अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ!


सीनियर बच्चन जी, यानि अमित भइया के पापा स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी ने भी क्या कविता लिख डाली थी- ‘अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ’| दो-दो बार तो लोगों ने इस पर फिल्म बनाई, फिर उसके बाद अब आज की सरकार, जिसने यह जिद पकड़ रखी है कि वो कुछ न कुछ काम करती ही रहेगी| अच्छी सरकार वो होती है अपने देश में, जो कोई काम न करे, सिर्फ टाइम-पास करे|

अब आप कोई नया निर्णय लेंगे, कोई नया कानून बनाएंगे, कोई योजना लाएंगे तो लंबे समय से बेरोजगार बैठे अपने पॉलिटीशियन क्या ऐसे ही बैठे रहेंगे, या आपको सलाह देंगे कि ऐसा नहीं ऐसा करो जी| कुछ भी करने पर वो तो ऐसा दिखाएंगे कि जी उन्होंने तो लोगों को रोजगार दिया हुआ था आपने उसको छीन लिया| वो तो सीधे अपनी उपद्रव सेना के साथ मैदान में निकल जाएंगे, तोड़-फोड़ करेंगे, आग लगाएंगे! यही हो रहा है न जी| ऐसे में नीतीश भैया जैसे कुछ मुख्यमंत्री जिनको लगता है कि शायद उनको कल लालू जी के बेटे के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ जाए, वो इस तोड़-फोड़ आगजनी की तरफ से काफी समय तक अपनी आँखें मूँद लेंगे| सत्ता में बने रहना बड़ी बात है जी, सरकारी और प्रायवेट संपत्तियों का नुकसान तो होता रहता है| इसीलिए तो बीमा कराने की सलाह दी जाती है|

कभी-कभी तो आम नागरिक की नींद अचानक ही टूट जाती है| हम समझते हैं कि हम एक न्याय-प्रिय और सभ्य समाज में रह रहे हैं| अचानक हर तरफ से हिंसक जानवर, हत्यारे किस्म के लोग निकल आते हैं, आखिर ये जानवर कहाँ छिपे थे अब तक! कुछ पसंद नहीं है तो उसका विरोध करने का अधिकार सबको है, लेकिन क्या तोड़-फोड़, आगजनी- यही विरोध का तरीका है| कुछ बच्चों को देखकर तो लगता है कि ये जानते ही नहीं कि ये क्या और क्यों कर रहे हैं| और कुछ देखने में ही पेशेवर गुंडे लगते हैं| जो लोग ऐसी किसी योजना से प्रभावित हो रहे हों, वे इन उपद्रवियों में बहुत कम होते हैं|

मैं यही कहना चाहूँगा कि राजनैतिक दलों को मैच्योर होना चाहिए, ये गुंडागर्दी करने से तो आपको गद्दी मिलने वाली नहीं है! विरोध का अधिकार तो सबको है, लेकिन गुंडागर्दी का किसी को नहीं है|

मैं एक सामान्य परंतु जागरूक नागरिक के रूप में लोगों से अपील करना चाहूँगा कि वे जहां कहीं भी हैं इस प्रकार की गुंडागर्दी को रोकने में अपनी भूमिका निबाहें| जहां योजना में कमी की बात है सरकार उस पर कुछ ध्यान दे भी रही है और इसके लिए शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से और ध्यान दिलाया जा सकता है|

मैं ईश्वर से यह भी प्रार्थना करता हूँ कि इस प्रकार के विघटनकारी और तोड़ –फोड़ को बढ़ावा देने वाले राजनीतिज्ञों से मेरे देश को छुटकारा दिलाएं, यह समस्या शीघ्र हल हो जाए और हम सुख-शांति के साथ अपना जीवन बिताएं|

धन्यवाद|
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तुम हो पहरेदार चमन के!



श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| उदय प्रताप जी सांसद रहे हैं और जैसी मुझे जानकारी रही है, वे मुलायम सिंह जी के गुरू रहे हैं| मूल रूप से उदय प्रताप जी कवि हैं, सांसद भी बने लेकिन वे राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं|

जहां तक मुझे याद है वे संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य भी रहे हैं और इस क्षेत्र में भी उनका उल्लेखनीय योगदान है|

लीजिए प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह कविता –


ऐसे नहीं जाग कर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के|

वैसे भी ये बड़े लोग हैं अक्सर धूप चढ़े जगते हैं,
व्यवहारों से कहीं अधिक तस्वीरों में अच्छे लगते हैं,
इनका है इतिहास गवाही जैसे सोए वैसे जागे,
इनके स्वार्थ सचिव चलते हैं नयी सुबह के रथ के आगे,
माना कल तक तुम सोये थे लेकिन ये तो जाग रहे थे,
फिर भी कहाँ चले जाते थे जाने सब उपहार चमन के|

ऐसे नहीं जाग कर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के|

इनके हित औ अहित अलग हैं इन्हें चमन से क्या मतलब है,
राम कृपा से इनके घर में जो कुछ होता है वह सब है,
संघर्षों में नहीं जूझते साथ समय के बहते भर हैं,
वैसे ये हैं नहीं चमन के सिर्फ चमन में रहते भर हैं,
इनका धर्म स्वयं अपने आडम्बर से हल्का पड़ता हैं,
शुभचिंतक बनने को आतुर बैठे हैं ग़द्दार चमन के
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ऐसे नहीं जाग कर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के|

सूरज को क्या पड़ी भला जो दस्तक देकर तुम्हें पुकारे,
गर्ज़ पड़े सौ बार तुम्हारी खोलो अपने बंद किवाड़े,
नयी रोशनी गले लगाओ आदर सहित कहीं बैठाओ,
ठिठुरी उदासीनता ओढ़े सोया वातावरण जगाओ,
हो चैतन्य ऊंघती आँखें फिर कुछ बातें करो काम की,
कैसे कौन चुका सकता है कितने कब उपकार चमन के|

ऐसे नहीं जाग कर बैठो तुम हो पहरेदार चमन के,
चिंता क्या है सोने दो यदि सोते हैं सरदार चमन के|

धरे हाथ पर हाथ न बैठो कोई नया विकल्प निकालो,
ज़ंग लगे हौंसले माँज लो बुझा हुआ पुरुषार्थ जगा लो,
उपवन के पत्ते पत्ते पर लिख दो युग की नयी ऋचाएँ,
वे ही माली कहलाएँगे जो हाथों में ज़ख्म दिखाएँ,
जिनका ख़ुशबूदार पसीना रूमालों को हुआ समर्पित,
उनको क्या अधिकार कि पाएं वे महंगे सत्कार चमन के
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आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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पेट वक्ष से बड़ा, पेट से बड़ी कमर है!

आज मुझे यहाँ क्या शेयर करना है, यह तो पहले से ही घोषित है| हिन्दी काव्य मंचों के प्रसिद्ध हास्य कवि स्वर्गीय ओमप्रकाश आदित्य जी की एक कविता को मैंने कल शेयर करना प्रारंभ किया था| जी हाँ नेताजी के हास्य-व्यंग्यमय नख-शिख वर्णन में कुछ अंगों के बारे में कल बात कर ली थी, कुछ अंगों का वर्णन बाकी था|


लीजिए आज प्रस्तुत है नेताजी का नख-शिख वर्णन करने वाली उनकी कविता का यह दूसरा भाग –

गर्दन

मटके जैसी गरदन पर ढक्कन-सी ठोड़ी
कितनी बार झुकी यह गरदन यह मत पूछो
अनगिन बार उठी है फोटो खिंचवाने को
अनगिन मालाओं का भारी बोझ पड़ा है बेचारी पर|

वक्षस्थल

वक्षस्थल चट्टान उठाए पत्थर-सा दिल
त्रिवली-तिकड़म पंथ
पेट की पगडंडी पर
गुप्त पंथ काले धन का
तस्कर चोरों का
इसी पंथ से लुकते-छिपते धीरे-धीरे
नाभि कुंड में समा गई सभ्यता देश की
जिसको पाकर कटि-प्रदेश फैला थैली-सा!

पेट

पेट वक्ष से बड़ा, पेट से बड़ी कमर है
ज्यों-ज्यों बढ़ती है महंगाई
त्यों-त्यों कटि बढ़ती जाती है
सुरसा-हनुमान में होड़ लगी हो जैसे
गोल मेज-सी कमर पर मत पेटी-सा पेट
बहुमत खाकर बहुत सा, गए पलंग पर लेट!

कंधे

कंधों पर गरदन है या गरदन पर कंधे
इन कंधों को देख सांड भी शर्माते हैं
इतना ढोया भार देश का इन कंधों ने
अब ये स्वयं देश को ही भारी पड़ते हैं

हाथ


अजगर जैसी लम्बी बांहेंचांदी की खुरपी जैसे नाखून
अंगुलियां हैं कटार-सी
फिर भी इनके ये कर-कमल कहे जाते हैं|
इन हाथों से हाथ मिलाना खेल नहीं है
इन हाथों के हस्ताक्षर के सारे अक्षर स्वर्णाक्षर हैं
क्या न किया इन हाथों ने भारत की ख़ातिर
उद्घाटन करते-करते घिस गईं लकीरें
पूरी उम्र न जितनी जेबें काटीं किसी जेबकतरे ने
एक वर्ष में उतने फीते काटे इन कोमल हाथों ने
अवतारों के हाथ हुआ करते घुटनों तक
इनके पिंडली तक लटके हैं|

पिंडली-पांव

विरोधियों के पिंड-दान-सी चुस्त पिंडली
गड़े हुए धन जैसे टखने
नीचे दो सोने की ईंटें
जिन पर जड़े हुए दस मोती
स्वर्ण-चरण को चाट रहे चांदी के चमचे
आचरणों को कौन देखता
चरण बहुत अच्छे हैं
भारत-माता की छाती पर घाव सरीखे दिखते हैं जो
हैं सब चिन्ह इन्हीं चरणों के!

चाल (चलन)

चाल चुनावों से पहले चीते-सी लम्बी
मंत्रीमंडल में आने के लिए
सांप-सी टेढ़ी-मेढ़ी
मंत्री पद पा जाने पर
मदमस्त हाथी-सी धीमी-धीमी
गिरगिट जैसा रंग देह का बगुले जैसा वेश
देश ध्यान में ये डूबे हैं, इनमें डूबा देश!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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संसद से राजघाट तक फैले हुए हैं आप!

श्री कुबेर दत्त जी मेरे मित्र रहे थे जब वे संघर्ष कर रहे थे, दूरदर्शन में स्थापित होने से पहले| अत्यंत भावुकतापूर्ण गीत लिखा करते थे, अखबारों में छपने के लिए परिचर्चाएँ किया करते थे| एक परिचर्चा का शीर्षक मुझे अभी तक याद है- ‘ज़िंदगी है क़ैद पिंजरों में’ जिसमें उन्होंने मुझे भी शामिल किया था| मैंने उनके लिखे बहुत से पोस्टकार्ड काफी समय तक सँभालकर रखे, जिनमें वे लिखते थे कि वे मुझसे बहुत देर बात करना चाहते हैं|

 

 

 

बाद में दूरदर्शन में स्थापित होने के बाद तो बड़े-बड़े लोग उनके भक्त हो गए और उन्होंने अपने शुरू के गीतों को पलायन की निशानी मान लिया| मैंने अपनी शुरू की ब्लॉग पोस्ट्स में उनके कुछ गीत शेयर किए हैं| जैसे एक था-

 

‘ऐसी है अगवानी, चितकबरे मौसम की,
सुबह-शाम करते हैं झूठ को हजम,
सही गलत रिश्तों में बंधे हुए हम’

 

खैर आज उनकी लिखी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ-

 

महलों से मुर्दघाट तक फैले हुए हैं आप,
मखमल से लेके टाट तक फैले हुए हैं आप|

 

बिजनेस बड़ा है आपका तारीफ़ क्या करें,
मन्दिर से लेके हाट तक फैले हुए हैं आप|

 

सोना बिछाना ओढ़ना सब ख़्वाब हो गए,
डनलप पिलो से खाट तक फैले हुए हैं आप|

 

ईमान तुल रहा है यहाँ कौडि़यों के मोल,
भाषण से लेके बाट तक फैले हुए हैं आप|

 

दरबारियों की भीड़ में जम्हूरियत का रक़्स,
आमद से लेके थाट तक फैले हुए हैं आप|

 

जनता का शोर ख़ूब है जनता कहीं नहीं,
संसद से राजघाट तक फैले हुए हैं आप|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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