घाट-घाट घूमे, निहारी सारी दुनिया!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर, छंदबद्ध हास्य कविता के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

एक प्रसिद्ध भजन है जिसे उन्होंने आधुनिक संदर्भों में अलग ढंग से प्रस्तुत किया|

लीजिए प्रस्तुत है यह कविता –

साधू, संत, फकीर, औलिया, दानवीर, भिखमंगे,
दो रोटी के लिए रात-दिन नाचें होकर नंगे|
घाट-घाट घूमे, निहारी सारी दुनिया,
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !


राजा, रंक, सेठ, सन्यासी, बूढ़े और नवासे,
सब कुर्सी के लिए फेंकते उल्टे-सीधे पासे|
द्रौपदी अकेली, जुआरी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



कहीं न बुझती प्यास प्यार की, प्राण कंठ में अटके,
घर की गोरी क्लब में नाचे, पिया सड़क पर भटके|
शादीशुदा होके, कुँआरी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



पंचतत्व की बीन सुरीली, मनवा एक सपेरा,
जब टेरा, पापी मनवा ने, राग स्वार्थ का टेरा|
संबंधी हैं साँप, पिटारी सारी दुनिया|
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जहां मन में नहीं है कोई भय- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Where The Mind Is Without Fear’ का भावानुवाद-
गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


जहां मन में नहीं है कोई भय!


जहां मन भयमुक्त है, और मस्तक ऊंचा है गर्व से,
जहां ज्ञान मुक्त है,
जहां दुनिया छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं बंट गई है,
दुनियादारी की संकीर्ण दीवारों से,
जहां शब्द उभरकर आते हैं, सच्चाई की गहराई से,
जहां अथक परिश्रम फैलाता है अपनी बाँहें, परिपूर्णता की ओर,
जहां तर्क की निर्मल धारा, ने नहीं खो दिया है अपना रास्ता
मृत आदतों के सुनसान रेगिस्तान में,
जहां मस्तिष्क को सदा आप मार्ग दिखाते हो मेरे प्रभु,
निरंतर विस्तारित होते, चिंतन और क्रियाशीलता में,
स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में, मेरे प्रभु, मेरे राष्ट्र को जागृत होने दो|


-रवींद्रनाथ ठाकुर



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



Where The Mind Is Without Fear

Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तब पता यह चला, मूलधन खो गया!

आज एक बार फिर से आज मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय त्यागी जी जुझारूपन की कविता के लिए जाने जाते थे और एक अलग तरह की छाप उनकी कविताओं की पड़ती थी|

लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर गीत कविता –

तन बचाने चले थे कि मन खो गया,
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया|

घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही,
और सब कुछ है वातावरण खो गया|

यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया,
गाँव को जो दिया था वचन खो गया|

जो हज़ारों चमन से महकदार था,
क्या किसी से कहें वह सुमन खो गया|


दोस्ती का सभी ब्याज़ जब खा चुके,
तब पता यह चला, मूलधन खो गया|

यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी,
यह हमारा तुम्हारा गगन खो गया|

हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा कभी,
एक गलती से वह व्याकरण खो गया|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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गीतांजलि-1 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है।

आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Gitanjali-1’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

गीतांजलि-1




तुमने मुझे अनंत बना दिया है, मेरे प्रभु, ऐसी है तुम्हारी प्रसन्नता| यह कमजोर सा पात्र, मेरा शरीर, आप इसे बार-बार भरते हो, बार-बार खाली करते हो, और फिर-फिर भर देते हो, ताज़ा जीवन से|

यह छोटी सी बांस की बांसुरी, तुम इसे साथ लेकर घूमे हो, पहाड़ों पर और घाटियों में, और इसके भीतर फूंकी हैं, ऐसी धुनें जो सदा नूतन और शाश्वत हैं|


तुम्हारे हाथों का अमर स्पर्श पाकर, मेरा छोटा सा हृदय आनंद की सारी सीमाएं भूल जाता है, और अनेक अनकही बातें कह डालता है|

तुम्हारे अनंत उपहार मेरे पास, मेरे इन छोटे-छोटे हाथों में ही आते हैं| युग बीत गए हैं, और अब भी उंडेलते जा रहे हो तुम अपनी करुणा, और अभी भी यहाँ जगह है, और भरने के लिए
|

-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Gitanjali – 1


Thou hast made me endless, such is thy pleasure. This frail vessel thou emptiest again and again, and fillest it ever with fresh life.

This little flute of a reed thou hast carried over hills and dales, and hast breathed through it melodies eternally new.

At the immortal touch of thy hands my little heart loses its limits in joy and gives birth to utterance ineffable.

Thy infinite gifts come to me only on these very small hands of mine. Ages pass, and still thou pourest, and still there is room to fill.




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अनोखा इतिहास ज्ञान!

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी हास्य कविता के दुर्लभ हस्ताक्षर, स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह एक लंबी हास्य कविता है जो उन्होंने एक ऐसे छात्र के बहाने से लिखी है, जो इतिहास की परीक्षा देने जाता है लेकिन उसे कुछ भी नहीं आता है|

लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर हास्य कविता –

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था,
थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दाँया हाथ फड़कता था|

मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुए,
उनमें से भी कुछ स्कूल तल, आते-आते बर्बाद हुए|

तुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलाया,
मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आया|


पर्चा हाथों में पकड़ लिया, आँखें मूंदीं टुक झूम गया,
पढ़ते ही छाया अंधकार, चक्कर आया सिर घूम गया|

उसमें आए थे वे सवाल जिनमें मैं गोल रहा करता,
पूछे थे वे ही पाठ जिन्हें पढ़ डाँवाडोल रहा करता|

यह सौ नंबर का पर्चा है, मुझको दो की भी आस नहीं,
चाहे सारी दुनिय पलटे पर मैं हो सकता पास नहीं|


ओ! प्रश्न-पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम,
तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी, ये पर्चा है या एटम-बम|

तूने पूछे वे ही सवाल, जो-जो थे मैंने रटे नहीं,
जिन हाथों ने ये प्रश्न लिखे, वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं|

फिर आँख मूंदकर बैठ गया, बोला भगवान दया कर दे,
मेरे दिमाग़ में इन प्रश्नों के उत्तर ठूँस-ठूँस भर दे|

मेरा भविष्य है ख़तरे में, मैं भूल रहा हूँ आँय-बाँय,
तुम करते हो भगवान सदा, संकट में भक्तों की सहाय|


जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया तुमने ही उसे बचाया था,
जब द्रुपद-सुता की लाज लुटी, तुमने ही चीर बढ़ाया था|

द्रौपदी समझ करके मुझको, मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम,
मैं विष खाकर मर जाऊंगा, वर्ना जल्दी आ जाओ तुम|

आकाश चीरकर अंबर से, आई गहरी आवाज़ एक,
रे मूढ़ व्यर्थ क्यों रोता है, तू आँख खोलकर इधर देख|

गीता कहती है कर्म करो, चिंता मत फल की किया करो,
मन में आए जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो|


मेरे अंतर के पाट खुले, पर्चे पर क़लम चली चंचल,
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल|

मैंने लिक्खा पानीपत का दूसरा युध्द भर सावन में,
जापान-जर्मनी बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में|

लिख दिया महात्मा बुध्द महात्मा गांधी जी के चेले थे,
गांधी जी के संग बचपन में आँख-मिचौली खेले थे|

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था,
अकबर ने हिंद महासागर, अमरीका से मंगवाया था|


महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था,
औरंगजेब रंग में आकर औरों की जेब काटता था|

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे,
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे पर लिख मारे|

हो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख,
बोला- इन सारे छात्रों में, बस होनहार है यही एक|

औरों के पर्चे फेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए,
जीरो नंबर देकर बाकी के सारे नंबर काट लिए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है!

आज प्रस्तुत कर रहा हूँ ज़नाब शहजाद अहमद जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल, इस गजल के कुछ शेर गुलाम अली साहब ने भी गाए हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर ग़ज़ल –

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है,
एक नज़र मेरी तरफ भी, तेरा जाता क्या है|

मेरी रुसवाई में तू भी है बराबर का शरीक़,
मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है|

पास रहकर भी न पहचान सका तू मुझको,
दूर से देखकर अब हाथ हिलाता क्या है|

सफ़र-ए-शौक में क्यूँ कांपते हैं पाँव तेरे,
आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है|


उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले,
तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है|

मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम,
बुझ गयी बज़्म तो अब शम्मा ज़लाता क्या है|

मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता,
देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है|

तुझमें जो बल है तो दुनिया को बहाकर लेजा,
चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है|


तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उन पर,
जागने वालो को ‘शहजाद’ जगाता क्या है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा !

हिन्दी काव्य मंचों की शान रहे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|


कविता अपनी बात स्वयं कहती है और नीरज जी भी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल और नीरज जी के शब्दों में कहें तो ‘गीतिका’-


बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा,
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा|

ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया,
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा|


मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा|

बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,
सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा|

ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और,
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा|


लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,
उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा|

जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ ‘नीरज’,
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की!

हिन्दुस्तानी उर्दू शायरी के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं- ज़नाब बशीर बद्र जी| वे शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| मुशायरों को लूटने वाले बशीर जी की गज़लें अक्सर लोग गुनगुनाते हैं|

उनका यह शेर –‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए’, यह शेर एक मुहावरा बन गया है| एक और शेर मुझे अभी याद आ रहा है- ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो’|


बशीर जी की अनेक गज़लें बहुत लोकप्रिय हैं और अनेक गायकों ने उनको गाया है|
आज की यह ग़ज़ल भी बहुत खूबसूरत है, आइए आज इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं –

न जी भर के देखा न कुछ बात की,
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की|

उजालों की परियाँ नहाने लगीं,
नदी गुनगुनाई ख़यालात की|


मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई,
ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की|


मुक़द्दर मेरी चश्म-ए-पुर-आब का,
बरसती हुई रात बरसात की|


कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं,
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मेरे मित्र- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता ‘Entertainment Times’ by TOI द्वारा ऑनलाइन शेयर की गई कुछ कविताओं से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Friend’का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


मेरे मित्र


क्या तुम परदेस में हो, इस तूफानी रात में
प्रेम मार्ग पर अपनी यात्रा में मेरे दोस्त?
आकाश कराह रहा है, मानो निराश हो|


मेरी आँखों में आज रात नींद नहीं है|
बार-बार द्वार खोलकर बाहर देखती हूँ
घनघोर अंधेरे को, मेरे दोस्त!


मुझे अपने सामने कुछ दिखाई नहीं देता|
कहाँ गया वह तुम्हारा मार्ग!


पता नहीं स्याह काली नदी के किस धुंधले किनारे तुम चल रहे हो,
डरावने जंगलों के किस सुदूर छोर पर,
उदासी के किसी उलझे हुए जाल से होकर तुम तय कर रहे हो,
मेरे पास आने के लिए अपना रास्ता, मेरे मित्र?


-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Friend



Art thou abroad on this stormy night
on thy journey of love, my friend?
The sky groans like one in despair.


I have no sleep tonight.
Ever and again I open my door and look out on
the darkness, my friend!


I can see nothing before me.
I wonder where lies thy path!


By what dim shore of the ink-black river,
by what far edge of the frowning forest,
through what mazy depth of gloom art thou threading
thy course to come to me, my friend?


-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई!

कल मैंने कैफी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर की थी जो एक महान शायर होने के अलावा शबाना आज़मी के पिता भी थे| आज मैं ज़नाब अली सरदार जाफ़री साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, वे भी एक महान शायर थे और उनकी ही पीढ़ी के थे, फिल्मों में भी उनके बहुत से गीत लोकप्रिय हुए हैं

आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ उसको जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने बड़े सुंदर ढंग से गाया है| लीजिए आज प्रस्तुत है ये प्यारा सा गीत, अकेलेपन अर्थात तन्हाई के बारे में-  


आवारा हैं गलियों के, मैं और मेरी तन्हाई,
जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुसवाई|

ये फूल से चहरे हैं, हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते,
राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई|

मैं और मेरी तन्हाई|


अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे,
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई|

मैं और मेरी तन्हाई|


आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे, जख्मों का गुलिस्तां है,
आंखों से लहू टपका, दामन में बहार आई|

मैं और मेरी तन्हाई|


हर रंग में ये दुनिया, सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है, हंस कर कभी गाती है,
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई|

मैं और मेरी तन्हाई|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
*********