कालेज स्टूडेंट!

कभी कभी हल्की-फुल्की बात भी करनी चाहिए, यही सोचते हुए आज काका हाथरसी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अपने ज़माने में काका जी काव्य-मंच की एक ज़रूरी आइटम माने जाते थे| बाद में तो कुछ ऐसा होता गया की मंचों पर हास्य कविताओं का ही बोलबाला हो गया| वैसे यह संतुलन बनता-बिगड़ता रहता है|

लीजिए आज आप स्वर्गीय काका जी की यह रचना पढ़ लीजिए, और हाँ इसमें दिमाग लगाने की बिलकुल आवश्यकता नहीं है, एक छात्र का विवरण है इसमें, यद्यपि तब से अब तक ज़माना बहुत बदल चुका है-


फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हडि्डयां घिसते फादर।


पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸
होते रहु दो साल तक फर्स्ट इयर में फेल।
फर्स्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸
साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸
मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।


प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें काका कवि, राय भयंकर तुमको देता¸
बन सकते हो इसी तरह ‘बिगड़े दिल नेता।’


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय शायर रहे स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब ने गीत, ग़ज़ल, दोहे- हर विधा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और उनमें जो कबीर साहब जैसी साफ़गोई और फक्कड़पन दिखाई देता है, वह आज के समय में दुर्लभ है|


इस ग़ज़ल में भी उन्होंने सादगी के साथ कितनी गहरी बात कही है, वह महसूस करने लायक है| लीजिए आज प्रस्तुत है निदा फ़ाज़ली साहब की यह रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने अनूठे अंदाज़ में गाया है-

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला|

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला|

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें,
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला|

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा,
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला|


तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हो,
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

अपनी शुरू की ब्लॉग पोस्ट्स में, मैंने अपनी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों का ज़िक्र किया था, आज उनमें से ही एक पोस्ट को दोहरा रहा हूँ, क्योंकि इसमें आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक प्यारा सा गीत शामिल है और प्रसंग भी मुझे आशा है कि आपको पसंद आएगा|
जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।


मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।


खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।


खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया।

जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।
बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।


काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।


हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन था। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।


अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।


हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-


एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।
सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,
चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,
हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे…
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कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,
बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,
यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥

( पुरइन पात- कमल का पत्ता)


डा. बुद्धिनाथ मिश्र
फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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अपने शहर का रास्ता!

आज फिर से अपने एक पुराने कवि-मित्र को याद कर रहा हूँ| उनके बारे में एक बात यह भी कि मैथिली शरण गुप्त जी शायद उनके नाना थे, या शायद दादा रहे हों, यह ठीक से याद नहीं, वैसे यह रिश्ता महत्वपूर्ण भी नहीं है, ऐसे ही याद आ गया|

हाँ तो मेरे यह मित्र थे स्वर्गीय नवीन सागर जी, कविताओं के अलावा बहुत अच्छी कहानियाँ भी लिखते थे और उनकी कहानियाँ उस समय धर्मयुग, सारिका आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं|


नवीन जी से शुरू की मुलाकातें तो अन्य मित्रों की तरह दिल्ली में ही हुईं, जब वे संघर्ष कर रहे थे, एक दो छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने दिल्ली में काम किया, बाद में वे मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी में अच्छे पद पर तैनात हो गए| मेरे कुछ संबंधी भी उस समय भोपाल में थे और उसके बाद मेरा यह प्रयास रहता था कि जब भी भोपाल जाता था, उनसे अवश्य मिलता था|

नवीन सागर जी का बहुत पहले, वर्ष 2000 में लगभग 52 वर्ष की आयु में ही दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था, उस समय बहुत झटका लगा था| आज जब एक-एक करके कई वरिष्ठ साथी विदा हो रहे हैं, अचानक नवीन जी का खयाल आया|

अब और कुछ न कहते हुए, नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो शहर की संवेदनहीनता को रेखांकित करती है-

आधी रात के वक़्त अपने शहर का रास्‍ता
पराए शहर में भूला|


बड़ा भारी शहर और भारी सन्‍नाटा
कोई वहाँ परिचित नहीं,
परिचित सिर्फ़ आसमान
जिसमें तारे नहीं ज़रा-सा चॉंद,
परिचित सिर्फ़ पेड़
चिड़ियों की नींद में ऊँघते हुए,
परिचित सिर्फ़ हवा
रुकी हुई दीवारों के बीच उदासीन|


परिचित सिर्फ़ भिखारी
आसमान से गिरे हुए चीथड़ों से,
जहाँ-तहाँ पड़े हुए
परिचित सिर्फ़ अस्‍पताल क़त्‍लगाह हमारे,
परिचित सिर्फ़ स्‍टेशन
आती-जाती गाड़ियों के मेले में अकेला
छूटा हुआ रोशन|


परिचित सिर्फ़ परछाइयाँ:
चीज़ों के अँधेरे का रंग,
परिचित सिर्फ़ दरवाज़े बंद और मज़बूत।


इनमें से किसी से पूछता रास्‍ता
कि अकस्‍मात एक चीख़
बहुत परिचित जहाँ जिस तरफ़ से
उस तरफ़ को दिखा रास्‍ता|


कि तभी
मज़बूत टायरों वाला ट्रक मिला
जो रास्‍ते पर था,
ट्रक ड्राइवर गाता हुआ चला रहा था
मैं ऊँघता हुआ अपने शहर पहुँचा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं तेरी ही रुबाई हूँ!

आज ही समाचार मिला कि कवि सम्मेलनों को अपनी सृजनशील और सुरीली प्रस्तुतियों से गरिमा प्रदान करने वाले डॉक्टर कुँवर बेचैन नहीं रहे| मैं उनको श्रद्धांजलि स्वरूप, अपनी पुरानी ब्लॉग पोस्ट्स से उनकी दो रचनाएँ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ|

डॉ कुँवर बेचैन जी मेरे अग्रजों में रहे हैं, उनके दो गीत आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी उस महानन्द मिशन कॉलेज, गाजियाबाद में प्रोफेसर रहे हैं जहां मैंने कुछ समय अध्ययन किया, यद्यपि मेरे विषय अलग थे|
दिल्ली में रहते हुए गोष्ठियों आदि में उनको सुनने का अवसर मिल जाता था, बाद में जब मैं अपनी नियोजक संस्था के लिए आयोजन करता तब उनको वहाँ आमंत्रित करने का अवसर भी मिला|


बेचैन जी कविता के लिए समर्पित व्यक्ति थे और एक से एक मधुर और प्रभावशाली गीत उन्होंने लिखे हैं| यह रचनाएँ भी अपने आप में अलग तरह की हैं|

लीजिए प्रस्तुत है बेचैन जी की यह रचना –

प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी,
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी|


भोर नहीं काला सपना था पलकों के दरवाज़े पर,
हमने यों ही डर के मारे आँख न खोली बाबू जी|


दिल के अंदर ज़ख्म बहुत हैं इनका भी उपचार करो,
जिसने हम पर तीर चलाए मारो गोली बाबू जी|


हम पर कोई वार न करना हैं कहार हम शब्द नहीं,
अपने ही कंधों पर है कविता की डोली बाबू जी|


यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए,
मिली हमें अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी|


सुबह सवेरे जिन हाथों को मेहनत के घर भेजा था,
वही शाम को लेकर लौटे खाली झोली बाबू जी|


एक और गीत, जो बिलकुल अलग तरह का है-


नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।
मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।।


मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;
लहर होते हुए भी तो मेरा मन न लहराया;
मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया।
बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर;
छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।।


मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका;
कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।


पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।|


एक बार फिर से मैं इस सुरीले कवि और महान इंसान को अपनी भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ| ईश्वर उनको अपने चरणों में स्थान दें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मिला विहान को नया सृजन!

आज शुद्ध और बेलौस प्रेम के कवि स्वर्गीय रामानन्द दोषी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| दोषी जी की प्रेम के अभिव्यक्ति अलग ही किस्म की होती थी, उनका प्रसिद्ध गीत है- ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’! काव्य लेखन के अलावा दोषी जी ने कई पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनमें ‘कादंबिनी’ भी शामिल थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामानन्द दोषी जी का यह गीत-

कि तुम मुझे मिलीं
मिला विहान को नया सृजन,
कि दीप को प्रकाश-रेख
चाँद को नई किरन ।

कि स्वप्न-सेज साँवरी
सरस सलज सजा रही,
कि साँस में सुहासिनी
सिहर-सिमट समा रही|
कि साँस का सुहाग
माँग में निखर उभर उठा,
कि गंध-युक्त केश में
बंधा पवन सिहर उठा|

कि प्यार-पीर में विभोर
बन चली कली सुमन,
कि तुम मुझे मिलीं
मिला विहान को नया सृजन ।


कि प्राण पाँव में भरो
भरो प्रवाह राह में,
कि आस में उछाह सम
बसो सजीव चाह में|
कि रोम-रोम रम रहो
सरोज में सुबास-सी,
कि नैन कोर छुप रहो
असीम रूप प्यास-सी|
अबाध अंग-अंग में
उफान बन उठो सजनि,
कि तुम मुझे मिलीं

मिला विहान को नया सृजन ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वो दबदबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज!

अली सरदार जाफ़री साहब का उर्दू अदब में एक अहम मुकाम है, उनको प्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा और अन्य अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए थे| भारतीय फिल्मों में भी उनकी अनेक रचनाओं को शामिल किया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफ़री साहब की यह ग़ज़ल-


एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवाँ है आज,
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशाँ है आज|

लब सी दिये हैं ता न शिकायत करे कोई,
लेकिन हर एक ज़ख़्म के मुंह में ज़बाँ है आज|


तारीकियों ने घेर लिया है हयात को,
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दर्मियाँ है आज|

जीने का वक़्त है यही मरने का वक़्त है,
दिल अपनी ज़िन्दगी से बहुत शादमाँ है आज|

हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ,
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्ताँ है आज|


आये हैं किस निशात से हम क़त्ल-गाह में,
ज़ख़्मों से दिल है चूर नज़र गुल-फ़िशाँ है आज|

ज़िन्दानियों ने तोड़ दिया ज़ुल्म का ग़ुरूर,
वो दब-दबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सूरज सोख न लेना पानी!

डॉक्टर कुँवर बेचैन जी मेरे लिए गुरु तुल्य हैं, मैं भी कुछ समय उसी महाविद्यालय का छात्र रहा जिसमें वे प्रोफेसर थे| दिल्ली में रहते हुए कवि गोष्ठियों में तो उनसे भेंट होती ही रही, बाद में एक आयोजक की भूमिका निभाते हुए भी उनको कवि सम्मेलनों में आमंत्रित करने का सौभाग्य मुझे मिला| बहुत समर्थ रचनाकार और सरल हृदय व्यक्ति हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दें|

लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत-

सूरज !
सोख न लेना पानी !

तड़प तड़प कर मर जाएगी
मन की मीन सयानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

बहती नदिया सारा जीवन
साँसें जल की धारा,
जिस पर तैर रहा नावों-सा
अंधियारा उजियारा,
बूंद-बूंद में गूँज रही है
कोई प्रेम कहानी !

सूरज, सोख न लेना पानी !

यह दुनिया पनघट की हलचल
पनिहारिन का मेला,
नाच रहा है मन पायल का
हर घुंघुरू अलबेला|
लहरें बाँच रही हैं
मन की कोई बात पुरानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इंसान की ख़ुश्बू आती है!

भारतीय उपमहाद्वीप के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई साहब पाकिस्तान के निवासी थे और उन्होंने अत्यंत खूबसूरत ग़ज़लें लिखी हैं जो बहुत लोकप्रिय हुई हैं और ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह आदि प्रमुख गायकों ने उनको गाया है|

लीजिए प्रस्तुत है क़तील शिफ़ाई साहब की यह ग़ज़ल-

बेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती है
जो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती है

कल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गया
हर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती है

तल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों ने
मंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती है

कुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँ
जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की ख़ुश्बू आती है

कुछ तू ही मुझे अब समझा दे ऐ कुफ़्र दुहाई है तेरी
क्यूँ शेख़ के दामन से मुझको इमान की ख़ुश्बू आती है

डरता हूँ कहीं इस आलम में जीने से न मुनकिर हो जाऊँ
अहबाब की बातों से मुझको एहसान की ख़ुश्बू आती है

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उसे तुम भी भूल जाओ!

भारतीय उपमहाद्वीप के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे स्वर्गीय अहमद फ़राज़ साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| अहमद फ़राज़ साहब पाकिस्तान के निवासी थे और उन्होंने अत्यंत खूबसूरत ग़ज़लें लिखी हैं जो बहुत लोकप्रिय हुईं और ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह आदि प्रमुख गायकों ने उनको गाया है|

लीजिए प्रस्तुत है अहमद फ़राज़ साहब की यह ग़ज़ल-

इन्हीं ख़ुशगुमानियों में कहीं जाँ से भी न जाओ,
वो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूँ दिखाओ|

ये उदासियों के मौसम कहीं रायेगाँ न जाएं,
किसी ज़ख़्म को कुरेदो, किसी दर्द को जगाओ|

वो कहानियाँ अधूरी, जो न हो सकेंगी पूरी,
उन्हें मैं भी क्यूँ सुनाऊँ, उन्हें तुम भी क्यूँ सुनाओ|

मेरे हमसफ़र पुराने मेरे अब भी मुंतज़िर हैं,
तुम्हें साथ छोड़ना है तो अभी से छोड़ जाओ|

ये जुदाइयों के रस्ते बड़ी दूर तक गए हैं,
जो गया वो फिर न लौटा, मेरी बात मान जाओ|

किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ “फ़राज़” कब तक,
जो तुम्हें भुला चुका है, उसे तुम भी भूल जाओ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********