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इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है !

आज दुष्यंत कुमार जी की लिखी एक और ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जो आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों में शामिल थी और जिसको उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल किया गया था| इसमें सभी रचनाएँ आपातकाल के विरोध में आन्दोलनधर्मी ग़ज़लें थीं|

उस समय आपातकाल के विरोध में जयप्रकाश नारायण जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था और इस ग़ज़ल के एक शेर में भी कहा गया है- ‘एक बूढ़ा आदमी है देश में, या यूं कहें, इस अंधेरी रोशनी में एक रोशनदान है’|

लीजिए प्रस्तुत है उस ज़माने में अत्यंत लोकप्रिय हुई यह ग़ज़ल-

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है|

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है|

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है|

मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है|

इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके,
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है|

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है|

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं!

दुष्यंत कुमार जी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यिक कवि थे और आपात्काल के दौरान जब उन्होंने एक के बाद एक विद्रोह के स्वरों को गुंजाने वाली ग़ज़लें लिखीं, तब वे जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए| मुझे याद है उस समय कमलेश्वर जी साहित्यिक पत्रिका – ‘सारिका’ में निरंतर ये ग़ज़लें प्रकाशित करते थे और बाद में इनको ‘साये में धूप’ नामक संकलन में सम्मिलित किया गया|


लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी की यह ग़ज़ल-

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं|

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं|

बूँद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है,
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं|

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है,
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं|


आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर,
आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं|

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की अस्लियत,
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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