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मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे!

आज मैं जनकवि नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो उन्होंने आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री और आपातकाल की जननी- श्रीमती इंदिरा गांधी को संबोधित करते हुए लिखी थी| नागार्जुन जी, आपातकाल के दौरान अन्य अनेक कवि, कलाकारों और नेताओं की तरह जेल में भी बंद रहे थे| जैसा कि आप जानते हैं दुष्यंत कुमार जी ने भी अनेक गज़लें आपातकाल के विरुद्ध लिखी थीं| आज मैं नागार्जुन जी की यह कविता शेयर कर रहा हूँ, जो हमें आपातकाल के अंधकारपूर्ण समय की याद दिलाती है|


लीजिए प्रस्तुत है ये कविता-

ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो,
प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो|

डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है,
वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है,
देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा,
तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा|


तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का, तुम्हीं बड़ी हो,
खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो|

गांधी-नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर,
तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर|
रूस तुम्हें ताक़त देगा, अमरीका पैसा,
तुम्हें पता है, किससे सौदा होगा कैसा|


ब्रेझनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा,
कौन सहेगा धौंस तुम्हारी, मान तुम्हारा|
हल्दी. धनिया, मिर्च, प्याज सब तो लेती हो,
याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो|

मौज, मज़ा, तिकड़म, खुदगर्जी, डाह, शरारत,
बेईमानी, दगा, झूठ की चली तिजारत|
मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में,
जिद्दी हो, बस, डूबी हो आकण्ठ मोह में|


यह कमज़ोरी ही तुमको अब ले डूबेगी,
आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी|
लाभ-लोभ की पुतली हो, छलिया माई हो,
मस्तानों की माँ हो, गुण्डों की धाई हो|

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई,
सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है ‘इन्द्रा’ माई|
बन्दूकें ही हुईं आज माध्यम शासन का,
गोली ही पर्याय बन गई है राशन का|


शिक्षा केन्द्र बनेंगे अब तो फौजी अड्डे,
हुकुम चलाएँगे ताशों के तीन तिगड्डे|
बेगम होगी, इर्द-गिर्द बस गूल्लू होंगे,
मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मैं बेचैन हूँ- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Am Restless’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



मैं बेचैन हूँ!



मैं बेचैन हूँ, मुझमें गहन प्यास है, सुदूर स्थित वस्तुओं की|
मेरी आत्मा में तड़प है, अत्यधिक धुंधली दिखाई देती दूरी के घेरे को छूने की| हे विशाल सुदूर, अरी ओ बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उड़ान के लिए मेरे पास पंख नहीं हैं, कि मैं हमेशा के लिए इस स्थल में बंद हूँ|

मैं इच्छुक हूँ और जागृत भी, मैं अजनबी हूँ, एक अजाने स्थान पर, तुम्हारा श्वास मुझ तक आता है, मुझे एक असंभव आशा की सूचना देते हुए|
तुम्हारी जिव्हा को मेरा हृदय, अपनी स्वयं की जिव्हा के रूप में जानता है|
अरे पहुँचने हेतु सुदूर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि मुझे मार्ग नहीं मालूम है, कि मेरे पास कोई पंखों वाला घोड़ा नहीं है|

मैं उदासीन हूँ, मेरे हृदय में भटकाव है|
निस्तेज घड़ियों के धूपिया धुंधलके में, नीलाकाश में, आपका कैसा दर्शन आकार लेता है!
अरे सुदूर छोर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उस घर के दरवाजे- सभी तरफ से बंद हैं, जिसमें मैं अकेला रहता हूँ!



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





I Am Restless



I am restless. I am athirst for far-away things.
My soul goes out in a longing to touch the skirt of the dim distance.
O Great Beyond, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I have no wings to fly, that I am bound in this spot evermore.


I am eager and wakeful, I am a stranger in a strange land.
Thy breath comes to me whispering an impossible hope.
Thy tongue is known to my heart as its very own.
O Far-to-seek, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I know not the way, that I have not the winged horse.


I am listless, I am a wanderer in my heart.
In the sunny haze of the languid hours, what vast vision of thine takes shape in the blue of the sky!
O Farthest end, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that the gates are shut everywhere in the house where I dwell alone!



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते!

आज साहिर लुधियानवी साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| साहिर जी फिल्मी दुनिया के एक ऐसे गीतकार थे जिनका नाम अदब की दुनिया में भी बड़ी इज्जत के साथ लिया जाता था| वे मुशायरों की शान हुआ कराते थे और बड़े स्वाभिमानी भी थे, उन्होंने ही फिल्म और संगीत वालों के सामने यह शर्त रखी थी कि जिस तरह संगीतकार का नाम लिखा जाता है, उसी तरह गीतकार का भी नाम लिखा जाए, नहीं तो मैं गीत नहीं लिखूंगा|


हम आज भी साहिर जी की अनेक फिल्मी और गैर-फिल्मी रचनाओं को गुनगुनाते थे| जहां ताजमहल को लेकर अनेक मुहब्बत के गीत लिखे गए हैं और कवि-शायरों ने उसे मुहब्बत की निशानी बताया है, वहीं साहिर साहब ने लिखा है-‘एक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल, हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक|

आज की यह रचना भी हमें हिम्मत न हारने और हौसला बनाए रखने की प्रेरणा देती है-



मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो,
कठिन सही तेरी मंजिल मगर उदास न हो|

कदम कदम पे चट्टानें खडी़ रहें लेकिन,
जो चल निकले हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते|
हवाएँ कितना भी टकराएँ आँधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं मगर,
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है|
हजारों चाँद सितारों का खून होता है,
तब एक सुबह फ़िजाओं पे मुस्कुराती है|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते,
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते|
जो रास्ते के अँधेरों से हार जाते हैं,
वो मंजिलों के उजाले को पा नहीं सकते|

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मृत्यु- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता  ‘Death’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मृत्यु!

अरी मृत्यु, तुम ही तो हो मेरे जीवन की अंतिम पूर्ति,
मृत्यु, मेरी  मृत्य, आओ मेरे कान में फुसफुसाओ!

दिन प्रतिदिन मेरा ध्यान तुम पर ही लगा रहा है;
तुम्हारे लिए ही मैंने जीवन के सुखों और कष्टों को भोगा है|

जो कुछ भी मैं हूँ, जो मेरे पास है, जिसकी मैंने आशा की है, और मेरा समूचा प्रेम
हमेशा गोपनीयता की गहराई में, तुम्हारी ओर ही बढ़ता रहा है|

मुझ पर तुम्हारा एक अंतिम दृष्टिपात  
और मेरा जीवन हमेशा के लिए तुम्हारा हो जाएगा|

फूल गूँथे जा चुके हैं
और दूल्हे के लिए पुष्पमाला तैयार है|

विवाह के बाद दुल्हन अपना घर छोड़ देगी,
और रात्रि के एकांत में वह अपने स्वामी से मिलेगी|

-रवींद्रनाथ ठाकुर
 

   और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 Death

O thou the last fulfilment of life,
Death, my death, come and whisper to me!

Day after day I have kept watch for thee;
for thee have I borne the joys and pangs of life.

All that I am, that I have, that I hope and all my love
have ever flowed towards thee in depth of secrecy.

One final glance from thine eyes
and my life will be ever thine own.

The flowers have been woven
and the garland is ready for the bridegroom.

After the wedding the bride shall leave her home
and meet her lord alone in the solitude of night.



  -Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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यही होता है तो आखिर यही होता क्यों हैं!

कैफी आज़मी साहब की एक गजल आज याद आ रही है| कैफी साहब हिंदुस्तान के एक प्रसिद्ध शायर रहे हैं और बहुत सी सुंदर रचनाएँ उन्होंने हमें दी हैं, फिल्मों में भी उनकी बहुत सी रचनाओं का इस्तेमाल किया गया और आज जो गज़ल मैं शेयर कर रहा हूँ उसको जगजीत सिंह साहब ने गाया है|


सचमुच जीवन में बहुत सी स्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनको इंसान दूसरों के सामने नहीं रख पाता, आज के भागते-दौड़ते समाज में बहुत सी बार तो कोई इंसान मर जाता है, बहुत से मामलों में आत्म-हत्या कर लेता है, तब लोगों को महसूस होता है की उसके जीवन में शायद कोई गंभीर समस्या थी|


लीजिए आज इस खूबसूरत गजल का आनंद लेते हैं-


कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं,
वो जो अपना था वही और किसी का क्यों हैं,
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं,
यही होता है तो आखिर यही होता क्यों हैं!

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन,
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन,
इतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं!

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई,
एक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई,
आस जो टूट गयी, फिर से बंधाता क्यों है!

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता,
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता,
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों हैं!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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इतना सा मैं- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Little Of Me’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



इतना सा मैं!


मुझमें इतना सा मैं शेष रह जाने दो
जिससे मैं अपना सब कुछ तुम्हारे नाम कर सकूँ|

मेरी बस इतनी इच्छा शेष रह जाने दो
जिससे मैं हर तरफ तुमको ही महसूस कर सकूँ,
और हर बात के लिए तुम्हारे पास आऊं,
और हर क्षण तुमको अपना प्रेम समर्पित कर सकूँ|

मुझमें इतना सा मैं शेष रह जाने दो
जिससे मैं कभी भी तुमको न छिपाऊं|
मेरे मात्र इतने बंधन शेष रह जाने दो,
जिससे मैं तुम्हारी इच्छाओं से बंधा रहूँ,
और मेरे जीवन में तुम्हारा ही उद्देश्य प्रतिफलित हो— और यही है बंधन तुम्हारे प्रेम का|




-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Little Of Me



Let only that little be left of me
whereby I may name thee my all.

Let only that little be left of my will
whereby I may feel thee on every side,
and come to thee in everything,
and offer to thee my love every moment.

Let only that little be left of me
whereby I may never hide thee.
Let only that little of my fetters be left
whereby I am bound with thy will,
and thy purpose is carried out in my life— and that is the fetter of thy love.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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लो,एक बजा दोपहर हुई!

हिन्दी मंचों पर गीतों के दिव्य हस्ताक्षर स्वर्गीय भारत भूषण जी, जो मेरठ, उत्तर प्रदेश से थे और उनके अनेक गीत मैं हमेशा गुनगुनाता रहा हूं, जैसे – चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखाड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’, मैं बनफूल, भला मेरा- कैसा खिलना, क्या मुरझाना’ आदि-आदि| मैं सभी गीतों के मुखड़े लिखूंगा तब भी यह आलेख पूरा हो जाएगा|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो गर्मी की दोपहर के कुछ दृश्य प्रस्तुत करता है, काफी प्रायोगिक किस्म का गीत है यह| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का ये गीत-



लो
एक बजा दोपहर हुई,
चुभ गई हृदय के बहुत पास
फिर हाथ घड़ी की
तेज सुई|

पिघली
सड़कें झरती लपटें
झुँझलाईं लूएँ धूल भरी,
किसने देखा किसने जाना
क्यों मन उमड़ा क्यों
आँख चुई|

रिक्शेवालों की
टोली में पत्ते कटते पुल के नीचे,
ले गई मुझे भी ऊब वहीं कुछ सिक्के मुट्ठी में भींचे,
मैंने भी एक दाँव खेला, इक्का माँगा पर
पर खुली दुई|

सहसा चिंतन को
चीर गई, आँगन में उगी हुई बेरी,
बह गई लहर के साथ लहर, कोई मेरी कोई तेरी।
फिर घर धुनिये की ताँत हुआ फिर प्राण हुए
असमर्थ रुई|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ब्लैक आउट में रोशनी की तरह!

मैंने पहले भी सूर्यभानु गुप्त जी की कुछ रचनाएँ शेयर की हैं| वे बहुत सुंदर रचनाएँ, विशेष रूप से गज़लें लिखते हैं, जिनमें उन्होंने अनेक एक्सपेरीमेंट किए हैं| कुछ शेर तो उनके मुझे अक्सर याद आते हैं, जैसे – ‘जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं, नदी बांध के पत्थर उतर गया हूँ मैं’, ‘दिल वाले फिरते हैं दर-दर सिर पर अपनी खाट लिए’, ‘शाम अजायब घर के आगे, बैठा था भूखा-प्यासा, अपने मरे हुए दादा की, फोटो एक सम्राट लिए; आदि-आदि| वैसे सूर्यभानु गुप्त जी ने कुछ प्रयोग धर्मी फिल्मों और टीवी सीरियल्स के लिए भी गीत आदि लिखे हैं|


आज की इस गजल में भी काफी एक्सपेरीमेंट भाषा और अभिव्यक्ति के स्तर पर देखे जा सकते हैं-



अपने घर में ही अजनबी की तरह,
मैं सुराही में इक नदी की तरह|

एक ग्वाले तलक गया कर्फ़्यू,
ले के सड़कों को बंसरी की तरह|

किससे हारा मैं, ये मेरे अन्दर,
कौन रहता है ब्रूस ली की तरह|

उसकी सोचों में मैं उतरता हूँ,
चाँद पर पहले आदमी की तरह|


अपनी तनहाइयों में रखता है,
मुझको इक शख़्स डायरी की तरह|

मैंने उसको छुपा के रक्खा है,
ब्लैक आउट में रोशनी की तरह|

टूटे बुत रात भर जगाते हैं,
सुख परेशां है गज़नवी की तरह|

बर्फ़ गिरती है मेरे चेहरे पर,
उसकी यादें हैं जनवरी की तरह|


वक़्त-सा है अनन्त इक चेहरा,
और मैं रेत की घड़ी की तरह|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!

कुछ रचना पंक्तियाँ ऐसी लिखी जाती हैं कि वे मुहावरा बन जाती हैं| जैसे डॉ बशीर बद्र जी का एक शेर था- ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए|’ ऐसी ही एक पंक्ति आज की कविता की है, जिसको अक्सर लोग कहावत की तरह दोहराते हैं| वैसे इसके रचनाकार ऐसे हैं, जिनकी कविताएं हम बचपन में पढ़ा करते थे, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविताएं- ‘वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो’ आदि|


लीजिए आज प्रस्तुत है हमारे स्वाधीनता संग्राम के समय सक्रिय -स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह प्रेरक कविता, जिसकी एक पंक्ति को आज भी प्रेरणा देने के लिए दोहराया जाता है-



लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है,
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है,
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नहीं भूलना है मुझे – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Let Me Not Forget’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



नहीं भूलना है मुझे!



यदि यह मेरे भाग्य में नहीं है कि मैं तुमसे इस जीवन में मिलूँ
तो फिर मुझे हमेशा यही महसूस करने दो कि मैं तुम्हें देख ही नहीं पाया था
— एक क्षण के लिए भी मत भूलने दो,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|

जैसे-जैसे मेरे दिन बीतते जाते हैं, इस दुनिया के भीड़ भरे बाज़ार में
और हर दिन कमाए गए लाभ से मेरे हाथ भरते जाते हैं,
तब हमेशा मुझे यह महसूस करने दो कि मैंने कुछ नहीं कमाया है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|



जब मैं मार्ग के किनारे बैठ जाऊं, थका और हाँफता हुआ,
जब मेरा अपना बिस्तर फैल जाए, नीचे मिट्टी में,

मुझे तब भी हमेशा महसूस करने दो, कि लंबी यात्रा अभी करनी बाकी है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|


जब मेरे कमरों को सजाया गया हो, और बांसुरी की धुन
और क़हक़हों की ध्वनि तेज हो,
मुझे हमेशा यह महसूस करने दो कि मैंने तुम्हें अपने घर नहीं बुलाया है,
— मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|




-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Let Me Not Forget



If it is not my portion to meet thee in this life
then let me ever feel that I have missed thy sight
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

As my days pass in the crowded market of this world
and my hands grow full with the daily profits,
let me ever feel that I have gained nothing
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.


When I sit by the roadside, tired and panting,
when I spread my bed low in the dust,
let me ever feel that the long journey is still before me
—let me not forget a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

When my rooms have been decked out and the flutes sound
and the laughter there is loud,
let me ever feel that I have not invited thee to my house
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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