कुछ नहीं पूछा -रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है| प्रस्तुत है यह पोस्ट|

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Gardener Xiii: I asked Nothing ’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

माली- 13: मैंने कुछ नहीं पूछा

मैंने कुछ नहीं पूछा, बस खड़ा रहा
जंगल के किनारे, पेड़ के पीछे।
भोर की आंखों में उनींदापन था,
और हवा में , ओस बकाया थी।
गीली घास की सुस्त गंध
धरती के ऊपर पतली धुंध में टंगी थी।

वटवृक्ष के नीचे तुम अपने हाथों से
गाय को दुह रही थीं,
वे हाथ, जो स्वयं नवनीत की तरह ताजा और मुलायम हैं।
और मैं चुपचाप खड़ा था।
मैंने एक शब्द भी नहीं कहा,
ये तो वह चिड़िया थी, जिसने झाड़ी के पीछे से गीत गाया।


आम के वृक्ष से उसके बौर झर रहे थे,
गांव के पथ पर, और मधुमक्खियां
आईं, एक के बाद एक, गुनगुनाते हुए।
तालाब के एक तरफ, द्वार खुले-
शिव मंदिर के, और एक भक्त वहाँ
मंत्रपाठ करने लगा।

अपनी गोद में दूध का बर्तन लिए
तुम दुहती जा रही थीं, गाय को।
मैं अपना खाली पात्र लिए खड़ा रहा।
मैं तुम्हारे निकट नहीं आया।


मंदिर में घंटा-ध्वनि होने के साथ
आकाश जाग उठा।
मार्ग पर धूल उड़ने लगी
हाँके जा रहे मवेशियों के खुरों से।

अपनी कमर से कजल से भरी गगरियां सटाकर
नदी की ओर से लौटीं महिलाएं।

तुम्हारे कंगन निरंतर खनक रहे थे, और
दूध का झाग तुम्हारी गोद में रखे पात्र के ऊपर तक भर गया था।
सुबह आगे बढ़ती रही, और
मैं तुम्हारे पास नहीं आया।


रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

The Gardener Xiii: I asked Nothing

I asked nothing, only stood at the
edge of the wood behind the tree.
Languor was still upon the eyes
of the dawn, and the dew in the air.

The lazy smell of the damp grass
hung in the thin mist above the earth.
Under the banyan tree you were
milking the cow with your hands,
tender and fresh as butter.


And I was standing still.
I did not say a word. It was the
bird that sang unseen from the thicket.
The mango tree was shedding its
flowers upon the village road, and the
bees came humming one by one.

On the side of the pond the gate of
Shiva’s temple was opened and the
worshipper had begun his chants.
With the vessel on your lap you
were milking the cow.
I stood with my empty can.


I did not come near you.
The sky woke with the sound of
the gong at the temple.
The dust was raised in the road
from the hoofs of the driven cattle.
With the gurgling pitchers at their
hips, women came from the river.

Your bracelets were jingling, and
foam brimming over the jar.
The morning wore on and I did not
come near you.


Rabindranath Tagore

नमस्कार।

*********

मैं छः सेवक रखता हूँ – रुड्यार्ड किप्लिंग

फिर से मैं आज अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Keep Six Honest’ का भावानुवाद-

मैं छः सेवक रखता हूँ

मैं अपने पास छः ईमानदार सेवक रखता हूँ
(मैं जो कुछ भी जानता हूँ, उन्होने ही मुझे सिखाया है);
उनके नाम हैं-‘क्या’ और ‘क्यों’ और ‘कब’,
तथा ‘कैसे’ और ‘कहाँ’ और ‘कौन’।
मैं उनको भेजता हूँ भूतल पर और समुद्र में,
में उनको भेजता हूँ पूर्व और पश्चिम में;
लेकिन मेरे लिए काम करने के बाद,
मैं उनको आराम करने देता हूँ।

मैं उनको नौ बजे से पांच बजे तक आराम करने देता हूँ,
क्योंकि तब मैं व्यस्त होता हूँ,
मैं उनको नाश्ता, भोजन और चाय भी दिलाता हूँ,
क्योंकि वे भूखे प्राणी हैं।
लेकिन इस बारे में अलग-अलग लोगों के, अलग विचार हैं;
मैं एक छोटी बच्ची को जानता हूँ-
उसके पास एक करोड़ सेवक हैं,
जिनको वह बिल्कुल आराम से नहीं बैठने देती!

वो उनको रवाना कर देती है अपने कामों के लिए विदेशों में,
जैसे ही उसकी आंखें खुलती हैं-
दस लाख ‘कैसे’, बीस लाख ‘कहाँ’,
और सत्तर लाख ‘क्यों’!

-Rudyard Kipling




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ

I Keep Six Honest

I keep six honest serving-men
(They taught me all I knew);
Their names are What and Why and When
And How and Where and Who.
I send them over land and sea,
I send them east and west;
But after they have worked for me,
I give them all a rest.
I let them rest from nine till five,
For I am busy then,
As well as breakfast, lunch, and tea,

For they are hungry men.
But different folk have different views;
I know a person small-
She keeps ten million serving-men,
Who get no rest at all!
She sends’em abroad on her own affairs,
From the second she opens her eyes-
One million Hows, two million Wheres,
And seven million Whys!
– Rudyard Kipling


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************

राम की शक्ति पूजा

एक बार फिर छायावाद युग में लौटते हैं और आज मैं उस युग के प्रमुख स्तंभ और हिन्दी कविता के गौरव स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक प्रमुख रचना ‘राम की शक्तिपूजा’ का प्रारंभिक और अंतिम भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ|

इस रचना में प्रसंग है कि श्रीराम जी का जब महाबली रावण से युद्ध चल रहा था, उसमें एक दिवस पूर्ण होने के बाद वे शक्ति की उपासना करते हैं| ऐसा माना जाता है कि 1000 कमल पुष्प चढ़ाने से देवी प्रसन्न होती हैं| श्रीराम जी 1000 पुष्प लेकर पूजा में बैठते हैं परंतु देवी उनके साथ कुछ खेल करना या कहें कि परीक्षा लेना चाहती हैं और वे उसमें से एक पुष्प गायब कर देती हैं| अंत में श्रीराम एक पुष्प कम पाते हैं और वे पूजा से उठ भी नहीं सकते थे, तब उनको ध्यान आता है कि सब उनको कमल नयन कहते थे, तो वे एक कमल पुष्प के स्थान पर अपना एक नेत्र, तीर द्वारा निकालकर चढ़ाने को उद्यत होते हैं, तब देवी प्रकट होती हैं और उनका हाथ पकड़कर उनको रोकती हैं और उनको विजय का आशीर्वाद देती हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है महाप्राण निराला की इस प्रसिद्ध रचना का प्रारंभिक और अंतिम अंश-


रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,
शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,
प्रतिपल – परिवर्तित – व्यूह – भेद कौशल समूह
राक्षस – विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध – कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि – राजीवनयन – हतलक्ष्य – बाण,
लोहितलोचन – रावण मदमोचन – महीयान,
राघव-लाघव – रावण – वारण – गत – युग्म – प्रहर,
उद्धत – लंकापति मर्दित – कपि – दल-बल – विस्तर,
अनिमेष – राम-विश्वजिद्दिव्य – शर – भंग – भाव,
विद्धांग-बद्ध – कोदण्ड – मुष्टि – खर – रुधिर – स्राव,
रावण – प्रहार – दुर्वार – विकल वानर – दल – बल,
मुर्छित – सुग्रीवांगद – भीषण – गवाक्ष – गय – नल,
वारित – सौमित्र – भल्लपति – अगणित – मल्ल – रोध,
गर्ज्जित – प्रलयाब्धि – क्षुब्ध हनुमत् – केवल प्रबोध,
उद्गीरित – वह्नि – भीम – पर्वत – कपि चतुःप्रहर,
जानकी – भीरू – उर – आशा भर – रावण सम्वर।

लौटे युग – दल – राक्षस – पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार – बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज – पति – चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।

प्रशमित हैं वातावरण, नमित – मुख सान्ध्य कमल
लक्ष्मण चिन्तापल पीछे वानर वीर – सकल
रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण,
श्लथ धनु-गुण है, कटिबन्ध स्रस्त तूणीर-धरण,
दृढ़ जटा – मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल
उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार
चमकतीं दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार।

आये सब शिविर,सानु पर पर्वत के, मन्थर
सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर
सेनापति दल – विशेष के, अंगद, हनुमान
नल नील गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान
करने के लिए, फेर वानर दल आश्रय स्थल।

बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल
ले आये कर – पद क्षालनार्थ पटु हनुमान
अन्य वीर सर के गये तीर सन्ध्या – विधान
वन्दना ईश की करने को, लौटे सत्वर,
सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर,
पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर,
सुग्रीव, प्रान्त पर पाद-पद्म के महावीर,
यूथपति अन्य जो, यथास्थान हो निर्निमेष
देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश।

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार,
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार,
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल,
भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर – फिर संशय
रह – रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय,
जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान्त,
एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त,
कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार – बार,
असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।

ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत
देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन
विदेह का, -प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन
नयनों का-नयनों से गोपन-प्रिय सम्भाषण,-
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन,-
काँपते हुए किसलय,-झरते पराग-समुदय,-
गाते खग-नव-जीवन-परिचय-तरू मलय-वलय,-
ज्योतिःप्रपात स्वर्गीय,-ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,-
जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

सिहरा तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त,
हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,
फूटी स्मिति सीता ध्यान-लीन राम के अधर,
फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर,
वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत,-
फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,
देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,
ताड़का, सुबाहु, बिराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर;

**********

कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।

ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।

देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।

हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।


“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

प्रसाद जी की रचना ‘आंसू’ का अंश

छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ – स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी का साहित्य, हिन्दी काव्य जगत की एक अमूल्य धरोहर है| आज मैं प्रसाद जी के प्रमुख काव्य-ग्रंथ- ‘आँसू’ का प्रारंभिक अंश आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है प्रसाद जी की काव्य-रचना ‘आँसू’ का यह अंश –

इस करुणा कलित हृदय में
अब विकल रागिनी बजती
क्यों हाहाकार स्वरों में
वेदना असीम गरजती?

मानस सागर के तट पर
क्यों लोल लहर की घातें
कल कल ध्वनि से हैं कहती
कुछ विस्मृत बीती बातें?

आती हैं शून्य क्षितिज से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती बिलखाती-सी
पगली-सी देती फेरी?


क्यों व्यथित व्योम गंगा-सी
छिटका कर दोनों छोरें
चेतना तरंगिनी मेरी
लेती हैं मृदल हिलोरें?

बस गई एक बस्ती है
स्मृतियों की इसी हृदय में
नक्षत्र लोक फैला है
जैसे इस नील निलय में।

ये सब स्फुर्लिंग हैं मेरी
इस ज्वालामयी जलन के
कुछ शेष चिह्न हैं केवल
मेरे उस महामिलन के।


शीतल ज्वाला जलती हैं
ईधन होता दृग जल का
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर
करती हैं काम अनल का।

बाड़व ज्वाला सोती थी
इस प्रणय सिन्धु के तल में
प्यासी मछली-सी आँखें
थी विकल रूप के जल में।

बुलबुले सिन्धु के फूटे
नक्षत्र मालिका टूटी
नभ मुक्त कुन्तला धरणी
दिखलाई देती लूटी।
 
छिल-छिल कर छाले फोड़े
मल-मल कर मृदुल चरण से
धुल-धुल कर वह रह जाते
आँसू करुणा के जल से।
 
इस विकल वेदना को ले
किसने सुख को ललकारा
वह एक अबोध अकिंचन
बेसुध चैतन्य हमारा।

 
अभिलाषाओं की करवट
फिर सुप्त व्यथा का जगना
सुख का सपना हो जाना
भींगी पलकों का लगना।
 
इस हृदय कमल का घिरना
अलि अलकों की उलझन में
आँसू मरन्द का गिरना
मिलना निश्वास पवन में।
 
मादक थी मोहमयी थी
मन बहलाने की क्रीड़ा
अब हृदय हिला देती है
वह मधुर प्रेम की पीड़ा।

 
सुख आहत शान्त उमंगें
बेगार साँस ढोने में
यह हृदय समाधि बना हैं
रोती करुणा कोने में


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

‘आशा’ से

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

‘आशा’ से


जब मैं अपने अकेले दिल के साथ बैठा होता हूँ,
और उदासी भरे परिवेश में, घृणापूर्ण विचार दिल को घेर लेते हैं;
जब मेरे ‘मन की आंखों’ के सामने कोई सुंदर स्वप्न नहीं आते हैं,
और जीवन की खाली बंजर जमीन पर कोई फूल नहीं खिलते;
ओ मीठी आशा, मेरे दिल पर आकाशीय मरहम लगा दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

जब कभी भी मैं रात घिरने पर भटकता हूँ,
जहाँ आपस में गुंथी हुई टहनियां चंद्रमा की चमकती किरण को ढक लेती हैं,
क्या निराशा भरे मेरे चिंतन से मुझे डरना चाहिए,
और गुस्सा करना चाहिए, जिससे मेरी सहज प्रसन्नता दूर हो जाए,
चंद्रमा की किरणों के साथ, पत्तों की छत से झांको,
और अपनी उस मित्र- मायूसी को कोसों दूर रखो!

अगर निराशा- मायूसी की जननी,
यह प्रयास करे कि उसकी संतान मेरे लापरवाह दिल पर कब्ज़ा कर ले;
जब, किसी बादल की तरह, वह हवा पर सवार हो जाए,
इस तैयारी के साथ कि मौका मिलते ही वह-
अपने शिकार पर झपट पड़े:
उसका पीछा कर सके, मीठी आशा और दमकते चेहरे के साथ,
और उसे डरा सके, जैसे सुबह डराती है रात को!

जब कभी उन लोगों का भाग्य, जो मुझे बहुत प्रिय हैं,
मेरे भयभीत दिल को निराशा की कहानी सुनाता है,
तब अरी ओ चमकती आंखों वाली आशा,
मेरी रुग्ण कल्पना को खुश करने वाली;
जरा मुझे कुछ देर के लिए, अपने मधुरतम आराम उधार लेने दे:
अपनी स्वर्ग में उपजी चमक मेरे चारों ओर बिखर जाने दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

अगर कभी अप्रिय प्रेम से मेरे हृदय में पीड़ा हो,
क्रूर परिस्थितियों से, अथवा अप्रिय वातावरण से;
अरे तब मुझे सोचने दो कि यह बेकार न जाए,
मैं मध्यरात्रि की वायु में, अपने गीत तैरा सकूं!
मीठी आशा, मेरे दिल पर आकाशीय मरहम लगा दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

आने वाले वर्षों की लंबी कतार सामने है,
मैं नहीं चाहता कि मुझे कभी अपने देश का सम्मान फीका होते देखना पड़े:
अरे, मुझे यह देखने दो कि मेरा देश अपनी आत्मा को बनाए रखे,
उसका गौरव, उसकी स्वतंत्रता और स्वतंत्रता की छाया-मात्र नहीं।
तुम अपनी दमकती आंखों की अद्भुद चमक बरसाओ—
और अपने पंखों की छतरी से मेरा सिर ढककर रखो!

मुझे देश-प्रेमियों की महान विरासत देखने दो,
महान मुक्ति! कितनी महान, सामान्य वेशभूषा में!
राजसत्ता के ज़ुल्मों के सामने लाचार, ,
अपना मस्तक झुकाते हुए, शहीद होने को तैयार:
लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम स्वर्ग से अपने पंखों पर उड़कर आ जाओ,
जिससे पूरा आकाश तुम्हारी चमक से भर जाए!

और जिस तरह, अपनी शानदार चमक से, कोई सितारा
किसी अंधियारे बादल के शिखर को सुनहरा बना देता है;
सुदूर स्वर्ग के घूंघट में आधे ढके चेहरे को चमकाते हुए:
इसलिए,जब निराशापूर्ण विचार मेरी आत्मा को घेर लें,
मधुर आशा, तुम अपना आकाशीय प्रभाव मुझ पर डालो
और अपने चमकीले पंखों को मेरे माथे पर लहराओ!



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

To Hope

WHEN by my solitary hearth I sit,
And hateful thoughts enwrap my soul in gloom;
When no fair dreams before my “mind’s eye” flit,
And the bare heath of life presents no bloom;
Sweet Hope, ethereal balm upon me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

Whene’er I wander, at the fall of night,
Where woven boughs shut out the moon’s bright ray,
Should sad Despondency my musings fright,
And frown, to drive fair Cheerfulness away,
Peep with the moonbeams through the leafy roof,
And keep that fiend Despondence far aloof!

Should Disappointment, parent of Despair,
Strive for her son to seize my careless heart;
When, like a cloud, he sits upon the air,
Preparing on his spell-bound prey to dart:
Chase him away, sweet Hope, with visage bright,
And fright him as the morning frightens night!

Whene’er the fate of those I hold most dear
Tells to my fearful breast a tale of sorrow,
O bright-eyed Hope, my morbidfancy cheer;
Let me awhile thy sweetest comforts borrow:
Thy heaven-born radiance around me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

Should e’er unhappy love my bosom pain,
From cruel parents, or relentless fair;
O let me think it is not quite in vain
To sigh out sonnets to the midnight air!
Sweet Hope, ethereal balm upon me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

In the long vista of the years to roll,
Let me not see our country’s honour fade:
O let me see our land retain her soul,
Her pride, her freedom; and not freedom’s shade.
From thy bright eyes unusual brightness shed—
Beneath thy pinions canopy my head!

Let me not see the patriot’s high bequest,
Great Liberty! how great in plain attire!
With the base purple of a court oppress’d,
Bowing her head, and ready to expire:
But let me see thee stoop from heaven on wings
That fill the skies with silver glitterings!

And as, in sparkling majesty, a star
Gilds the bright summit of some gloomy cloud;
Brightening the half veil’d face of heaven afar:
So, when dark thoughts my boding spirit shroud,
Sweet Hope, celestial influence round me shed,
Waving thy silver pinions o’er my head!



नमस्कार।

************

सौंदर्यपूर्ण अस्तित्व !

आज मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक कविता के कुछ भाग का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

सौन्दर्यपूर्ण अस्तित्व


सुंदरता कहीं भी हो, आनंद प्रदान करती है :
उसका सौंदर्य निखरता जाता है; वह कभी भी
शून्य में विलीन नहीं होता; अपितु बनाए रखता है
एक लता-मंडप हमारे लिए, और एक नींद
सपनों से भरी हुई, और सेहत, और शांत श्वसन।

इसीलिए, हर सुबह हम बुनते हैं
फूलों की एक पट्टी जो हमें धरती से बांधे रहे,
भले ही कितनी ही मायूसी हो, अमानवीय अकाल पड़ा हो-
श्रेष्ठ स्वभावों का, उदासी भरे दिन हों,
अनैतिक और अति अभद्र तरीके
हाँ, कैसी भी परिस्थिति के बावज़ूद हमारी तलाश के

सौंदर्य का, कोई स्वरूप, नक़ाब हटा देता है-
हमारी बुरी आत्माओं से, जैसे- सूरज, चंद्रमा,
वृक्ष पुराने और नये, जो एक छायादार वरदान को अंकुरित करते हैं,
सामान्य भेड़ों के लिए, और ऐसे ही हैं डैफोडिल के फूल;
जो एक हरियाली से भरी दुनिया में रहते हैं; और इस प्रवाह को साफ करते हुए
अपने लिए एक शीतलतापूर्ण परिवर्तन पैदा करते हैं,
गर्म मौसम के विरुद्ध, जो जंगल के बीचोंबीच फैला है,
कस्तूरी-गुलाबों की सुंदर गंध फैलने के साथ:
और ऐसी ही होती है विनाश की भव्यता भी।

हमने कल्पना की है कि मर चुके शक्तिशाली व्यक्तियों के लिए;
अमरत्व देने वाले पेय का एक अनंत झरना,
हमारे ऊपर, स्वर्ग के किनारे से गिरता रहे।

और ऐसा नहीं है कि हम इन सारतत्व को
केवल एकाध घंटे के लिए पाना चाहते हैं,
यहाँ तक कि कोई पेड़,
जो किसी मंदिर के आसपास गुनगुनाते हैं,
वे भी उस मंदिर की तरह प्रिय हो जाते हैं, ऐसा ही चांद करता है
जुनून से भरपूर, अनंत गौरव,
हमें तब तक आंदोलित करते हैं,
जब तक कि वे हमारी आत्मा के लिए
आनंददायी प्रकाश-बिंदु नहीं बन जाते,
और हमको इतनी मजबूती से बांधते हैं
कि भले ही कभी चमक-दमक हो, या उदासी छायी हो,
वे हमेशा हमारे साथ रहें, अथवा हम मर जाएंगे।



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

A thing of beauty



A thing of beauty is a joy for ever:
Its lovliness increases; it will never
Pass into nothingness; but still will keep
A bower quiet for us, and a sleep
Full of sweet dreams, and health, and quiet breathing.
Therefore, on every morrow, are we wreathing
A flowery band to bind us to the earth,
Spite of despondence, of the inhuman dearth
Of noble natures, of the gloomy days,
Of all the unhealthy and o’er-darkn’d ways
Made for our searching: yes, in spite of all,
Some shape of beauty moves away the pall
From our dark spirits. Such the sun, the moon,
Trees old and young, sprouting a shady boon
For simple sheep; and such are daffodils
With the green world they live in; and clear rills
That for themselves a cooling covert make
‘Gainst the hot season; the mid-forest brake,
Rich with a sprinkling of fair musk-rose blooms:
And such too is the grandeur of the dooms
We have imagined for the mighty dead;
An endless fountain of immortal drink,
Pouring unto us from the heaven’s brink.



Nor do we merely feel these essences
For one short hour; no, even as the trees
That whisper round a temple become soon
Dear as the temple’s self, so does the moon,
The passion poesy, glories infinite,
Haunt us till they become a cheering light
Unto our souls, and bound to us so fast
That, whether there be shine or gloom o’ercast,
They always must be with us, or we die.

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************