कभी चांद नगर के हम हैं!

जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं,
कभी धरती के, कभी चांद नगर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

कहाँ के हैं, किधर के हम हैं!

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से,
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

दूसरे घर के हम हैं!

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम!

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भून कर खाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार

क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है!

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार

फूल कुम्हलाने लगे हैं!

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कमाल के फूल कुम्हलाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार