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भरकर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा!

स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी एक ऐसे गीतकार थे जो हमेशा कुछ अलग किस्म के गीत लिखते थे| उनकी कुछ गीत पंक्तियाँ जो अक्सर याद आती हैं, उनमें हैं- ‘ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है’, ‘एक भी आँसू न कर बेकार, जाने कब समंदर मांगने आ जाए’, ‘इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ, जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी’ आदि-आदि| बड़े करीने से त्यागी जी हर किस्म के भावों को अपने गीतों में पिरोते थे|


लीजिए आज रामावतार त्यागी जी के इस गीत का आनंद लीजिए-

चाँदी की उर्वशी न कर दे युग के तप संयम को खंडित
भरकर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा ।

मैं मर जाता अगर रात भी मिलती नहीं सुबह को खोकर
जीवन का जीना भी क्या है, गीतों का शरणागत होकर,
मन है राजरोग का रोगी, आशा है शव की परिणीता
डूब न जाये वंश प्यास का पनघट मुझे त्यागना होगा ॥


सपनों का अपराध नहीं है, मन को ही भा गयी उदासी
ज्यादा देर किसी नगरी में रुकते नहीं संत सन्यासी
जो कुछ भी माँगोगे दूँगा ये सपने तो परमहंस हैं
मुझको नंगे पाँव धार पर आँखें मूँद भागना होगा ॥

गागर क्या है – कंठ लगाकर जल को रोक लिया माटी ने
जीवन क्या है – जैसे स्वर को वापिस भेज दिया घाटी ने,
गीतों का दर्पण छोटा है जीवन का आकार बड़ा है
जीवन की खातिर गीतों को अब विस्तार माँगना होगा ॥


चुनना है बस दर्द सुदामा लड़ना है अन्याय कंस से
जीवन मरणासन्न पड़ा है, लालच के विष भरे दंश से
गीता में जो सत्य लिखा है, वह भी पूरा सत्य नहीं है
चिन्तन की लछ्मन रेखा को थोड़ा आज लाँघना होगा ॥


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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कभी घर में सूरज उगा देर से – निदा फ़ाज़ली

एक बार फिर मैं अपने एक अति प्रिय शायर स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब बड़ी शिद्दत से भावों को महसूस करते थे और बड़ी कारीगरी से उन भावों को शेरों के माध्यम से व्यक्त करते थे|


लीजिए आज स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली इस रचना का आनंद लीजिए-


कहीं छत थी, दीवारो-दर थे कहीं,
मिला मुझको घर का पता देर से|
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे,
मगर जो दिया वो दिया देर से|

हुआ न कोई काम मामूल से,
गुजारे शबों-रोज़ कुछ इस तरह|
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर,
कभी घर में सूरज उगा देर से|


कभी रुक गये राह में बेसबब,
कभी वक़्त से पहले घिर आयी शब|
हुए बंद दरवाज़े खुल-खुल के सब,
जहाँ भी गया मैं, गया देर से|

ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है,
यही है जुदाई, यही मेल है|
मैं मुड़-मुड़ के देखा किया दूर तक,
बनी वो ख़मोशी, सदा देर से |


सजा दिन भी रौशन, हुई रात भी,
भरे जाम लगराई बरसात भी|
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी,
जो होना था जल्दी हुआ देर से|

भटकती रही यूँ ही हर बंदगी,
मिली न कहीं से कोई रौशनी|
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी,
हुआ मुझमें रौशन ख़ुदा देर से|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘When You Ask Me To Sing’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो!



जब तुम मुझसे गाने के लिए कहते हो,
मेरा हृदय गर्व से फूल जाता है|
जब मैं अर्थपूर्ण दृष्टि से तुम्हारी तरफ देखता हूँ,
मेरी आँखें आंसुओं से भीग जाती हैं|
मेरे भीतर जो कुछ भी कठोर और कटु है,
वह पिघलकर स्वार्गिक संगीत में ढल जाता है|
मेरी सभी प्रार्थनाओं और विचारों को
पंख लग जाते हैं, और वे खुशी के गीत गाने वाले पक्षी बन जाते हैं|



तुम मेरे गीतों से संतुष्ट होते हो,
मुझे मालूम है इनसे तुम्हें प्रसन्नता मिलती है|
ये मुझे तुम्हारी संगत में ले जाते हैं,
जहां मैं अपने विचारों के बल पर नहीं पहुँच सकता|
मुझे मेरे गीतों के माध्यम से स्वीकार करो!
मेरे गीतों के माध्यम से, मैं स्वयं को भूल जाता हूँ

और फिर मैं स्वयं को अपने स्वामी का मित्र कह पाता हूँ|


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


When You Ask Me To Sing!


When you ask me to sing
My heart swells with pride
As I look intently at you
My eyes moisten with tears
All that is hard and bitter in me
Melts into heavenly music
All my prayers and thoughts
Take wings like merry birds.



You are content with my songs
I know they please you.
They admit me to your company
The One I can’t reach through thought
Accepts me through my songs!
My songs make me forget myself
And let me call my Lord my friend.


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं!

सभी को, महान भारतीय गणतन्त्र दिवस की बधाई देते हुए, मैं स्वर्गीय रामधारी सिंह जी दिनकर की एक रचना शेयर करना चाह रहा हूँ| दिनकर जी को राष्ट्रकवि का दर्जा दिया गया था क्योंकि उन्होंने राष्ट्रीय हुंकार से भरी अनेक रचनाएँ लिखी थीं, लेकिन यह रचना एक सुकोमल भावनाओं से युक्त रचना है, जिसमें व्यक्ति यह प्रश्न करता है कि आखिर वह किस श्रेणी में आता है!


एक ऐसा व्यक्तित्व उनकी इस कविता में उभरता है, जो सीमाहीन है| लीजिए दिनकर जी की इस रचना का आनंद लीजिए-


सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता, जो बीन उर में
विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं


जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं

कली की पंखुडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं


मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुदन अनमोल धन कवि का,
इसी से पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं


न देखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धूलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

सुनूं क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं


दबी सी आग हूँ, भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं

बंधा तूफान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं।।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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दर्द भी सहे हैं होकर के मशहूर!

हिन्दी के एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय गीतकार हैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी मन के बहुत सुकोमल भावों को बहुत बारीकी से अभिव्यक्त कराते थे और कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे|

जैसा कहते हैं, जीवन का नाम ही चलना है, हम एक जगह नहीं ठहर सकते, बहुत से दायित्व, वचन बद्धताएँ हमें निरंतर पुकारती रहती हैं| लीजिए इसी संदर्भ में इस रचना का आनंद लीजिए-

रोको मत जाने दो जाना है दूर|

वैसे तो जाने को मन ही होता नहीं,
लेकिन है कौन यहाँ जो कुछ खोता नहीं
तुमसे मिलने का मन तो है मैं क्या करूँ?
बोलो तुम कैसे कब तक मैं धीरज धरूँ ।
मुझसे मत पूछो मैं कितना मज़बूर ।

रोको मत जाने दो जाना है दूर|


अनगिन चिंताओं के साथ खड़ा हूँ यहाँ
पूछता नहीं कोई जाऊँगा मैं कहाँ ?
तन की क्या बात मन बेहद सैलानी है
कर नहीं पाता मन अपनी मनमानी है ।
दर्द भी सहे हैं होकर के मशहूर|

रोको मत जाने दो जाना है दूर|


अब नहीं कुछ भी पाने को मन करता
कभी-कभी जीवन भी मुझको अखरता|
साँस का ठिकाना क्या आए न आए
यह बात कौन किसे कैसे समझाए|
होना है जो भी वह होगा ज़रूर ।

रोको मत जाने दो जाना है दूर ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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हम जहाँ हैं, वहीं से आगे बढ़ेंगे!

हिन्दी के एक प्रतिष्ठित नवगीतकार हैं श्री ओम प्रभाकर जी, जिन्होंने अनेक प्रसिद्ध रचनाएँ दी हैं| आज उनकी जो रचना मैं शेयर कर रहा हूँ, वह मानव जीवन में निरंतर चल रहे संघर्ष को अभिव्यक्त करती है|

एक संघर्ष तो व्यक्ति के जीवन में चलता है और एक पीढ़ी दर पीढ़ी भी चलता जाता है| मानव जाति का भी एक संघर्ष है, जो हर पीढ़ी को आगे बढ़ाना होता है| लीजिए इसी संदर्भ में इस रचना का आनंद लीजिए-


हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे,
देश के बंजर समय के
बाँझपन में,
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में|


या अगर हैं
परिस्थितियों की तलहटी में,
तो वहीं से बादलों के रूप में
ऊपर उठेंगे,
हम जहाँ हैं वहीं से
आगे बढ़ेंगे|


यह हमारी नियति है
चलना पड़ेगा,
रात में दीपक
दिवस में सूर्य बन जलना पड़ेगा|

जो लड़ाई पूर्वजों ने छोड़ दी थी
हम लड़ेंगे,
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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मुक्त प्रेम- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Free Love’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मुक्त प्रेम


इस दुनिया में जो लोग मुझसे प्रेम करते हैं,वे मुझे मजबूती से पकड़कर सुरक्षित रखना चाहते हैं|
परंतु तुम्हारे प्रेम की स्थिति अलग है, जो उनके प्रेम से कहीं अधिक है,
और तुम मुझे मुक्त रखते हो|

कहीं मैं उनको भूल न जाऊं, इसलिए वे मुझे अकेला नहीं छोड़ते|
परंतु एक-एक करके दिन बीतते जाते हैं, तुम तो दिखाई नहीं देते|

भले ही मैं तुमको अपनी प्रार्थनाओं में याद न करूं, अपने दिल में न रखूं,
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम, मेरे प्रेम की प्रतीक्षा करता है|



-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Free Love


By all means they try to hold me secure who love me in this world.
But it is otherwise with thy love which is greater than theirs,
and thou keepest me free.

Lest I forget them they never venture to leave me alone.
But day passes by after day and thou art not seen.

If I call not thee in my prayers, if I keep not thee in my heart,
thy love for me still waits for my love.



-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अरे, लखिय बाबुल मोरे!

अमीर खुसरो जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| खुसरो जी एक सूफी, आध्यात्मिक कवि थे, और ऐसा भी माना जाता है की खड़ी बोली में कविता का प्रारंभ उनसे ही हुआ था| उनका जन्म 1253 ईस्वी में पटियाली में हुआ था और देहांत 1325 ईस्वी में दिल्ली में हुआ|

लीजिए प्रस्तुत है बेटी की विदाई के अवसर से जुड़ी, खुसरो जी की यह रचना, जो आज भी लोकप्रिय है-

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस|

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले
हमको दियो परदेस,
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ
जित हाँके हँक जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ
घर-घर माँगे हैं जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


कोठे तले से पलकिया जो निकली
बीरन में छाए पछाड़
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँ
भोर भये उड़ जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


तारों भरी मैंने गुड़िया जो छोडी
छूटा सहेली का साथ
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

डोली का पर्दा उठा के जो देखा
आया पिया का देस
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस|
अरे, लखिय बाबुल मोरे|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी !

आज फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में अवस्थी जी ने यही व्यक्त किया है कि हमारी व्यक्तिगत आस्थाएँ, आकांक्षाएँ और धार्मिक रुझान कुछ भी हों, हमारे लिए सबसे पहले देश का स्थान है|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की यह रचना-



जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी
तेरे दिल में हो काबा या हो काशी
तू संसारी हो चाहे हो सन्यासी
तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं
तू सब कुछ पीछे, पहले भारतवासी ।

उन सबकी नज़रें आज हमीं पर ठहरीं
जिनके बलिदानों से आज़ादी आई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू महलों में हो या हो मैदानों में
तू आसमान में हो या तहखानों में
पर तेरा भी हिस्सा है बलिदानों में
यदि तुझमें धड़कन नहीं देश के दुख की
तो तेरी गिनती होगी हैवानों में ।

मत भूल कि तेरे ज्ञान सूर्य ने ही तो
दुनिया के अँधियारे को राह दिखाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तेरे पुरखों की जादू भरी कहानी
गौतम से लेकर गाँधी तक की वाणी
गंगा जमना का निर्मल-निर्मल पानी
इन सब पर कोई आँच न आने पाए
सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी ।

भारत का भाल दिनों-दिन जग में चमके
अर्पित है मेरी श्रद्धा और सच्चाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

आज़ादी डरी-डरी है आँखें खोलो
आत्मा के बल को फिर से आज टटोलो
दुश्मन को मारो, उससे मत कुछ बोलो
स्वाधीन देश के जीवन में अब फिर से
अपराजित शोणित की रंगत को घोलो ।

युग-युग के साथी और देश के प्रहरी
नगराज हिमालय ने आवाज़ लगाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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अभागों की टोली अगर गा उठेगी!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहजे में कविता कहने के लिए प्रसिद्ध थे| उन्होंने अनेक बहुमूल्य काव्य संकलन हमें दिए हैं, जिनमें ‘बुनी हुई रस्सी’, ‘गीत फ़रोश’, ‘खुशबू के शिलालेख’, ‘त्रिकाल संध्या’ आदि शामिल हैं और उनके संकलन- ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्रदान किया गया था|

लीजिए प्रस्तुत है भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता-

चलो गीत गाओ, चलो गीत गाओ।
कि गा – गा के दुनिया को सर पर उठाओ।

अभागों की टोली अगर गा उठेगी
तो दुनिया पे दहशत बड़ी छा उठेगी
सुरा-बेसुरा कुछ न सोचेंगे गाओ
कि जैसा भी सुर पास में है चढ़ाओ।


अगर गा न पाए तो हल्ला करेंगे
इस हल्ले में मौत आ गई तो मरेंगे
कई बार मरने से जीना बुरा है
कि गुस्से को हर बार पीना बुरा है

बुरी ज़िन्दगी को न अपनी बचाओ
कि इज़्ज़त के पैरों पे इसको चढ़ाओ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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