ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं!

उनके भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है,
जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं|

अब्बास ताबिश

ख़ुद ज़हर-ए-तमन्ना की तरफ़!

हम भी अमृत के तलबगार रहे हैं लेकिन,
हाथ बढ़ जाते हैं ख़ुद ज़हर-ए-तमन्ना की तरफ़|

राही मासूम रज़ा

अब मसीहा भी क्या दवा देगा!

इश्क़ का ज़हर पी लिया “फ़ाकिर”,
अब मसीहा भी क्या दवा देगा|

सुदर्शन फ़ाकिर

जुर्म भी गोया करेंगे हम!

मजबूरियों के ज़हर से कर लेंगे ख़ुदकुशी,
ये बुज़दिली का जुर्म भी गोया करेंगे हम|

क़तील शिफ़ाई

ज़ेहन की आवारगी से हम!

शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था,
ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम|

निदा फ़ाज़ली

आइए ज़हर पी के देखते हैं!

पानियों से तो प्यास बुझती नहीं,
आइए ज़हर पी के देखते हैं|

राहत इन्दौरी

इस दौर में जीना मुश्किल है!

यह दौरे खिरद है, दौरे-जुनूं इस दौर में जीना मुश्किल है,
अंगूर की मै के धोखे में ज़हराब का पीना मुश्किल है|

अर्श मलसियानी

जो ज़हर पिए जाते हैं!

अपनी तारीख़-ए-मोहब्बत के वही हैं सुक़रात,
हँस के हर साँस पे जो ज़हर पिए जाते हैं|

शमीम जयपुरी

बनकर सुक़रात, बरतता हूँ!

इक ज़हर के दरिया को दिन-रात बरतता हूँ ।
हर साँस को मैं, बनकर सुक़रात, बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी