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लो,एक बजा दोपहर हुई!

हिन्दी मंचों पर गीतों के दिव्य हस्ताक्षर स्वर्गीय भारत भूषण जी, जो मेरठ, उत्तर प्रदेश से थे और उनके अनेक गीत मैं हमेशा गुनगुनाता रहा हूं, जैसे – चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखाड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’, मैं बनफूल, भला मेरा- कैसा खिलना, क्या मुरझाना’ आदि-आदि| मैं सभी गीतों के मुखड़े लिखूंगा तब भी यह आलेख पूरा हो जाएगा|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो गर्मी की दोपहर के कुछ दृश्य प्रस्तुत करता है, काफी प्रायोगिक किस्म का गीत है यह| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का ये गीत-



लो
एक बजा दोपहर हुई,
चुभ गई हृदय के बहुत पास
फिर हाथ घड़ी की
तेज सुई|

पिघली
सड़कें झरती लपटें
झुँझलाईं लूएँ धूल भरी,
किसने देखा किसने जाना
क्यों मन उमड़ा क्यों
आँख चुई|

रिक्शेवालों की
टोली में पत्ते कटते पुल के नीचे,
ले गई मुझे भी ऊब वहीं कुछ सिक्के मुट्ठी में भींचे,
मैंने भी एक दाँव खेला, इक्का माँगा पर
पर खुली दुई|

सहसा चिंतन को
चीर गई, आँगन में उगी हुई बेरी,
बह गई लहर के साथ लहर, कोई मेरी कोई तेरी।
फिर घर धुनिये की ताँत हुआ फिर प्राण हुए
असमर्थ रुई|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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ब्लैक आउट में रोशनी की तरह!

मैंने पहले भी सूर्यभानु गुप्त जी की कुछ रचनाएँ शेयर की हैं| वे बहुत सुंदर रचनाएँ, विशेष रूप से गज़लें लिखते हैं, जिनमें उन्होंने अनेक एक्सपेरीमेंट किए हैं| कुछ शेर तो उनके मुझे अक्सर याद आते हैं, जैसे – ‘जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं, नदी बांध के पत्थर उतर गया हूँ मैं’, ‘दिल वाले फिरते हैं दर-दर सिर पर अपनी खाट लिए’, ‘शाम अजायब घर के आगे, बैठा था भूखा-प्यासा, अपने मरे हुए दादा की, फोटो एक सम्राट लिए; आदि-आदि| वैसे सूर्यभानु गुप्त जी ने कुछ प्रयोग धर्मी फिल्मों और टीवी सीरियल्स के लिए भी गीत आदि लिखे हैं|


आज की इस गजल में भी काफी एक्सपेरीमेंट भाषा और अभिव्यक्ति के स्तर पर देखे जा सकते हैं-



अपने घर में ही अजनबी की तरह,
मैं सुराही में इक नदी की तरह|

एक ग्वाले तलक गया कर्फ़्यू,
ले के सड़कों को बंसरी की तरह|

किससे हारा मैं, ये मेरे अन्दर,
कौन रहता है ब्रूस ली की तरह|

उसकी सोचों में मैं उतरता हूँ,
चाँद पर पहले आदमी की तरह|


अपनी तनहाइयों में रखता है,
मुझको इक शख़्स डायरी की तरह|

मैंने उसको छुपा के रक्खा है,
ब्लैक आउट में रोशनी की तरह|

टूटे बुत रात भर जगाते हैं,
सुख परेशां है गज़नवी की तरह|

बर्फ़ गिरती है मेरे चेहरे पर,
उसकी यादें हैं जनवरी की तरह|


वक़्त-सा है अनन्त इक चेहरा,
और मैं रेत की घड़ी की तरह|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!

कुछ रचना पंक्तियाँ ऐसी लिखी जाती हैं कि वे मुहावरा बन जाती हैं| जैसे डॉ बशीर बद्र जी का एक शेर था- ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए|’ ऐसी ही एक पंक्ति आज की कविता की है, जिसको अक्सर लोग कहावत की तरह दोहराते हैं| वैसे इसके रचनाकार ऐसे हैं, जिनकी कविताएं हम बचपन में पढ़ा करते थे, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविताएं- ‘वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो’ आदि|


लीजिए आज प्रस्तुत है हमारे स्वाधीनता संग्राम के समय सक्रिय -स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की यह प्रेरक कविता, जिसकी एक पंक्ति को आज भी प्रेरणा देने के लिए दोहराया जाता है-



लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है,
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है,
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती|
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नहीं भूलना है मुझे – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Let Me Not Forget’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



नहीं भूलना है मुझे!



यदि यह मेरे भाग्य में नहीं है कि मैं तुमसे इस जीवन में मिलूँ
तो फिर मुझे हमेशा यही महसूस करने दो कि मैं तुम्हें देख ही नहीं पाया था
— एक क्षण के लिए भी मत भूलने दो,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|

जैसे-जैसे मेरे दिन बीतते जाते हैं, इस दुनिया के भीड़ भरे बाज़ार में
और हर दिन कमाए गए लाभ से मेरे हाथ भरते जाते हैं,
तब हमेशा मुझे यह महसूस करने दो कि मैंने कुछ नहीं कमाया है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|



जब मैं मार्ग के किनारे बैठ जाऊं, थका और हाँफता हुआ,
जब मेरा अपना बिस्तर फैल जाए, नीचे मिट्टी में,

मुझे तब भी हमेशा महसूस करने दो, कि लंबी यात्रा अभी करनी बाकी है
—मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|


जब मेरे कमरों को सजाया गया हो, और बांसुरी की धुन
और क़हक़हों की ध्वनि तेज हो,
मुझे हमेशा यह महसूस करने दो कि मैंने तुम्हें अपने घर नहीं बुलाया है,
— मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना है,
मुझे इसी कष्ट का आघात ढोने दो मेरे सपनों के दौरान
और मेरे जागृत रहने की अवधि में भी|




-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Let Me Not Forget



If it is not my portion to meet thee in this life
then let me ever feel that I have missed thy sight
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

As my days pass in the crowded market of this world
and my hands grow full with the daily profits,
let me ever feel that I have gained nothing
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.


When I sit by the roadside, tired and panting,
when I spread my bed low in the dust,
let me ever feel that the long journey is still before me
—let me not forget a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours.

When my rooms have been decked out and the flutes sound
and the laughter there is loud,
let me ever feel that I have not invited thee to my house
—let me not forget for a moment,
let me carry the pangs of this sorrow in my dreams
and in my wakeful hours




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अलविदा राहत इंदौरी जी!

विख्यात उर्दू शायर और फिल्मी गीतकार राहत इंदौरी जी नहीं रहे| जैसा कि राहत जी ने खुद ही अपने संदेश द्वारा अपने प्रशंसकों को सूचित किया था, वे कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने के बाद इंदौर के अरविंदो अस्पताल में भर्ती हुए थे और शायद 24 घंटे से कम अवधि में ही दिल का दौरा पड़ जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई| 1जनवरी 1950 को जन्मे राहत जी 70 वर्ष के थे| कोरोना के साथ ये विशेष खतरा रहता है कि यदि व्यक्ति की उम्र अधिक है अथवा उसको कोई गंभीर रोग है, जैसे – मधुमेह, हृदय रोग आदि तो कोरोना की स्थिति में उसकी आंतरिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाने के कारण मृत्यु का खतरा अधिक हो जाता है|


किसी का अंदाज़-ए-बयां अक्सर उसकी पहचान बनता है और रचनात्मकता के क्षेत्र में तो यही मुख्य बात होती है| किसी ने कहा था कि अगर आप कविता में लिखते हैं कि ‘मैं भूखा हूँ’ तो यह बात तो कोई वास्तव में भूखा व्यक्ति ज्यादा प्रभावी ढंग से कह सकता है| आपकी रचना की खूबसूरती तो इसमें है कि आप ‘भूख’ शब्द का प्रयोग किए बिना उसका एहसास करा दें|


राहत जी का अंदाज़ वास्तव में निराला था, जैसे कविता के बारे में यह भी कहा जाता है ‘दिव्य अर्थ का प्रतिपादन’! राहत जी को मुशायरे लूटने वाला शायर कहा जाता था| उनके मंच पर आते ही श्रोता मानते थे कि अब मज़ा आने वाला है| उनकी याद में आज मैं उनके कुछ छिटपुट शेर प्रस्तुत करते हुए उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


रोज तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चाँद पागल है, अंधेरे में निकाल पड़ता है|
****
बनके इक हादसा किरदार में आ जाएगा,
जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा|
*****
ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|
***
दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ|
***
मैं देर रात गए जब भी घर पहुँचता हूँ
वो देखती है बहुत छान के, फटक के मुझे|
***
मैं बस्ती में आख़िर किस से बात करूँ,
मेरे जैसा कोई पागल भेजो न|
***
नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से,
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं|

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ, रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं|
***
उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब,
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब|
***
दोस्ती जब किसी से की जाये|
दुश्मनों की भी राय ली जाये|


ये कुछ शेर राहत जी के, उनकी याद में शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनके शेर और गज़लें शामिल करने के लिए बहुत से ग्रंथ भी कम पड़ जाएंगे| इन शब्दों के साथ में इस जनता के लाडले शायर को अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मौसम नहीं, मन चाहिए !

एक बार फिर से आज हिन्दी काव्य मंचों पर गीत परंपरा के एक लोकप्रिय स्वर रहे, स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस गीत में यही संदेश दिया गया है कि अगर हमारे हौसले बुलंद हों, अगर हमारे मन में पक्का संकल्प हो तो हम कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक लोकप्रिय गीत-

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं,
हारे नहीं जब हौसले
तब कम हुये सब फासले,
दूरी कहीं कोई नहीं, केवल समर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

हर दर्द झूठा लग रहा, सहकर मजा आता नहीं,
आँसू वही आँखें वही
कुछ है ग़लत कुछ है सही,
जिसमें नया कुछ दिख सके, वह एक दर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

राहें पुरानी पड़ गईं, आख़िर मुसाफ़िर क्या करे !
सम्भोग से सन्यास तक
आवास से आकाश तक,
भटके हुये इन्सान को, कुछ और जीवन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कोई न हो जब साथ तो, एकान्त को आवाज़ दें !
इस पार क्या उस पार क्या !
पतवार क्या मँझधार क्या !!
हर प्यास को जो दे डुबा वह एक सावन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कैसे जियें कैसे मरें यह तो पुरानी बात है !
जो कर सकें आओ करें
बदनामियों से क्यों डरें,
जिसमें नियम-संयम न हो, वह प्यार का क्षण चाहिए!

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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ये मुझसे तगड़े हैं- रमेश रंजक

हिन्दी के चर्चित नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ, इस गीत में रंजक जी ने कितनी खूबसूरती से यह अभिव्यक्त किया है कि दुख घर से जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



जिस दिन से आए
उस दिन से
घर में यहीं पड़े हैं,
दुख कितने लंगड़े हैं ?

पैसे,
ऐसे अलमारी से,
फूल चुरा ले जायें बच्चे
जैसे फुलवारी से|

दंड नहीं दे पाता
यद्यपि-
रँगे हाथ पकड़े हैं ।

नाम नहीं लेते जाने का,
घर की लिपी-पुती बैठक से
काम ले रहे तहख़ाने का,
धक्के मार निकालूँ कैसे ?

ये मुझसे तगड़े हैं ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कृष्णकली – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Krishnakali’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता



कृष्णकली



गाँव में सब उसे साँवली लड़की कहते हैं,
परंतु मेरे लिए वह कृष्णकली का पुष्प है,
एक मेघाच्छादित दिन में, खेत में
मैंने देखीं, साँवली लड़की की गहरी, हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर ढका नहीं था,
उसके खुले केश उसकी पीठ पर झूल रहे थे|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

दो काली गायें रँभा रही थीं,
क्योंकि घने बादलों के कारण अंधेरा हो गया था|
इसीलिए चिंतित, त्वरित कदमों से,
साँवली लड़की अपनी झौंपड़ी से निकली|
उसने आकाश की ओर आँखें तरेर कर देखा,
एक क्षण उसने बादलों की गड़गड़ाहट को सुना|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

पुरवा के एक झौंके ने
चावलों के खेत को लहरा दिया|
मैं मेड़ के पास खड़ा था,
अकेला खेत में|
उसने मेरी तरफ देखा या नहीं
यह हम दोनों को ही मालूम है|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

ऐसे ही होता है जब जेठ के महीने में
उत्तर-पूर्व में काजल जैसे काले बादल छा जाते हैं;
कोमल गहन छाया
तमाल कुंजों पर पसर जाती है, आषाढ़ माह में;
और अचानक आनंद से हृदय भर जाता है,
श्रावण माह की रात में|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|

मेरे लिए तो वह कृष्णकली का पुष्प है,
बाकी लोग उसे जिस भी नाम से पुकारते हों|
मयनापारा के गाँव में,
मैंने देखीं उस साँवली लड़की की हिरनी जैसी आँखें|
उसका सिर नहीं ढका था,
और उसके पास शर्मिंदा महसूस करने का समय ही नहीं था|

साँवली? वह जितनी भी साँवली हो,
मैंने उसकी गहरी, हिरनी जैसी आँखें देखी हैं|





-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Krishnakali


In the village they call her the dark girl
but to me she is the flower Krishnakali
On a cloudy day in a field
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She had no covering on her head,
her loose hair had fallen on her back.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelleeyes.

Two black cows were lowing,
as it grew dark under the heavy clouds.
So with anxious, hurried steps,
the dark girl came from her hut.
Raising her eyebrows toward the sky,
she listened a moment to the clouds’ rumble.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

A gust of the east wind
rippled the rice plants.
I was standing by a ridge,
alone in the field.
Whether or not she looked at me
Is known only to us two.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

This how the Kohldark cloud
rises in the northeast in Jaistha;
the soft dark shadow
descends on the Tamal grove in Asharh;
and sudden delight floods the heart
in the night of Sravan.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.

To me she is the flower Krishnakali,
whatever she may be called by others.
In a field in Maynapara village
I saw the dark girl’s dark gazelle-eyes.
She did not cover her head,
not having the time to feel embarrassed.

Dark? However dark she be,
I have seen her dark gazelle-eyes.




-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ

आज फिर से मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का एक गीत याद आ रहा है| जिस प्रकार हमारे मन में अनेक भावनाएँ आती हैं, तब कभी हम उनको सीधे अपने शब्दों में व्यक्त कर देते हैं और कभी कुछ उपमाओं, उपमानों आदि का सहारा लेते हैं अपनी बात कहने के लिए और यह काम कविता में अधिक होता है|

आज मुकेश जी का एक ऐसा ही गीत याद आ रहा है, जिसमें आकाश में उड़ते पक्षियों के माध्यम से कवि ने प्रेमियों के मन की बात कही है| यह गीत 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘प्यासे पंछी’ से है और इसे महमूद जी पर फिल्माया गया है| इस गीत के लेखक हैं- कमर जलालाबादी जी और इसका संगीत दिया है कल्याणजी आनंदजी ने|

लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत-

प्यासे पंछी नील गगन में, गीत मिलन के गाएँ,
ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

ओ मतवाले राही तुझको मंज़िल तेरी बुलाए,
किसको ख़बर है इन राहों में कौन कहाँ मिल जाए|
जैसे सागर की दो लहरें चुपके से मिल जाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में…

छुपी हैं आहें किस प्रेमी की, बादल की आहों में,
बिखरी हुई है ख़ुश्बू कैसी, अलबेली राहों में|
किसकी ज़ुल्फ़ें छू कर आईं, महकी हुई हवाएँ,
गीत मिलन के गाएँ|
प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाएँ,

ये अलबेला दिल है अकेला, साथी किसे बनाएँ|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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छोड़ दो ये – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Leave This’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

छोड़ दो ये



छोड़ दो ये भजन गाना, मंत्र जपना और माला फेरना!
किसकी पूजा करते हो तुम, मंदिर के एकांत अंधेरे कोने में, जबकि सभी दरवाजे बंद हैं?
अपनी आँखें खोलो और देखो, तुम्हारा ईश्वर तुम्हारे सामने नहीं है!

वह है वहां, जहां हलवाहा किसान कठोर जमीन जोत रहा है
और जहां पथ निर्माता पत्थर तोड़ रहा है|
वह उनके साथ है, धूप में और बारिश में,
और उसके कपड़ों पर धूल जमी है|
अपना आवरण उतारो और उसकी ही तरह धूल भरी मिट्टी में आ जाओ!

मुक्ति?
मुक्ति कहाँ मिल सकेगी?
हमारे स्वामी ने स्वयं ही सहर्ष सृजन के सभी बंधन स्वीकार किए हैं;
वह हमेशा के लिए हमारे साथ संबंध में बंधा है|

अपनी ध्यान मुद्रा से बाहर आओ, अपने पुष्पों और सुगंधियों को रहने दो!
क्या फर्क पड़ता है यदि तुम्हारे कपड़े जीर्ण और दागदार हो जाएँ?
उससे वहाँ मिलो और साथ खड़े रहो, अपने माथे पर पसीने के साथ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Leave This


Leave this chanting and singing and telling of beads!
Whom dost thou worship in this lonely dark corner of a temple with doors all shut?
Open thine eyes and see thy God is not before thee!

He is there where the tiller is tilling the hard ground
and where the pathmaker is breaking stones.
He is with them in sun and in shower,
and his garment is covered with dust.
Put off thy holy mantle and even like him come down on the dusty soil!

Deliverance?
Where is this deliverance to be found?
Our master himself has joyfully taken upon him the bonds of creation;
he is bound with us all for ever.

Come out of thy meditations and leave aside thy flowers and incense!
What harm is there if thy clothes become tattered and stained?
Meet him and stand by him in toil and in sweat of thy brow.


-Rabindranath Tagore


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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