हुनर तुम सिखा तो चले!

उसको मज़हब कहो या सियासत कहो,
ख़ुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले|

कैफ़ी आज़मी

भारत का यह रेशमी नगर!

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक लंबी कविता, देश की राजधानी दिल्ली के बारे में, देश की राजनीति और सामाजिक जीवन, समृद्धि, संस्कृति आदि विभिन्न पक्षों के संबंध में दिनकर जी ने विस्तार से इस कविता में अपने भाव व्यक्त किए हैं|

लीजिए प्रस्तुत है यह विशिष्ट कविता–



दिल्ली फूलों में बसी, ओस-कण से भीगी, दिल्ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है,
प्रेमिका-कंठ में पड़ी मालती की माला, दिल्ली सपनों की सेज मधुर रस-भीनी है।

बस, जिधर उठाओ दृष्टि, उधर रेशम केवल, रेशम पर से क्षण भर को आंख न हटती है,
सच कहा एक भाई ने, दिल्ली में तन पर रेशम से रुखड़ी चीज न कोई सटती है।

हो भी क्यों नहीं? कि दिल्ली के भीतर जाने, युग से कितनी सिदि्धयां समायी हैं।
औ` सबका पहुंचा काल तभी जब से उन की आंखें रेशम पर बहुत अधिक ललचायी हैं।

रेशम से कोमल तार, क्लांतियों के धागे, हैं बंधे उन्हीं से अंग यहां आजादी के,
दिल्ली वाले गा रहे बैठ निश्चिंत मगन रेशमी महल में गीत खुरदुरी खादी के।

वेतनभोगिनी, विलासमयी यह देवपुरी, ऊंघती कल्पनाओं से जिस का नाता है,
जिसको इसकी चिन्ता का भी अवकाश नहीं, खाते हैं जो वह अन्न कौन उपजाता है।

उद्यानों का यह नगर कहीं भी जा देखो, इसमें कुम्हार का चाक न कोई चलता है,
मजदूर मिलें पर, मिलता कहीं किसान नहीं, फूलते फूल, पर, मक्का कहीं न फलता है।


क्या ताना है मोहक वितान मायापुर का, बस, फूल-फूल, रेशम-रेशम फैलाया है,
लगता है, कोई स्वर्ग खमंडल से उड़कर, मदिरा में माता हुआ भूमि पर आया है।

ये, जो फूलों के चीरों में चमचमा रहीं, मधुमुखी इन्द्रजाया की सहचरियां होंगी,
ये, जो यौवन की धूम मचाये फिरती हैं, भूतल पर भटकी हुई इन्द्रपरियां होंगी।

उभरे गुलाब से घटकर कोई फूल नहीं, नीचे कोई सौंदर्य न कसी जवानी से,
दिल्ली की सुषमाओं का कौन बखान करे? कम नहीं कड़ी कोई भी स्वप्न कहानी से।

गंदगी, गरीबी, मैलेपन को दूर रखो, शुद्धोदन के पहरेवाले चिल्लाते हैं,
है कपिलवस्तु पर फूलों का शृंगार पड़ा, रथ-समारूढ़ सिद्धार्थ घूमने जाते हैं।

सिद्धार्थ देख रम्यता रोज ही फिर आते, मन में कुत्सा का भाव नहीं, पर, जगता है,
समझाये उनको कौन, नहीं भारत वैसा दिल्ली के दर्पण में जैसा वह लगता है।

भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में।
दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल, पर, भटक रहा है सारा देश अँधेरे में।


रेशमी कलम से भाग्य-लेख लिखनेवालों, तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोये हो?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में, तुम भी क्या घर भर पेट बांधकर सोये हो?

असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में, कया जल मे बह जाते देखा है?
क्या खाएंगे? यह सोच निराशा से पागल, बेचारों को नीरव रह जाते देखा है?

देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को, जिन की आभा पर धूल अभी तक छायी है?
रेशमी देह पर जिन अभागिनों की अब तक रेशम क्या? साड़ी सही नहीं चढ़ पायी है।

पर तुम नगरों के लाल, अमीरों के पुतले, क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे?
जलता हो सारा देश, किन्तु, होकर अधीर तुम दौड़-दौड़कर क्यों यह आग बुझाओगे?

चिन्ता हो भी क्यों तुम्हें, गांव के जलने से, दिल्ली में तो रोटियां नहीं कम होती हैं।
धुलता न अश्रु-बुंदों से आंखों से काजल, गालों पर की धूलियां नहीं नम होती हैं।

जलते हैं तो ये गांव देश के जला करें, आराम नयी दिल्ली अपना कब छोड़ेगी?
या रक्खेगी मरघट में भी रेशमी महल, या आंधी की खाकर चपेट सब छोड़ेगी।

चल रहे ग्राम-कुंजों में पछिया के झकोर, दिल्ली, लेकिन, ले रही लहर पुरवाई में।
है विकल देश सारा अभाव के तापों से, दिल्ली सुख से सोयी है नरम रजाई में।

क्या कुटिल व्यंग्य! दीनता वेदना से अधीर, आशा से जिनका नाम रात-दिन जपती है,
दिल्ली के वे देवता रोज कहते जाते, `कुछ और धरो धीरज, किस्मत अब छपती है।´

किस्मतें रोज छप रहीं, मगर जलधार कहां? प्यासी हरियाली सूख रही है खेतों में,
निर्धन का धन पी रहे लोभ के प्रेत छिपे, पानी विलीन होता जाता है रेतों में।

हिल रहा देश कुत्सा के जिन आघातों से, वे नाद तुम्हें ही नहीं सुनाई पड़ते हैं?
निर्माणों के प्रहरियों! तुम्हें ही चोरों के काले चेहरे क्या नहीं दिखाई पड़ते हैं?

तो होश करो, दिल्ली के देवो, होश करो, सब दिन तो यह मोहिनी न चलनेवाली है,
होती जाती है गर्म दिशाओं की सांसें, मिट्टी फिर कोई आग उगलनेवाली है।

हों रहीं खड़ी सेनाएं फिर काली-काली मेंघों-से उभरे हुए नये गजराजों की,
फिर नये गरुड़ उड़ने को पांखें तोल रहे, फिर झपट झेलनी होगी नूतन बाजों की।

वृद्धता भले बंध रहे रेशमी धागों से, साबित इनको, पर, नहीं जवानी छोड़ेगी,
सिके आगे झुक गये सिद्धियों के स्वामी, उस जादू को कुछ नयी आंधियां तोड़ेंगी।

ऐसा टूटेगा मोह, एक दिन के भीतर, इस राग-रंग की पूरी बर्बादी होगी,
जब तक न देश के घर-घर में रेशम होगा, तब तक दिल्ली के भी तन पर खादी होगी।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ!


सीनियर बच्चन जी, यानि अमित भइया के पापा स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी ने भी क्या कविता लिख डाली थी- ‘अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ’| दो-दो बार तो लोगों ने इस पर फिल्म बनाई, फिर उसके बाद अब आज की सरकार, जिसने यह जिद पकड़ रखी है कि वो कुछ न कुछ काम करती ही रहेगी| अच्छी सरकार वो होती है अपने देश में, जो कोई काम न करे, सिर्फ टाइम-पास करे|

अब आप कोई नया निर्णय लेंगे, कोई नया कानून बनाएंगे, कोई योजना लाएंगे तो लंबे समय से बेरोजगार बैठे अपने पॉलिटीशियन क्या ऐसे ही बैठे रहेंगे, या आपको सलाह देंगे कि ऐसा नहीं ऐसा करो जी| कुछ भी करने पर वो तो ऐसा दिखाएंगे कि जी उन्होंने तो लोगों को रोजगार दिया हुआ था आपने उसको छीन लिया| वो तो सीधे अपनी उपद्रव सेना के साथ मैदान में निकल जाएंगे, तोड़-फोड़ करेंगे, आग लगाएंगे! यही हो रहा है न जी| ऐसे में नीतीश भैया जैसे कुछ मुख्यमंत्री जिनको लगता है कि शायद उनको कल लालू जी के बेटे के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ जाए, वो इस तोड़-फोड़ आगजनी की तरफ से काफी समय तक अपनी आँखें मूँद लेंगे| सत्ता में बने रहना बड़ी बात है जी, सरकारी और प्रायवेट संपत्तियों का नुकसान तो होता रहता है| इसीलिए तो बीमा कराने की सलाह दी जाती है|

कभी-कभी तो आम नागरिक की नींद अचानक ही टूट जाती है| हम समझते हैं कि हम एक न्याय-प्रिय और सभ्य समाज में रह रहे हैं| अचानक हर तरफ से हिंसक जानवर, हत्यारे किस्म के लोग निकल आते हैं, आखिर ये जानवर कहाँ छिपे थे अब तक! कुछ पसंद नहीं है तो उसका विरोध करने का अधिकार सबको है, लेकिन क्या तोड़-फोड़, आगजनी- यही विरोध का तरीका है| कुछ बच्चों को देखकर तो लगता है कि ये जानते ही नहीं कि ये क्या और क्यों कर रहे हैं| और कुछ देखने में ही पेशेवर गुंडे लगते हैं| जो लोग ऐसी किसी योजना से प्रभावित हो रहे हों, वे इन उपद्रवियों में बहुत कम होते हैं|

मैं यही कहना चाहूँगा कि राजनैतिक दलों को मैच्योर होना चाहिए, ये गुंडागर्दी करने से तो आपको गद्दी मिलने वाली नहीं है! विरोध का अधिकार तो सबको है, लेकिन गुंडागर्दी का किसी को नहीं है|

मैं एक सामान्य परंतु जागरूक नागरिक के रूप में लोगों से अपील करना चाहूँगा कि वे जहां कहीं भी हैं इस प्रकार की गुंडागर्दी को रोकने में अपनी भूमिका निबाहें| जहां योजना में कमी की बात है सरकार उस पर कुछ ध्यान दे भी रही है और इसके लिए शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से और ध्यान दिलाया जा सकता है|

मैं ईश्वर से यह भी प्रार्थना करता हूँ कि इस प्रकार के विघटनकारी और तोड़ –फोड़ को बढ़ावा देने वाले राजनीतिज्ञों से मेरे देश को छुटकारा दिलाएं, यह समस्या शीघ्र हल हो जाए और हम सुख-शांति के साथ अपना जीवन बिताएं|

धन्यवाद|
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टी०वी० पर भेड़िए!

स्वर्गीय कुबेरदत्त जी किसी ज़माने में मेरे मित्र हुआ करते थे, जब वे बेरोज़गार थे, संघर्ष कर रहे थे, बहुत अच्छे गीत लिखते थे| बाद में वे दूरदर्शन में पदस्थापित हो गए, काफी प्रगति की उन्होंने, दूरदर्शन पर बहुत सुंदर कार्यक्रम भी दिए, साहित्यिक गोष्ठियों आदि के तो वे विशेषज्ञ थे, लेकिन दूरदर्शन में जाने के बाद गीत उनसे छूट गए, बल्कि उन्होंने अन्य अनेक प्रगतिशील साथियों की तरह गीत को ‘पलायन’ कहना शुरू कर दिया| मैं भी दिल्ली से दूर अनेक स्थानों पर पदस्थापित रहा और उनसे संपर्क पूरी तरह टूट गया|

दूरदर्शन में रहते हुए उन्होंने अलग तरह की ‘दृष्टियुक्त’ रचनाएं दीं| लीजिए आज प्रस्तुत है उनकी बाद में लिखी गई एक रचना, जो दूरदर्शन पर हुए उनके अनुभव से संपन्न है-

भेड़िए
आते थे पहले जंगल से
बस्तियों में होता था रक्तस्राव
फिर वे
आते रहे सपनों में
सपने खण्ड-खण्ड होते रहे।

अब वे टी०वी० पर आते हैं
बजाते हैं गिटार
पहनते हैं जीन
गाते-चीख़ते हैं
और अक्सर अँग्रेज़ी बोलते हैं


उन्हें देख
बच्चे सहम जाते हैं
पालतू कुत्ते, बिल्ली, खरगोश हो जाते हैं जड़।

भेड़िए कभी-कभी
भाषण देते हैं
भाषण में होता है नया ग्लोब
भेड़िए ग्लोब से खेलते हैं
भेड़िए रचते हैं ग्लोब पर नये देश
भेड़िए
कई प्राचीन देशों को चबा जाते हैं।
लटकती है
पैट्रोल खदानों की कुँजी
दूसरे हाथ में सूखी रोटी


दर्शक
तय नहीं कर पाते
नमस्ते किसे दें
पैट्रोल को
या रोटी को।
टी०वी० की ख़बरे भी
गढ़ते हैं भेड़िए
पढ़ते हैं उन्हें ख़ुद ही।

रक्तस्राव करती
पिक्चर-ट्यूब में
नहीं है बिजली का करण्ट
दर्शक का लहू है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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चेतावनी!

एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ कवि, गीतकार श्री सत्यनारायण जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो पटना निवासी हैं, शत्रुघ्न सिन्हा जी के पडौसी और मित्र हैं और मुझको, उनको अपना मित्र कहने में गर्व का अनुभव होता है| यद्यपि 11 साल पहले एनटीपीसी से सेवानिवृत्त होने के और गोवा में आकर बस जाने के बाद, अब किसी से मेरा संपर्क नहीं रहा है|

लीजिए आज श्री सत्यनारायण जी का यह नवगीत प्रस्तुत है, जिसका कथ्य स्वतः स्पष्ट है –

ख़बरदार
‘राजा नंगा है‘…
मत कहना

राजा नंगा है तो है
इससे तुमको क्या
सच को सच कहने पर
होगी घोर समस्या
सभी सयाने चुप हैं
तुम भी चुप रहना

राजा दिन को रात कहे तो
रात कहो तुम
राजा को जो भाये
वैसी बात करो तुम
जैसे राखे राजा
वैसे ही रहना
राजा जो बोले
समझो कानून वही है
राजा उल्टी चाल चले
तो वही सही है
इस उल्टी गंगा में
तुम उल्टा बहना

राजा की तुम अगर
खिलाफ़त कभी करोगे
चौराहे पर सरेआम
बेमौत मरोगे
अब तक सहते आये हो
अब भी सहना ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सियासत से तबाही का!

बड़ा गहरा तअल्लुक़ है सियासत से तबाही का,
कोई भी शहर जलता है तो दिल्ली मुस्कुराती है|

मुनव्वर राना

कविता कैसे लिखते हो तुम!

राजनैतिक विचार देने में अक्सर संकट शामिल होता है, लेकिन मुझे लगता है कि यह काम भी कभी-कभी करना चाहिए, भले ही वह धारा के विरुद्ध जाता हो|


एक फैशन सा बन गया है कि जिन कवियों की वाणी से आपातकाल के विरुद्ध एक शब्द नहीं निकल पाया, आज वे जी भरकर सरकार को गालियां भी देते हैं और यह भी कहते हैं कि बहुत दमन हो रहा है, नागरिक स्वतंत्रता पर बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है|

हमने एक वर्ष से अधिक समय तक दिल्ली की सीमाओं पर ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर किया गया तमाशा देखा, जिसे विदेशों से स्पांसर किया गया था| आज उसकी खुराक प्रायोजक देश कनाडा को भी भुगतनी पड़ रही है| मजबूरी में प्रधान मंत्री जी को देशहित में वे कृषि कानून वापस लेने पड़े, जो कृषि विशेषज्ञों की राय के अनुसार किसानों, विशेष रूप से छोटे किसानों के हित में थे|

ऐसे में कवियों की भूमिका क्या हो सकती है, ये बिरादरी तो मार्क्सवादी दिव्य दृष्टि से युक्त है और ऐसा नहीं लगता कि ये वास्तव में देशहित को समझ भी सकते हैं| विभिन्न कदमों के आधार पर सरकार की आलोचना करनी ही चाहिए परंतु ये मार्क्सवादी बिरादरी तो यह मान बैठी है कि जनता ने मूर्खतावश गलत निर्णय लेकर यह सरकार बना दी है, जो कोई बड़ा घोटाला नहीं कर रही, पत्रकारों और कवियों को विश्व भ्रमण नहीं करा रही आदि-आदि|

हर दल के साथ कुछ अच्छाइयाँ और बुराइयाँ होती हैं, उनके समर्थक भी एक या दूसरी प्रकार से अतिवादी होते हैं और हैं|

ये बातें मैं कह सकता हूँ क्योंकि मुझे तो कोई चुनाव नहीं लड़ना है, ऐसे में मार्क्सवादी दिमाग़ों से उपजी कविताओं पर प्रतिक्रिया के रूप में कुछ लिखा है, आप चाहें तो इसे कविता मान सकते हैं|


इतनी घृणा संजोकर मन में,
कविता कैसे लिखते हो तुम|

सत्ता का विरोध आखिर जब,
बन जाए विरोध दल का ही,
और सम्मिलित हो कवि इसमें
किसी पक्ष का बन ध्वजवाही|
तब जो हो, वह नारा होगा,
उसको कविता कहते हो तुम|

राजनीति में तो होंगे ही,
घोर समर्थक, घोर विरोधी,
पर कवि की भूमिका नहीं है,
किसी पक्ष में डट जाने की,
घृणा बुराई से ही करिए,
लोगों से क्यों करते हो तुम|

जनता चुनती है शासक को,
कमियाँ सदा बता सकते तुम,
पर जनमत को ही नकारकर
अलग कहानी कहते हो तुम|
कहां हुई गलतियां बताओ
क्यों फतवे ही देते हो तुम|


-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरा नाम आदमी!

मोहरा सियासतों का, मेरा नाम आदमी,
मेरा वुजूद क्या है, ख़लाओं की जंग हूँ|

सूर्यभानु गुप्त