पवन सामने है नहीं गुनगुनाना!

आज हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे विश्वास है कि वीरेंद्र मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत आपको अवश्य प्रभावित करेगा|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत–


पवन सामने है नहीं गुनगुनाना
सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना

गगन से धरा पर सुबह छन रही है
किरन डोर खींचे बिना तन रही है
दिए बुझ गए हैं नए जल गए हैं
सपन उठ गए हैं नयन मिल गए हैं
हवा देख कर ही सुनाना तराना
सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना

जरा साँस ले दूर तट का ठिकाना
तरणि ने कहा पर लहर ने न माना

मुझे रात भर तू बहाती रही है
थकी और मुझको थकाती रही है
वहाँ सामने बस यही शब्द तेरे
वही झूठ वो भी सवेरे-सवेरे
मुझे पार जाना नहीं डूब जाना
तरणि ने कहा पर लहर ने न माना

ठहर कर मुझे मंज़िलों तक चलाना
पथिक ने कहा पर डगर ने न माना
अभी है सुबह और आरम्भ मेरा
भरोसा न है यह चरण दम्भ मेरा
गगन धूप छाँही धरा धूप छाँही
कली देख सकती न तू किन्तु राही
मुझे फूल देकर तुझे है सजाना
पथिक ने कहा पर डगर ने न माना

अधूरे प्रणय का कथानक न माना
हृदय ने कहा पर अधर ने न माना
डगर पार जाए वही तो पथिक है
अगर हार जाए कहाँ वो श्रमिक है
नहीं छोड़ता कवि कभी गीत आधा
अधूरी समर्पित हुई थी न राधा
समझ सोच गाना बुरा है जमाना
हृदय ने कहा पर अधर ने न माना


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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फिर से बुला ले वो इशारा न रहा!

क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ,
जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा|

मजरूह सुल्तानपुरी

मैं भी तुम्हारा न रहा!

ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुमसे,
तुम मिरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा|

मजरूह सुल्तानपुरी

राह दिखा दे वही तारा न रहा!

शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे,
जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा|

मजरूह सुल्तानपुरी

कोई हमारा न रहा!

कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा,
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा|

मजरूह सुल्तानपुरी

ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं!

ऐसे हंस हंस के न देखा करो सबकी जानिब,
लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं|

मजरूह सुल्तानपुरी

यूँ तो मिला करती हैं सब से आँखें!

मिलने को यूँ तो मिला करती हैं सब से आँखें,
दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं|

मजरूह सुल्तानपुरी

मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो!

हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो,
राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं|

मजरूह सुल्तानपुरी

ख़ुद अपनी दवा होते हैं!

हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले,
दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं|

मजरूह सुल्तानपुरी

कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं!

यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं,
मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं|

मजरूह सुल्तानपुरी