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मनवा तो सावन -सावन रहा!

आज फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक, माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अपने संस्थान में कवि सम्मेलनों के आयोजन के क्रम में आदरणीय सोम जी से अनेक बार भेंट हुई थी|

मुझे एक प्रसंग विशेष याद आ रहा है, जब सोम जी संचालन कर रहे थे, तब कवि सम्मेलन पहले खुले में हो रहा था, बारिश हो जाने के कारण उसको हॉल में शिफ्ट किया गया और यह कवि सम्मेलन सुबह चार बजे राष्ट्र गान के साथ सुबह तक चला| इस आयोजन की एक और विशेषता इसमें स्वर्गीय किशन सरोज जी द्वारा प्रस्तुत गीत भी थे| जैसे- ‘वो देखो कुहरे में, चन्दन वन डूब गया’ और सोम ठाकुर जी का गीत- ‘ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाच के और नचाकर पी’|

मैंने अनेक बार सोम जी के राष्ट्रभक्ति और भाषा के सम्मान, स्वाभिमान से संबंधी गीत शेयर किए हैं, आज इस रूमानी गीत का आनंद लीजिए-

देह हुई फागुन तो क्या हुआ
रे मितवा
मनवा तो सावन -सावन रहा|

इतना विश्वास किया अपनों पर
चंद्रमा रखा हम ने सपनों पर
हमको जग की चित्तरसारी में
हर चेहरा दर्पण -दर्पण रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


बस इतना ही धरम –करम भाया
अपनाया जो, जी भर अपनाया
हमको तो सदा प्रेम -मंदिर का
हर रजकन चंदन -चंदन रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|

कौन रखे याद इस कहानी को
कहाँ मिले शरण आग पानी को
गुँथी हुई बाँहों में मुक्ति मिली
बाकी सुख बंधन -बंधन रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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