बिखरने से न रोके कोई!

अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई,
और बिखर जाऊँ तो, मुझको न समेटे कोई|

परवीन शाकिर

महक उठे गांव गांव!

स्वर्गीय किशन सरोज जी मेरे अत्यंत प्रिय गीतकार थे, मैंने पहले भी उनके बहुत से गीत शेयर किए हैं, उनसे जो स्नेह मुझे प्राप्त करने को सौभाग्य मिला उसका उल्लेख भी मैंने किया है|

अधिकतर मैंने किशन जी के वे गीत शेयर किए हैं जो मंचों पर वे पढ़ते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक नवगीत, जिसमें सावन ऋतु का वर्णन करते हुए बताया गया है कि किस प्रकार विरहिन के मामले में सावन और जेठ एक साथ अपना प्रभाव दिखाते हैं–


महक उठे गांव-गांव
ले पुबांव से पछांव
बहक उठे आज द्वार, देहरी अँगनवा।

बगियन के भाग जगे
झूम उठी अमराई
बौराए बिरवा फिर
डोल उठी पुरवाई
उतराए कूल-कूल
बन-बन मुरिला बोले, गेह में सुअनवा।

घिर आए बदरा फिर
संग लगी बीजुरिया
कजराई रातें फिर
बाज उठी बांसुरिया
अन्धियरिया फैल-फैल
गहराये गैल-गैल
छिन- छिन पै काँप उठत, पौरि में दियनवा।


प्रान दहे सुधि पापिन
गली-गली है सूनी
पाहुना बिदेस गए
पीर और कर दूनी
लहराए हार-हार
मन हिरके बार-बार
जियरा में जेठ तपे, नैन में सवनवा।

(आभार- यहाँ उद्धृत करने के लिए कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध – ‘कविता कोश‘ तथा ‘Rekhta‘ से लेता हूँ)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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झूमर तेरे माथे पे हिला करता है!

रात यों चाँद को देखा है नदी में रक्साँ,
जैसे झूमर तेरे माथे पे हिला करता है|

क़तील शिफ़ाई

दिल के धड़कने का गिला करता है!

मैं तो बैठा हूँ दबाये हुये तूफ़ानों को,
तू मेरे दिल के धड़कने का गिला करता है|

क़तील शिफ़ाई

जो शाहों को मिला करता है !

देर से आज मेरा सर है तेरे रानों पर,
ये वो रुत्बा है जो शाहों को मिला करता है |

क़तील शिफ़ाई

गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है!

जो भी गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है,
वो मेरी तंगी-ए-दामाँ का गिला करता है|

क़तील शिफ़ाई

घर के अन्दर किसने आग लगाई है!

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे,
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है|

क़तील शिफ़ाई

शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है!

सब कहते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर,
मैं दिल में सोचूँ शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है|

क़तील शिफ़ाई

तुझमें कितनी गहराई है!

देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को,
पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है|

क़तील शिफ़ाई

उनमें नींद पराई है!

यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं,
आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है|

क़तील शिफ़ाई