न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम!

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब,
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम|

अहमद फ़राज़

तुझको अगर भूल जाएँ हम!

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम,
ये भी बहुत है तुझको अगर भूल जाएँ हम|

अहमद फ़राज़

मेरी तरह तुझको भी तन्हा रक्खे!

हँस न इतना भी फ़क़ीरों के अकेले-पन पर,
जा ख़ुदा मेरी तरह तुझको भी तन्हा रक्खे|

अहमद फ़राज़

और का होने दे न अपना रक्खे!

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है,
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे|

अहमद फ़राज़

तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे!

हमको अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा,
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे|

अहमद फ़राज़

जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे!

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना,
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे|

अहमद फ़राज़

वो किसे प्यासा रक्खे!

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे,
किसको सैराब करे वो किसे प्यासा रक्खे|

अहमद फ़राज़

याद का आसरा!

आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| ‘नंदन’ जी एक श्रेष्ठ कवि और बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका के संपादक थे| पहले भी मैंने नंदन जी की कुछ रचनाएं शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह सुंदर गीत–


तेरी याद का ले के आसरा ,मैं कहाँ-कहाँ से गुज़र गया,
उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ, वो तो आईना देख के डर गया।

मेरे ज़ेहन में कोई ख़्वाब था
उसे देखना भी गुनाह था
वो बिखर गया मेरे सामने
सारा गुनाह मेरे सर गया।

मेरे ग़म का दरिया अथाह है
फ़क़त हौसले से निबाह है
जो चला था साथ निबाहने
वो तो रास्ते में उतर गया।

मुझे स्याहियों में न पाओगे
मैं मिलूंगा लफ़्ज़ों की धूप में
मुझे रोशनी की है जुस्तज़ू
मैं किरन-किरन में बिखर गया।

उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ, वो तो आईना देख के डर गया।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले!

बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें,
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले|

कैफ़ी आज़मी