर रहती हो और मैं यात्रा करता हूँ,
अजाने प्रदेशों की।

कल्पना करो कि मेरी नाव तैयार है, रवाना होने को, पूरी तरह सामान से लदी हुई।
अब ठीक से सोचो मां, इससे पहले कि तुम मुझसे कहो, कि मैं वापस आते समय
तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊं।

मां, क्या तुम चाहती हो सोने की अनेकों ढेरियां?
वहाँ, सुनहरी धाराओं के किनारों पर, खेत
सुनहरी फसलों से भरे पड़े हैं।

और वन-मार्ग के छायादार रास्तों में, सुनहरे चंपा के फूल
भूमि पर गिरते रहते हैं।

मैं उनको सैंकड़ों टोकरियों में भरकर तुम्हारे लिए लाऊंगा।
मां, क्या तुम पतझड़ में गिरने वाली बूंदों जैसे बड़े-बड़े मोती पाना चाहती हो?

मैं मोतियों वाले द्वीप का किनारा पार करूंगा,.
वहाँ प्रभात के समय, घास मैदान में फूलों पर, हल्के से मोती कंपकपाते हैं
ये मोती घास पर गिर जाते हैं, और मोती बिखरे रहते हैं,
समुद्र की बेकाबू लहरों के निकट, रेत में छितराए हुए।
मेरा भाई के पास, एक जोड़ी पंख वाले घोड़े होंगे,
उड़ने के लिए-. बादलों के बीच।

पिताजी के लिए मैं ऐसी जादुई कलम लाऊंगा, जो स्वयं ही लिखेगी।
और तुम्हारे लिए मां, मुझे अवश्य लानी चाहिए, गहनों की ऐसी संदूकची,
जिसकी कीमत, सात राजाओं को अपना राजपाट देकर चुकानी पड़े।




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Merchant


Rabindranath Tagore


Imagine, mother, that you are to stay at home and I am to travel into strange lands.
Imagine that my boat is ready at the landing fully laden.
Now think well, mother, before you say what I shall bring for
you when I come back.
Mother, do you want heaps and heaps of gold?
There, by the banks of golden streams, fields are full of
golden harvest.
And in the shade of the forest path the golden champ flower
drop on the ground.

I will gather them all for you in many hundred baskets.
Mother, do you want pearls big as the raindrops of autumn?
I shall cross to the pearl island shore.
There in the early morning light pearls tremble on the meadow
flowers, pearls drop on the grass, and pearls are scattered on the
sand in spray by the wild sea-waves.
My brother shall have a pair of horses with wings to fly among
the clouds.
For father I shall bring a magic pen that, without his
knowing, will write of itself.

For you, mother, I must have the casket and jewel that cost
seven kings their kingdom.



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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