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जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता!

उर्दू के विख्यात शायर निदा फाजली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ, निदा साहब बड़ी सहज भाषा में बहुत गहरी बात कह देते हैं| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो बरबस याद आ जाती हैं, वे हैं- ‘मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’, ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’, ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|

couple romancing

लीजिए आज उनकी इस गजल का आनंद लेते हैं-

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता|

सब कुछ तो है, क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता |

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता|

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता|

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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पुष्पों का विद्यालय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘The Flower School’ का भावानुवाद-




गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


पुष्पों का विद्यालय



तूफानी बादल जब आकाश में गरजते हैं और जून माह की वर्षा बौछार धरती पर आती है|
नमी से भरी पुरवाई जब रेतीले मैदानों पर आगे बढ़ती आती है
बांस वनों में अपना मधुर वाद्य बजाने के लिए|


तब अचानक पुष्प टोलियों में प्रकट हो जाते हैं, कोई नहीं जानता कहाँ से
और घास के ऊपर वे जंगली मस्ती में नृत्य करते हैं|
माँ, मुझे वास्तव में ऐसा लगता है की पुष्प किसी भूमिगत विद्यालय में जाते हैं|


बंद दरवाजों के भीतर वे अपने पाठ पढ़ते हैं, और यदि वे चाहते हैं कि
नियत समय से पहले वे बाहर आकर खेलें, तो उनके शिक्षक उनको
किनारे पर खड़ा कर देते हैं|
जब वर्षा आती है, तब उनकी छुट्टियाँ हो जाती हैं|


जंगल में शाखाएँ आपस में उलझ जाती हैं, और पत्तियाँ सरसराती हैं
जंगली हवा के कारण, तूफानी बादल अपने विशाल हाथों से तालियाँ बजाते हैं, और
बालक पुष्प बाहर आते हैं अपने गुलाबी, पीत और श्वेत वस्त्रों में|


क्या तुम जानती हो माँ, उनका घर आकाश में वहाँ है, जहां सितारे हैं|
क्या तुमने यह नहीं देखा कि वे वहाँ जाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं? क्या तुम
यह नहीं जानतीं कि वे इतनी जल्दी में क्यों हैं?


बेशक, मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि वे किसकी ओर अपना हाथ उठाते हैं; उनकी भी माँ है, जैसे मेरी है|



-रवींद्रनाथ ठाकुर


और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



The Flower School


When storm-clouds rumble in the sky and June showers come down.
The moist east wind comes marching over the heath to blow its
bagpipes among the bamboos.
Then crowds of flowers come out of a sudden, from nobody knows
where, and dance upon the grass in wild glee.
Mother, I really think the flowers go to school underground.
They do their lessons with doors shut, and if they want to
come out to play before it is time, their master makes them stand
in a corner.
When the rain come they have their holidays.
Branches clash together in the forest, and the leaves rustle
in the wild wind, the thunder-clouds clap their giant hands and the
flower children rush out in dresses of pink and yellow and white.
Do you know, mother, their home is in the sky, where the stars
are.
Haven’t you see how eager they are to get there? Don’t you
know why they are in such a hurry?
Of course, I can guess to whom they raise their arms; they
have their mother as I have my own.


-Rabindranath Tagore



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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राजा को खबर तक नहीं!

आज मैं पंडित श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे हमनाम हैं (मैं शर्मा हूँ, वे तिवारी हैं), वाराणसी के निवासी हैं और उन्होंने कुछ बहुत सुंदर नवगीत लिखे हैं| मैंने अपनी संस्था के लिए किए गए आयोजनों में से एक में श्री तिवारी जी को बुलाया था जिसमें उन्होंने अपने श्रेष्ठ काव्य पाठ के अलावा बहुत सुंदर संचालन भी किया था|


लीजिए प्रस्तुत है श्री तिवारी जी का यह गीत जो अव्यवस्था, अराजकता और शासन की असफलताओं की ओर इशारा करता है –



भीलों ने बाँट लिए वन,
राजा को खबर तक नहीं|

पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर,
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर,
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं|

कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ,
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ,
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं|

उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया,
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया,
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं|

एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए,
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए,
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|



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आँचल बुनते रह जाओगे!

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का लिखा एक सुंदर गीत| रामावतार त्यागी जी किसी समय हिन्दी कवि सम्मेलनों में गूंजने वाला एक प्रमुख स्वर हुआ करते थे| यह गीत भी उनकी रचनाशीलता का एक उदाहरण है-

मैं तो तोड़ मोह के बंधन
अपने गाँव चला जाऊँगा,
तुम आकर्षक सम्बन्धों का,
आँचल बुनते रह जाओगे|

मेला काफी दर्शनीय है
पर मुझको कुछ जमा नहीं है,
इन मोहक कागजी खिलौनों में
मेरा मन रमा नहीं है|


मैं तो रंगमंच से अपने
अनुभव गाकर उठ जाऊँगा,
लेकिन, तुम बैठे गीतों का
गुँजन सुनते रह जाओगे|

आँसू नहीं फला करते हैं
रोने वाले क्यों रोता है?
जीवन से पहले पीड़ा का,
शायद अंत नहीं होता है|


मैं तो किसी सर्द मौसम की
बाँहों में मुरझा जाऊँगा,
तुम केवल मेरे फूलों को
गुमसुम चुनते रह जाओगे|

मुझको मोह जोड़ना होगा
केवल जलती चिंगारी से,
मुझसे संधि नहीं हो पाती
जीवन की हर लाचारी से|


मैं तो किसी भँवर के कंधे
चढकर पार उतर जाऊँगा,
तट पर बैठे इसी तरह से
तुम सिर धुनते रह जाओगे|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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हर लड़की की अम्मा मुझको!

आज स्वर्गीय गोपाल प्रसाद व्यास जी की एक हास्य कविता शेयर कर रहा हूँ| व्यास जी किसी समय दिल्ली  में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के कर्ता-धर्ता हुआ करते थे| लाल-किले पर प्रतिवर्ष स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर आयोजित होने वाले विराट कवि-सम्मेलन के भी वही आयोजक होते थे, जहां मुझे बहुत से प्रमुख कवियों को सुनने का सौभाग्य मिला|

व्यास जी प्रत्येक रविवार को दैनिक हिंदुस्तान में ‘नारद जी खबर लाए हैं’ स्तंभ भी लिखते थे, जो काफी लोकप्रिय था और उसमें सामयिक घटनाओं पर रोचक एवं सटीक टिप्पणियाँ की जाती थीं|

लीजिए प्रस्तुत है गोपाल प्रसाद ‘व्यास’ जी की यह प्रसिद्ध  कविता-

 

 

हिन्दी के कवियों को जैसे
गीत-गवास लगा करती है,
या नेता टाइप लाला को
नाम-छपास लगा करती है।

 

मथुरा के पंडों को लगती
है खवास औरों के घर पर,
उसी तरह श्रोतागण पाकर
मुझे कहास लगा करती है।

 

पढ़ते वक्त मुझे बचपन में
अक्सर प्यास लगा करती थी,
और गणित का घंटा आते
शंका खास लगा करती थी।

 

बड़ा हुआ तो मुझे इश्क के
दौरे पड़ने लगे भंयकर,
हर लड़की की अम्मा मुझको
अपनी सास लगा करती थी।

 

कसम आपकी सच कहता हूं
मुझको सास बहुत प्यारी है,
जिसने मेरी पत्नी जाई
उस माता की बलिहारी है!

 

जरा सोचिए, अगर विधाता
जग में सास नहीं उपजाते,
तो हम जैसे पामर प्राणी
बिना विवाह ही रह जाते।

 

कहो कहां से मुन्नी आती?
कहो कहां से मुन्ना आता?
इस भारत की जनसंख्या में
अपना योगदान रह जाता।

 

आधा दर्जन बच्चे कच्चे
अगर न अपना वंश बढ़ाते,
अपना क्या है, नेहरू चाचा
बिना भतीजों के रह जाते

 

एक-एक भारतवासी के
पीछे दस-दस भूत न होते,
तो अपने गुलजारी नंदा
भार योजनाओं का ढोते।

 

क्या फिर बांध बनाए जाते?
क्या फिर अन्न उगाए जाते?
कर्जे-पर-कर्जे ले-लेकर
क्या मेहमान बुलाए जाते?

 

यह सब हुआ सास के कारण
बीज-रूप है वही भवानी,
सेओ इनको नेता लोगो!
अगर सफलता तुमको पानी

 

श्वसुर-प्रिया, सब सुखदाता हैं
भव-भयहारिणि जगदाता हैं,
सुजलां सुफलां विख्याता है
सास नहीं, भारत माता है।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको!

आज मैं कतील शिफाई जी की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| इस गजल के कुछ शेर जगजीत सिंह जी ने भी गाए हैं| बड़ी सुंदर गजल है, आइए इसका आनंद लेते हैं-

 

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा,तू नसीब अपना बना ले मुझको|

 

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी,
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको|

 

मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी,
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको|

 

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी,
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको|

 

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ,
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको|

 

ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको|

 

मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन,
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको|

 

मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे,
तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको|

 

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम,
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको|

 

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ “क़तील”,
शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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व्यवसाय- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Vocation’ का भावानुवाद-

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

 

व्यवसाय

 

जब सुबह 10 बजे का गजर होता है और मैं गली किनारे के
अपने स्कूल की तरफ बढ़ता हूँ|
हर दिन मैं मिलता हूँ एक फेरी वाले से, जो चिल्लाता है, चूड़ियाँ ले लो,
चूड़ियाँ ले लो!”
उसे कभी कोई जल्दी नहीं होती, उसके लिए किसी खास मार्ग पर जाना
जरूरी नहीं होता, कोई निश्चित समय नहीं है उसके घर वापस लौटने के लिए|

 

मेरी कामना है कि मैं वह फेरी वाला होता, अपना पूरा दिन सड़क पर बिताता,
यह चिल्लाते हुए,”चूड़ियाँ ले लो, रत्नजड़ित चूड़ियाँ!”

 

शाम को चार बजे, जब मैं स्कूल से वापस लौटता हूँ,
मैं घर के द्वार से झाँककर देख पाता हूँ बाहर एक माली को
मिट्टी खोदते हुए|
अपनी खुरपी से वह, जैसा मन चाहे, वैसा करता है, उसके कपड़ों में
धूल-मिट्टी लग जाती है, कोई उसको नहीं डांटता, भले ही वो धूप में तप जाए,
या बारिश में भीग जाए|

 

मेरा मन है कि मैं माली बन जाऊँ, बगीचे में खुदाई करता रहूँ,
और कोई मुझे ये खुदाई करने से न रोके|

 

जैसे ही अंधेरा छा जाता है और मेरी माँ मुझे सोने के लिए बिस्तर पर भेज देती है,
मैं अपनी खुली खिड़की से देख पाता हूँ रात्रि-प्रहरी को, गली में
इधर से उधर घूमते हुए|

 

गली एकाकी और सुनसान है, और खंबे पर लगी रोशनी ऐसे लगती है
जैसे किसी दैत्य के माथे पर भयानक आंखेँ चमक रही हों| .
रात्रि-प्रहरी चलता जाता है, अपनी लालटेन को हिलाते हुए, और उसकी छाया
उसके साथ चलती है,  लगता है कि वह अपने जीवन में कभी बिस्तर पर नहीं जाता|

 

मेरी इच्छा है कि मैं एक रात्रि-प्रहरी होता, और पूरी रात गली में घूमता रहता,
अपनी लालटेन के साथ, अपनी छाया का पीछा करता हुआ|

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Vocation

 

When the gong sounds ten in the morning and I walk to school by our
lane.
Every day I meet the hawker crying, “Bangles, crystal
bangles!”
There is nothing to hurry him on, there is no road he must
take, no place he must go to, no time when he must come home.
I wish I were a hawker, spending my day in the road, crying,
“Bangles, crystal bangles!”
When at four in the afternoon I come back from the school,
I can see through the gate of that house the gardener digging
the ground.
He does what he likes with his spade, he soils his clothes
with dust, nobody takes him to task if he gets baked in the sun or
gets wet.
I wish I were a gardener digging away at the garden with
nobody to stop me from digging.
Just as it gets dark in the evening and my mother sends me to
bed,
I can see through my open window the watchman walking up and
down.
The lane is dark and lonely, and the street-lamp stands like
a giant with one red eye in its head.
The watchman swings his lantern and walks with his shadow at
his side, and never once goes to bed in his life.
I wish I were a watchman walking the streets all night,
chasing the shadows with my lantern.

 

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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किसी के जाने पर!

उर्दू का एक प्रसिद्ध शेर है, किसी के जाने की ज़िद को लेकर, शायर का नाम मुझे याद नहीं आ रहा-

 

 

अभी आए, अभी बैठे, अभी दामन सँभाला है,
तुम्हारी जाऊँ, जाऊँ ने हमारा दम निकाला है|

 

एक और फिल्मी गीत की पंक्ति हैं-

चले जाना ज़रा ठहरो, किसी का दम निकलता है,
ये मंज़र देखकर जाना|

पता नहीं क्यों, मेरे मन में इस विषय पर लिखने की बात बिजली के जाने के प्रसंग से आई| आजकल बंगलौर में हूँ, जहां हमारी सोसायटी में तो दिन में 20-25 बार बिजली जाती है| इस विषय में चकाचक ‘बनारसी’ की एक हास्य गजल की पंक्तियाँ थीं-

डरती नहीं हुक्काम से बिजली चली गई
बिजली थी जब कहा था अस्सलाम वालेकुम,
वालेकुम अस्सलाम पे बिजली चली गई|

एक गीत फिल्म- कन्हैया का है, मुकेश जी की आवाज़ में, जिसमे राजकपूर एक लुढ़क रही दारू की बोतल को पुकारते हुए गाते हैं, लेकिन लोग उसे नायिका से जोड़ लेते हैं| गीत है-

रुक जा ओ जाने वाली, रुक जा
मैं तो राही तेरी मंज़िल का|
देखा भी नहीं तुझको, सूरत भी न पहचानी,
तू आ के चली छम से, ज्यों धूप के दिन पानी!

जाने के इस तरह बहुत से उदाहरण हैं, जैसे ‘शाम’ अचानक चली जाती है| मीना कुमारी जी की पंक्तियाँ हैं शायद-

ढूंढते रह जाएंगे, साहिल पे क़दमों के निशां,
रात के गहरे समंदर में उतार जाएगी शाम|

जाने के बारे में ही तो यह गीत है-

तेरा जाना, दिल के अरमानों का लुट जाना,
कोई देखे, बनके तक़दीरों का लुट जाना|

एक शेर और याद आ रहा है, वसीम बरेलवी साहब का-

वो मेरे सामने ही गया और मैं, 
रास्ते की तरह देखता रह गया|

 

वैसे जाने के बाद भी आने की उम्मीद तो लगी ही रहती है, और जाने वाले लौटकर भी कभी आते हैं| लेकिन ऐसा भी तो लगता है न –

 

तेरे जाने में, और आने में,
हमने सदियों का फासला देखा|

 

और जैसा हम जानते हैं, एक जाना तो ऐसा भी होता है, जिसके बाद वापसी नहीं होती-

 

दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

 

जाने है वो कौन नगरिया, आए-जाए खत न खबरिया!
आएँ जब-जब उनकी यादें, आएँ होठों पर फरियादें,
जाके फिर न आने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ!

गीत, गजल तो बहुत होंगे, किसी के जाने को लेकर और इस विषय पर कई आलेख लिखे जा सकते हैं, परंतु अंत में स्वर्गीय किशन सरोज जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जो लाजवाब हैं-

तुम गए क्या, जग हुआ अंधा कुआं,
रेल छूटी, रह गया केवल धुआँ,
गुनगुनाते हम भरी आँखों फिरे सब रात,
हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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तो क्या यहीं करेंगे!

कुछ अलग तरह का भी होना चाहिए, इसलिए आज अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जो आप देख सकते हैं कि अलग तरह की है| हाँ इसके बारे में कुछ कहूँगा नहीं, आप समझ सकते हैं कि इसमें मेरे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है|

लीजिए प्रस्तुत है यह कविता-

 

 

तलब होती है बावली,
क्योंकि रहती है उतावली।

 

बौड़म जी ने
सिगरेट ख़रीदी
एक जनरल स्टोर से,
और फ़ौरन लगा ली
मुँह के छोर से।
ख़ुशी में गुनगुनाने लगे,
और वहीं सुलगाने लगे।

 

दुकानदार ने टोका,
सिगरेट जलाने से रोका-
श्रीमान जी! मेहरबानी कीजिए,
पीनी है तो बाहर पीजिए।

 

बौड़म जी बोले-कमाल है,
ये तो बड़ा गोलमाल है।
पीने नहीं देते
तो बेचते क्यों हैं?

 

दुकानदार बोला-
इसका जवाब यों है
कि बेचते तो हम लोटा भी हैं,
और बेचते जमालघोटा भी हैं,
अगर इन्हें ख़रीदकर
आप हमें निहाल करेंगे,
तो क्या यहीं
उनका इस्तेमाल करेंगे?

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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माँ है रेशम के कारख़ाने में!

अली सरदार जाफरी साहब की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में पिछड़े वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का ऐसा चित्रण किया गया है, जिनकी हालत पीढ़ी दर पीढ़ी एक जैसी बनी रहती है, कोई सपने नहीं, कोई बदलाव की उम्मीद नहीं है|

जाफरी साहब एक प्रगतिशील शायर थे, मुद्दतों पहले उन्होंने यह रचना लिखी थी, लेकिन आज भी स्थितियाँ वैसी ही है|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफरी साहब की यह सुंदर रचना-

 

 

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है,
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है|

 

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा,
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूख सरमाये की बढ़ाएगा|

 

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा,
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिये जलाएगा|

 

यह जो नन्हा है भोला-भाला है
खूनी सरमाये का निवाला है,
पूछती है ये, इसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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