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आँख बच्ची की पनीली है!

आज अदम गोंडवी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| ठेठ देहाती अंदाज़ में आम जनता के जीवन की सच्चाइयों को अदम गोंडवी जी ने बड़े सलीके के साथ बेबाक़ी के साथ अभिव्यक्त किया है|


लीजिए आज अदम गोंडवी जी की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।

भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें!

ज़नाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| ‘नूर’ साहब उस समय शायरी के क्षेत्र में सक्रिय गिने-चुने हिन्दू शायरों में से एक थे| कई बार ऐसी प्रतियोगिता भी होती थीं, जिनमें एक मिसरे को लेकर ग़ज़ल के शेर लिखने को कहा जाता था|


एक बार ग़ज़ल लिखने के लिए मिसरा दिया गया था- ‘क़ाफिर हैं वो लोग जो कायल नहीं इस्लाम के’| इस पर नूर साहब ने शेर इस प्रकार लिखा था- ‘लाम के मानिंद हैं, गेसू मेरे घनश्याम के, क़ाफ़िर हैं वो लोग जो कायल नहीं ‘इस लाम’ के| खैर ये कहीं पढ़ा था अचानक याद आ गया|


लीजिए नूर साहब की ग़ज़ल का आनंद लीजिए-


यारो घिर आई शाम, चलो मयकदे चलें,
याद आ रहे हैं जाम, चलो मयकदे चलें|

दैरो-हरम पे खुल के जहाँ बात हो सके,
है एक ही मुक़ाम, चलो मयकदे चलें|

अच्छा, नहीं पियेंगे जो पीना हराम है,
जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें|


यारो जो होगा देखेंगे, ग़म से तो हो निजात,
लेकर ख़ुदा का नाम, चलो मयकदे चलें|

साक़ी भी है, शराब भी, आज़ादियाँ भी हैं,
सब कुछ है इंतज़ाम, चलो मयकदे चलें|

ऐसी फ़ज़ा में लुत्फ़े-इबादत न आएगा,
लेना है उसका नाम, चलो मयकदे चलें|


फ़ुरसत ग़मों से पाना अगर है तो आओ ‘नूर’,
सबको करें सलाम, चलो मयकदे चलें||


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है !

आज दुष्यंत कुमार जी की लिखी एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों में शामिल थी और जिसको उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल किया गया था| इसमें सभी रचनाएँ आपातकाल के विरोध में आन्दोलनधर्मी ग़ज़लें थीं|

उस समय आपातकाल के विरोध में जयप्रकाश नारायण जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था और इस ग़ज़ल के एक शेर में भी कहा गया है- ‘एक बूढ़ा आदमी है देश में, या यूं कहें, इस अंधेरी रोशनी में एक रोशनदान है’|

लीजिए प्रस्तुत है उस ज़माने में अत्यंत लोकप्रिय हुई यह ग़ज़ल-

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है|

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है|

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है|

मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है|

इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके,
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है|

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है|

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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Poetry

सुख से डर!

हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा का कविता लेखन का अपना अलग ही अंदाज़ था, अक्सर वे बातचीत के लहज़े में कविता लिखते थे| भारतीय ज्ञानपीठ सहित अनेक साहित्यिक और राष्ट्रीय पुरस्कारों से विभूषित भवानी दादा हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं|

आज की इस रचना में भी आप उनकी रचनाधर्मिता की बानगी पाएंगे, जहां कवि ‘सुख’ से डरता है| लीजिए इस रचना का आनंद लीजिए-


जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,
इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,
क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,
बड़े सुख आ जाएं घर में
तो कोई ऐसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं।


यहां एक बात
इससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,
बड़े सुखों को देखकर
मेरे बच्चे सहम जाते हैं,
मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें
सिखा दूं कि सुख कोई डरने की चीज नहीं है।


मगर नहीं
मैंने देखा है कि जब कभी
कोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में
बाजार में या किसी के घर,
तो उनकी आँखों में खुशी की झलक तो आई है,
किंतु साथ साथ डर भी आ गया है।


बल्कि कहना चाहिये
खुशी झलकी है, डर छा गया है,
उनका उठना, उनका बैठना
कुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,
और मुझे इतना दु:ख होता है देख कर
कि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता।


मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,
इससे डरो मत बल्कि बेफिक्री से बढ़ कर इसे छू लो।
इस झूले के पेंग निराले हैं
बेशक इस पर झूलो,
मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़ते
खड़े खड़े ताकते हैं,
अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ।


तो चीख मार कर भागते हैं,
बड़े बड़े सुखों की इच्छा
इसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,
कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था
अब मैंने वह फोड़ दी है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

सूराख पत्थरों में होते न उँगलियों से!

आज स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, स्वर्गीय त्यागी जी अपने अलग तेवरों के लिए जाने जाते थे|

आज की इस ग़ज़ल में भी उन्होंने कविता लेखन के बारे में कुछ अच्छी बात की है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-


जा पास मौलवी के या पूछ जोगियों से।
सूराख पत्थरों में होते न उँगलियों से ।

तिनके उछालते तो बरसों गुज़र गए हैं
अब खेल कुछ नया-सा तू खेल आँधियों से ।

मौसम के साथ भी क्या कुछ बदल गया हूँ
हर रोज पूछता हूँ मैं ये पड़ोसियों से ।

जिस काम के लिए कुछ अल्फाज़ ही बहुत थे
वह काम ले रहा हूँ इस वक्त गालियों से ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है!

एक बार फिर से आज, हिन्दी कवि सम्मेलनों को अपने सुरीले गीतों से चमत्कृत करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|


अवस्थी जी की काव्य मंचों पर अपनी एक अलग पहचान थी, मुझे आशा है कि आपको यह गीत भी अलग तरह का लगेगा-

तुम्‍हारी चाँदनी का क्‍या करूँ मैं,
अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है|

किसी गुमनाम के दुख-सा
अजाना है सफ़र मेरा,
पहाड़ी शाम-सा तुमने
मुझे वीरान में घेरा|


तुम्‍हारी सेज को ही क्‍यों सजाऊँ,
समूचा ही शहर मेरे लिए है|

थका बादल, किसी सौदामिनी
के साथ सोता है,
मगर इंसान थकने पर
बड़ा लाचार होता है|


गगन की दामिनी का क्‍या करूँ मैं,
धरा की हर डगर मेरे लिए है|

किसी चौरास्‍ते की रात-सा
मैं सो नहीं पाता,
किसी के चाहने पर भी
किसी का हो नहीं पाता|

मधुर है प्‍यार, लेकिन क्‍या करूँ मैं,
जमाने का ज़हर मेरे लिए है|


नदी के साथ मैं, पहुँचा
किसी सागर किनारे,
गई ख़ुद डूब, मुझको
छोड़ लहरों के सहारे|

निमंत्रण दे रही लहरें करूँ क्‍या,
कहाँ कोई भँवर मेरे लिए है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Film Song

इन आँखों का हर इक आँसू ,मुझे मेरी क़सम दे दो!

प्रसिद्ध शायर और फिल्मी गीतकार- जनाब मेहंदी अली खान साहब का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| उन्होंने फिल्मों को अनेक सुंदर गीत दिए हैं और 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘आपकी परछाइयाँ’ का यह गीत भी काफी लोकप्रिय हुआ था| मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में यह गीत लता मंगेशकर जी ने अपने अनूठे अंदाज़ में गाया है|

लीजिए राजा मेहंदी अली खान साहब के लिखे इस गीत का आनंद लीजिए-


अगर मुझ से मुहब्बत है मुझे सब अपने ग़म दे दो,
इन आँखों का हर इक आँसू मुझे मेरी क़सम दे दो|
अगर मुझ से …

तुम्हारे ग़म को अपना ग़म बना लूँ तो क़रार आए,
तुम्हारा दर्द सीने में छुपा लूँ तो क़रार आए,
वो हर शय जो तुम्हें दुख दे मुझे मेरे सनम दे दो|
अगर मुझ से …


शरीक-ए-ज़िन्दगी को क्यूँ शरीक-ए-ग़म नहीं करते,
दुखों को बाँट कर क्यूँ इन दुखों को कम नहीं करते,
तड़प इस दिल की थोड़ी-सी मुझे मेरे सनम दे दो|
अगर मुझ से …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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Poetry

जाने क्या हो गया सवेरों को!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

जीवन में बहुत तरह की परिस्थितियों, बहुत सी परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है, आज तो पूरी मानव-जाति को कोरोना की परीक्षा देनी पड़ी है और हमारे देश पर यह संकट इस समय कुछ अधिक ही गहरा है|

इस परिवेश में, आज मुझे आज यह गीत याद आ रहा है, लीजिए प्रस्तुत है-  

अब की यह बरस
बड़ा तरस-तरस बीता
दीवारें नहीं पुतीं, रंग नहीं आए
एक-एक माह बाँध, खींच-खींच लाए
अब की यह बरस

जाने क्या हो गया सवेरों को
रोगी की तरह उठे खाट से
रूखे-सूखे दिन पर दिन गए
किसी नदी के सूने घाट-से

हमजोली शाखों के हाथ-पाँव
पानी में तैर नहीं पाए

शामें सब सरकारी हो गईं
अपनापन पेट में दबोच कर
छाती पर से शहर गुज़र गया
जाने कितना निरीह सोच कर

बिस्तर तक माथे की मेज़ पर
काग़ज़ दो-चार फड़फड़ाए

वेतन की पूर्णिमा नहीं लगी
दशमी के चाँद से अधिक हमें
शीशों को तोड़ गई कालिमा
समझे फिर कौन आस्तिक हमें

खिड़की से एक धार ओज कर
हम आधी देह भर नहाए

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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Poetry

दीवार की मरम्मत!

एक बार फिर से आज एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

दीवार की मरम्मत

ऐसा कुछ है, जो दीवार को पसंद नहीं करता,
वह, उसके नीचे जमी हुई जमीन को नीचे से फुला देता है,
और ऊपर लगे पत्थरों को धूप में फैला देता है;
और बीच में इतनी जगह बना देता है कि दो लोग भी सटकर पार हो सकते हैं।


शिकारियों द्वारा किए गए ऐसे कामों की बात अलग हैं:
मैंने उनको देखा है और उसकी मरम्मत की है
जहाँ वे एक भी पत्थर को अपनी जगह नहीं लगा रहने देंगे,
लेकिन किसी छिपे हुए खरगोश को अवश्य बाहर निकाल लेंगे,
अपने भौंकते कुत्ते को खुश करने के लिए।


मैं दीवारों में बने ऐसे संकरे रास्तों की बात कर रहा हूँ,
जिनको किसी ने बनते नहीं देखा, इसकी आवाज़ भी नहीं सुनी।
लेकिन वसंत में मरम्मत का समय आने पर, हम उन्हें वहाँ पाते हैं।

मैं अपने पड़ौसी को पहाड़ी के पार;
और जब किसी दिन हम उस लाइन पर एक साथ चलने-
और अपने बीच की दीवार को फिर से दुरुस्त करने के लिए मिलते हैं,
तब यह जानने का अवसर देता हूँ।
जब हम चलते हैं, तो वह दीवार अपने बीच रखते हैं।


और प्रत्येक बड़ा पत्थर जो किसी भी तरफ गिर गया है,
और कुछ छोटे सपाट टुकड़े और कुछ गेंद जैसे गोल,
उनको सही स्थान पर स्थिर करने के लिए, हमें कुछ समय तक प्रयास करना होता है:
“जहाँ हो वहीं बने रहो, जब तक हम पीठ नहीं फेर लेते!”
उन पत्थरों पर काम करते समय हम अपनी उंगलियों को भी खुरदुरा बना लेते हैं।


अरे, यह भी एक प्रकार का मैदानी खेल है,
एक-एक खिलाड़ी, दोनो तरफ, यह इससे थोड़ा अधिक है:
जहाँ पर यह है, वहाँ हमें दीवार की जरूरत नहीं है;

उसके देवदार (सनोबर) के पेड़ हैं और मेरा सेब का बगीचा,
मेरे सेब के पेड़ उस पार कभी नहीं जाएंगे,
और उसके सनोबर के नीचे जाकर चिल्गोजे नहीं खाएंगे, मैं उससे कहता हूँ।
वह इतना ही कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”


वसंत मेरे मस्तिष्क में शरारत की तरह आता है, मुझे लगता है
अगर मैं उसके दिमाग में एक बात डाल सकूं:
“वे लोग अच्छे पड़ौसी क्यों बनते हैं? क्या ये
वहाँ नहीं होता जहाँ गाय होती हैं? लेकिन यहाँ तो कोई गाय नहीं है।


दीवार बनाने से पहले मैं पूछना चाहता हूँ,
क्या है जिसे मैं दीवार के अंदर या किसे उससे बाहर कर रहा हूँ,
और किसको मेरे कारण खतरा हो सकता था।

कुछ है, जिसे दीवार पसंद नहीं है,
“वह इसको गिरा हुआ देखना चाहता है।” मैं उसको “पारलौकिक बौना” कह सकता हूँ,
परंतु वह वास्तव में बौना नहीं है, और शायद मैं हूँ।


उसने अपने आपसे कहा, मैं उसको वहाँ देख रहा हूँ,
वह अपने हर हाथ में एक पत्थर को मजबूती से ऊपर उठाकर ला रहा है
पाषाण युग के बर्बर हथियार की तरह,
मुझे लगता है कि वह अंधेरे में चल रहा है,
केवल जंगलों का और पेड़ों की छायाओं का अंधेरा नहीं,
वह अपने पिता के कहने के अनुसार नहीं चलेगा,
और वह इसका विचार बहुत अच्छी तरह रखना चाहता है,
वह फिर से कहता है, “अच्छी बाड़ लगाने से अच्छे पड़ौसी बनते हैं।”


– रॉबर्ट फ्रॉस्ट
और अब मूल अंग्रेजी कविता-

Mending Wall

Something there is that doesn’t love a wall,
That sends the frozen-ground-swell under it,
And spills the upper boulders in the sun;
And makes gaps even two can pass abreast.
The work of hunters is another thing:
I have come after them and made repair
Where they have left not one stone on a stone,
But they would have the rabbit out of hiding,
To please the yelping dogs. The gaps I mean,
No one has seen them made or heard them made,

But at spring mending-time we find them there.

I let my neighbour know beyond the hill;
And on a day we meet to walk the line
And set the wall between us once again.
We keep the wall between us as we go.
To each the boulders that have fallen to each.


And some are loaves and some so nearly balls
We have to use a spell to make them balance:
“Stay where you are until our backs are turned!”
We wear our fingers rough with handling them.

Oh, just another kind of out-door game,
One on a side. It comes to little more:
There where it is we do not need the wall:
He is all pine and I am apple orchard.
My apple trees will never get across
And eat the cones under his pines, I tell him.


He only says, “Good fences make good neighbours.”
Spring is the mischief in me, and I wonder
If I could put a notion in his head:
“Why do they make good neighbours? Isn’t it
Where there are cows? But here there are no cows.

Before I built a wall I’d ask to know
What I was walling in or walling out,
And to whom I was like to give offence.


Something there is that doesn’t love a wall,
That wants it down.” I could say “Elves” to him,
But it’s not elves exactly, and I’d rather
He said it for himself. I see him there
Bringing a stone grasped firmly by the top
In each hand, like an old-stone savage armed.

He moves in darkness as it seems to me,
Not of woods only and the shade of trees.
He will not go behind his father’s saying,
And he likes having thought of it so well

He says again, “Good fences make good neighbours.”

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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जिस दिन अपने जूड़े में ,उसने कुछ फूल सजाये थे!

लीजिए एक बार फिर से जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल का आनंद लेते हैं| जैसा कि आप जानते ही हैं क़तील साहब भारतीय उपमहाद्वीप के एक महान शायर थे और अनेक प्रसिद्ध गायकों ने उनकी ग़ज़लों आदि को अपना स्वर दिया है|

यह भी क़तील साहब की अलग किस्म की ग़ज़ल है, हमारे इरादे कुछ और होते हैं, लेकिन होता वही है जो होना होता है, लीजिए इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे,
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे|

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात,
प्यार की बातें करते करते उस के नैन भर आये थे|

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की,
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे|

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में,
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे|


कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू,
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे|

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को,
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे|


रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”,
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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