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Poetry

रेत पे क्या लिखते रहते हो!

आज मोहसिन नक़वी साहब की एक ग़ज़ल के कुछ शेर, शेयर कर रहा हूँ, इसके कुछ शेर ग़ुलाम अली साहब ने भी गाए हैं|

ग़ज़ल में कुछ बहुत सुंदर शेर हैं और ग़ुलाम अली साहब की अदायगी तो लाजवाब है ही| लीजिए इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

इतनी मुद्दत बाद मिले हो,
किन सोचों में गुम रहते हो|

तेज़ हवा ने मुझ से पूछा,
रेत पे क्या लिखते रहते हो|

काश कोई हम से भी पूछे,
रात गए तक क्यूँ जागे हो|

मैं दरिया से भी डरता हूँ ,
तुम दरिया से भी गहरे हो|

कौन सी बात है तुम में ऐसी ,
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो|

पीछे मुड़ कर क्यूँ देखा था,
पत्थर बन कर क्या तकते हो|

जाओ जीत का जश्न मनाओ,
मैं झूठा हूँ तुम सच्चे हो|

अपने शहर के सब लोगों से,
मेरी ख़ातिर क्यूँ उलझे हो |

कहने को रहते हो दिल में,
फिर भी कितने दूर खड़े हो|

रात हमें कुछ याद नहीं था,
रात बहुत ही याद आए हो|

हम से न पूछो हिज्र के क़िस्से,
अपनी कहो अब तुम कैसे हो|

‘मोहसिन’ तुम बदनाम बहुत हो,
जैसे हो फिर भी अच्छे हो|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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