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यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल!

एक बार फिर मैं आज बहुत ही प्यारे और भावुक गीतकार, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे यह स्मरण करके अच्छा लगता है कि मुझे कई बार उनसे गले मिलने का अवसर मिला था| बहुत ही सरल हृदय व्यक्ति, सृजनशील रचनाकार थे| आज के इस गीत में भी उन्होंने प्रेयसी की आँखों में आए आंसुओं के बहाने क्या-क्या बातें कह दीं, भावुकता की उड़ान में कहाँ-कहाँ पहुँच गए|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह प्यारा सा गीत- –



नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा-
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ|


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी,
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर,
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर|

रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की,
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ,
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ|


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा,
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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वो कुछ इस सादगी से मिलता है!

आज मैं उर्दू के प्रसिद्ध शायर जिगर मुरादाबादी साहब की एक गज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ| उस्ताद शायरों का अंदाज़ ए बयां क्या होता है, ये ऐसे माहिर शायरों की शायरी को सुन कर मालूम होता है, मामूली सी बात उनके अशआर में ढलकर लाजवाब बन जाती है|


आइए आज इस गज़ल का आनंद लेते हैं-



आदमी आदमी से मिलता है,
दिल मगर कम किसी से मिलता है|

भूल जाता हूँ मैं सितम उसके,
वो कुछ इस सादगी से मिलता है|

आज क्या बात है कि फूलों का,
रंग तेरी हँसी से मिलता है|

मिल के भी जो कभी नहीं मिलता,
टूट कर दिल उसी से मिलता है|

कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं,
होश जब बेख़ुदी से मिलता है|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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रथ का टूटा हुआ पहिया!

धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे और गद्य और पद्य की सभी विधाओं- कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृतांत आदि-आदि में अपना बहुमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ|

भारती जी ने महाभारत की पृष्ठभूमि पर एक खंडकाव्य- अंधायुग भी लिखा था| आज की इस कविता में भी महाभारत का संदर्भ दिया गया है| वास्तव में जीवन में कभी ऐसे व्यक्तियों अथवा वस्तुओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जिनको हम अक्सर महत्व नहीं देते|


आइए स्वाभिमान से भारी इस कविता का आनंद लेते हैं-



मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !


अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ


लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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एक जाला-सा समय की आँख में उतरा!

आज हिन्दी नवगीत के एक सशक्त हस्ताक्षर- श्री राजेन्द्र गौतम का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में सामान्य जन के लिए संघर्ष और आशावाद का संदेश दिया गया है| यह विश्वास व्यक्त किया गया है की परिस्थितियाँ कितनी ही विकट क्यों न हो, हम लोग मिलकर उनका सामना कर सकते हैं| इस अंधेरी सुरंग के पार रोशनी की सौगात अवश्य मिलेगी|


आइए इस नवगीत का आनंद लेते हैं-



यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा —
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।

सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे,
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है|

सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को,
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है|

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा,
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।


संखिया कोई —
कुओं में डाल जाता है,
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली|
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने,
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली|


पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे,
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे!

आज मैं जनकवि नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो उन्होंने आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री और आपातकाल की जननी- श्रीमती इंदिरा गांधी को संबोधित करते हुए लिखी थी| नागार्जुन जी, आपातकाल के दौरान अन्य अनेक कवि, कलाकारों और नेताओं की तरह जेल में भी बंद रहे थे| जैसा कि आप जानते हैं दुष्यंत कुमार जी ने भी अनेक गज़लें आपातकाल के विरुद्ध लिखी थीं| आज मैं नागार्जुन जी की यह कविता शेयर कर रहा हूँ, जो हमें आपातकाल के अंधकारपूर्ण समय की याद दिलाती है|


लीजिए प्रस्तुत है ये कविता-

ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो,
प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो|

डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है,
वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है,
देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा,
तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा|


तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का, तुम्हीं बड़ी हो,
खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो|

गांधी-नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर,
तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर|
रूस तुम्हें ताक़त देगा, अमरीका पैसा,
तुम्हें पता है, किससे सौदा होगा कैसा|


ब्रेझनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा,
कौन सहेगा धौंस तुम्हारी, मान तुम्हारा|
हल्दी. धनिया, मिर्च, प्याज सब तो लेती हो,
याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो|

मौज, मज़ा, तिकड़म, खुदगर्जी, डाह, शरारत,
बेईमानी, दगा, झूठ की चली तिजारत|
मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में,
जिद्दी हो, बस, डूबी हो आकण्ठ मोह में|


यह कमज़ोरी ही तुमको अब ले डूबेगी,
आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी|
लाभ-लोभ की पुतली हो, छलिया माई हो,
मस्तानों की माँ हो, गुण्डों की धाई हो|

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई,
सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है ‘इन्द्रा’ माई|
बन्दूकें ही हुईं आज माध्यम शासन का,
गोली ही पर्याय बन गई है राशन का|


शिक्षा केन्द्र बनेंगे अब तो फौजी अड्डे,
हुकुम चलाएँगे ताशों के तीन तिगड्डे|
बेगम होगी, इर्द-गिर्द बस गूल्लू होंगे,
मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मैं बेचैन हूँ- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Am Restless’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



मैं बेचैन हूँ!



मैं बेचैन हूँ, मुझमें गहन प्यास है, सुदूर स्थित वस्तुओं की|
मेरी आत्मा में तड़प है, अत्यधिक धुंधली दिखाई देती दूरी के घेरे को छूने की| हे विशाल सुदूर, अरी ओ बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उड़ान के लिए मेरे पास पंख नहीं हैं, कि मैं हमेशा के लिए इस स्थल में बंद हूँ|

मैं इच्छुक हूँ और जागृत भी, मैं अजनबी हूँ, एक अजाने स्थान पर, तुम्हारा श्वास मुझ तक आता है, मुझे एक असंभव आशा की सूचना देते हुए|
तुम्हारी जिव्हा को मेरा हृदय, अपनी स्वयं की जिव्हा के रूप में जानता है|
अरे पहुँचने हेतु सुदूर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि मुझे मार्ग नहीं मालूम है, कि मेरे पास कोई पंखों वाला घोड़ा नहीं है|

मैं उदासीन हूँ, मेरे हृदय में भटकाव है|
निस्तेज घड़ियों के धूपिया धुंधलके में, नीलाकाश में, आपका कैसा दर्शन आकार लेता है!
अरे सुदूर छोर, अरे बांसुरी की उत्साहित करने वाली धुन!
मैं भूल जाता हूँ, हमेशा भूल जाता हूँ, कि उस घर के दरवाजे- सभी तरफ से बंद हैं, जिसमें मैं अकेला रहता हूँ!



-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-





I Am Restless



I am restless. I am athirst for far-away things.
My soul goes out in a longing to touch the skirt of the dim distance.
O Great Beyond, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I have no wings to fly, that I am bound in this spot evermore.


I am eager and wakeful, I am a stranger in a strange land.
Thy breath comes to me whispering an impossible hope.
Thy tongue is known to my heart as its very own.
O Far-to-seek, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that I know not the way, that I have not the winged horse.


I am listless, I am a wanderer in my heart.
In the sunny haze of the languid hours, what vast vision of thine takes shape in the blue of the sky!
O Farthest end, O the keen call of thy flute!
I forget, I ever forget, that the gates are shut everywhere in the house where I dwell alone!



-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते!

आज साहिर लुधियानवी साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| साहिर जी फिल्मी दुनिया के एक ऐसे गीतकार थे जिनका नाम अदब की दुनिया में भी बड़ी इज्जत के साथ लिया जाता था| वे मुशायरों की शान हुआ कराते थे और बड़े स्वाभिमानी भी थे, उन्होंने ही फिल्म और संगीत वालों के सामने यह शर्त रखी थी कि जिस तरह संगीतकार का नाम लिखा जाता है, उसी तरह गीतकार का भी नाम लिखा जाए, नहीं तो मैं गीत नहीं लिखूंगा|


हम आज भी साहिर जी की अनेक फिल्मी और गैर-फिल्मी रचनाओं को गुनगुनाते थे| जहां ताजमहल को लेकर अनेक मुहब्बत के गीत लिखे गए हैं और कवि-शायरों ने उसे मुहब्बत की निशानी बताया है, वहीं साहिर साहब ने लिखा है-‘एक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल, हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक|

आज की यह रचना भी हमें हिम्मत न हारने और हौसला बनाए रखने की प्रेरणा देती है-



मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो,
कठिन सही तेरी मंजिल मगर उदास न हो|

कदम कदम पे चट्टानें खडी़ रहें लेकिन,
जो चल निकले हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते|
हवाएँ कितना भी टकराएँ आँधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं मगर,
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है|
हजारों चाँद सितारों का खून होता है,
तब एक सुबह फ़िजाओं पे मुस्कुराती है|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते,
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते|
जो रास्ते के अँधेरों से हार जाते हैं,
वो मंजिलों के उजाले को पा नहीं सकते|

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मृत्यु- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता  ‘Death’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मृत्यु!

अरी मृत्यु, तुम ही तो हो मेरे जीवन की अंतिम पूर्ति,
मृत्यु, मेरी  मृत्य, आओ मेरे कान में फुसफुसाओ!

दिन प्रतिदिन मेरा ध्यान तुम पर ही लगा रहा है;
तुम्हारे लिए ही मैंने जीवन के सुखों और कष्टों को भोगा है|

जो कुछ भी मैं हूँ, जो मेरे पास है, जिसकी मैंने आशा की है, और मेरा समूचा प्रेम
हमेशा गोपनीयता की गहराई में, तुम्हारी ओर ही बढ़ता रहा है|

मुझ पर तुम्हारा एक अंतिम दृष्टिपात  
और मेरा जीवन हमेशा के लिए तुम्हारा हो जाएगा|

फूल गूँथे जा चुके हैं
और दूल्हे के लिए पुष्पमाला तैयार है|

विवाह के बाद दुल्हन अपना घर छोड़ देगी,
और रात्रि के एकांत में वह अपने स्वामी से मिलेगी|

-रवींद्रनाथ ठाकुर
 

   और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

 Death

O thou the last fulfilment of life,
Death, my death, come and whisper to me!

Day after day I have kept watch for thee;
for thee have I borne the joys and pangs of life.

All that I am, that I have, that I hope and all my love
have ever flowed towards thee in depth of secrecy.

One final glance from thine eyes
and my life will be ever thine own.

The flowers have been woven
and the garland is ready for the bridegroom.

After the wedding the bride shall leave her home
and meet her lord alone in the solitude of night.



  -Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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यही होता है तो आखिर यही होता क्यों हैं!

कैफी आज़मी साहब की एक गजल आज याद आ रही है| कैफी साहब हिंदुस्तान के एक प्रसिद्ध शायर रहे हैं और बहुत सी सुंदर रचनाएँ उन्होंने हमें दी हैं, फिल्मों में भी उनकी बहुत सी रचनाओं का इस्तेमाल किया गया और आज जो गज़ल मैं शेयर कर रहा हूँ उसको जगजीत सिंह साहब ने गाया है|


सचमुच जीवन में बहुत सी स्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनको इंसान दूसरों के सामने नहीं रख पाता, आज के भागते-दौड़ते समाज में बहुत सी बार तो कोई इंसान मर जाता है, बहुत से मामलों में आत्म-हत्या कर लेता है, तब लोगों को महसूस होता है की उसके जीवन में शायद कोई गंभीर समस्या थी|


लीजिए आज इस खूबसूरत गजल का आनंद लेते हैं-


कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों हैं,
वो जो अपना था वही और किसी का क्यों हैं,
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं,
यही होता है तो आखिर यही होता क्यों हैं!

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन,
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन,
इतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं!

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई,
एक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई,
आस जो टूट गयी, फिर से बंधाता क्यों है!

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता,
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता,
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों हैं!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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इतना सा मैं- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Little Of Me’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



इतना सा मैं!


मुझमें इतना सा मैं शेष रह जाने दो
जिससे मैं अपना सब कुछ तुम्हारे नाम कर सकूँ|

मेरी बस इतनी इच्छा शेष रह जाने दो
जिससे मैं हर तरफ तुमको ही महसूस कर सकूँ,
और हर बात के लिए तुम्हारे पास आऊं,
और हर क्षण तुमको अपना प्रेम समर्पित कर सकूँ|

मुझमें इतना सा मैं शेष रह जाने दो
जिससे मैं कभी भी तुमको न छिपाऊं|
मेरे मात्र इतने बंधन शेष रह जाने दो,
जिससे मैं तुम्हारी इच्छाओं से बंधा रहूँ,
और मेरे जीवन में तुम्हारा ही उद्देश्य प्रतिफलित हो— और यही है बंधन तुम्हारे प्रेम का|




-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Little Of Me



Let only that little be left of me
whereby I may name thee my all.

Let only that little be left of my will
whereby I may feel thee on every side,
and come to thee in everything,
and offer to thee my love every moment.

Let only that little be left of me
whereby I may never hide thee.
Let only that little of my fetters be left
whereby I am bound with thy will,
and thy purpose is carried out in my life— and that is the fetter of thy love.




-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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