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मेरी थकन उतर जाती है!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रामावतार त्यागी जी स्वाभिमान से भरी, एवं ओजपूर्ण कविताएं लिखने के लिए विख्यात थे|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का यह गीत- –

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी थकन उतर जाती है।

कोई ठोकर लगी अचानक, जब-जब चला सावधानी से,
पर बेहोशी में मंजिल तक, जा पहुँचा हूँ आसानी से,
रोने वाले के अधरों पर, अपनी मुरली धर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥


प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को,
याचक का आशीष लिये बिन, स्वर्ग नहीं मिलता दानी को,
खाली पात्र किसी का अपनी, प्यास बुझा कर भर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी गागर भर जाती है॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने, वह ईश्वर पूजना नहीं है,
बन कर वेदमंत्र-सा मुझको, मंदिर में गूँजना नहीं है,
संकटग्रस्त किसी नाविक को, निज पतवार थमा देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है ,मेरी नौका तर जाती है॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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हम उसी प्यास के समन्दर थे !

आज मैं हिन्दी गीत कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी अत्यंत भावुक और सृजनशील कवि थे और उनको कवि सम्मेलनों में बहुत आदर के साथ सुना जाता था|

अवस्थी जी का यह गीत भी एक अलग प्रकार के अनुभव को चित्रित करता है, कैशौर्य और युवावस्था के वे बेफिक्री भरे दिन, अलग ही तरह के होते हैं| लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

याद आते हैं फिर बहुत वे दिन
जो बड़ी मुश्किलों से बीते थे !

 

शाम अक्सर ही ठहर जाती थी
देर तक साथ गुनगुनाती थी !
हम बहुत ख़ुश थे, ख़ुशी के बिन भी
चाँदनी रात भर जगाती थी !

 

हमको मालूम है कि हम कैसे
आग को ओस जैसे पीते थे !

 

घर के होते हुए भी बेघर थे
रात हो, दिन हो, बस हमीं भर थे !
डूब जाते थे मेघ भी जिसमें
हम उसी प्यास के समन्दर थे !

 

उन दिनों मरने की न थी फ़ुरसत,
हम तो कुछ इस तरह से जीते थे !

 

आते-जाते जो लोग मिलते थे
उनके मिलने में फूल खिलते थे !
ज़िन्दगी गंगा जैसी निर्मल थी,
जिसमें हम नाव जैसे चलते थे !

 

गंगा की ऊँची-नीची लहरों से
हम कभी आगे कभी पीछे थे !

 

कोई मौसम हो हम उदास न थे
तंग रहते थे, पर निराश न थे !
हमको अपना बना के छोड़े जो
हम किसी ऐसे दिल के पास न थे !

 

फूल यादों के जल गए कब के
हमने जो आँसुओं से सींचे थे ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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प्रश्न किया है मेरे मन के मीत ने!

आज मैं हिन्दी काव्य मंचों के ओजस्वी कवि स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक अत्यंत प्रभावशाली गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| त्यागी जी जुझारूपन से भरे गीतों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, परंतु यह अत्यंत रूमानी और भावपूर्ण गीत है|

लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

प्रश्न किया है मेरे मन के मीत ने,
मेरा और तुम्हारा क्या संबंध है|

 

वैसे तो संबंध कहा जाता नहीं
व्यक्त अगर हो जाए तो नाता नहीं,
किन्तु सुनो लोचन को ढाँप दुकूल से
जो संबंध सुरभि का होता फूल से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

मेरा जन्म दिवस ही जग का जन्म है,
मेरे अन्त दिवस पर दुनिया खत्म है,
आज बताता हूँ तुमको ईमान से
जो संबंध कला का है इंसान से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

मैं न किसी की राजनीति का दाँव हूँ
दे दो जिसको दान न ऐसा गाँव हूँ,
झूठ कहूँगा तो कहना किस काम का
जो संबंध प्रगति का और विराम का,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

करता हूँ मैं प्यार सुनाता गीत हूँ
जीवन मेरा नाम सृजन का मीत हूँ,
और निकट आ जाओ सुनो न दूर से
जो संबंध स्वयंवर का सिन्दूर से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

मैं रंगीन उमंगों का समुदाय हूँ
सतरंगी गीतों का एक निकाय हूँ,
और कहूँ क्या तुम हो रहे उदास से
जो संबंध समर्पण का विश्वास से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

प्रश्न किया मेरे मन के मीत ने
मेरा और तुम्हारा क्या संबंध है|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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वह अट्टहासों का धनी, अब मुस्कुराता तक नहीं!

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक रहे, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, ये बात मुझे बार-बार बतानी अच्छी लगती है कि मैंने कई बार उनको अपने आयोजनों में बुलाया था और वे बड़े आत्मीय भाव से गले मिलते थे| एक बात और बता दूँ, मैं अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु का समाचार पाकर वहाँ जा रहा था| तभी ट्रेन में यात्रा करते समय मुझे किशन जी की मृत्यु का समाचार ज्ञात हुआ, कुमार विश्वास जी के द्वारा लिखा गया पोस्ट पढ़कर| यह पढ़कर मेरी स्थिति ऐसी हो गई कि मुझे लगा कि अगर मैं यहाँ ट्रेन में ही रोने लगा तो लोग क्या कहेंगे|

 

खैर आप किशन सरोज जी का, गीत कवि की व्यथा से जुड़ा यह भावुक सा गीत पढ़िए-

 

इस गीत कवि को क्या हुआ,
अब गुनगुनाता तक नहीं|

 

इसने रचे जो गीत जग ने
पत्रिकाओं में पढ़े,
मुखरित हुए तो भजन जैसे
अनगिनत होंठों चढ़े|

 

होंठों चढ़े, वे मन बिंधे,
अब गीत गाता तक नहीं|

 

अनुराग, राग विराग
सौ सौ व्यंग-शर इसने सहे,
जब जब हुए गीले नयन
तब तब लगाये कहकहे|

 

वह अट्टहासों का धनी
अब मुस्कुराता तक नहीं|

 

मेलों तमाशों में लिये
इसको फिरी आवारगी,
कुछ ढूँढती सी दॄष्टि में
हर शाम मधुशाला जगी|

 

अब भीड़ दिखती है जिधर,
उस ओर जाता तक नहीं|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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तुम अरुणारे चरण धरो तो – भारत भूषण

आज एक बार फिर से अपने एक प्रिय कवि/ गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी भारत भूषण जी के अनेक गीत शेयर रहे हैं और वे बहुत ही निराले सर्जक रहे हैं|

एक खास बात कि भारत भूषण जी अभिव्यक्ति के हर क्षेत्र मेन पवित्रता का आभास कराते थे| लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह प्रेम गीत-

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !

 

पलकों-पलकों शूल बुहारूँ,
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ|
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ,
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पडे पतझर से लाली,
तुम अरुणारे चरण धरो तो !

 

रात न मेरी दूध नहाई,
प्रात न मेरा फूलों वाला|
तार-तार हो गया निमोही,
काया का रंगीन दुशाला|
जीवन सिंदूरी हो जाए,
तुम चितवन की किरन करो तो !

 

सूरज को अधरों पर धर लूँ,
काजल कर आँजूँ अँधियारी|
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर,
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ,
तुम प्राणों की अगन हरो तो|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर!

आज एक बार फिर से देश के लोकप्रिय कवि और गीतकार माननीय श्री सोम ठाकुर जी का एक बेहद लोकप्रिय गीत शेयर कर रहा हूँ, मेरा सौभाग्य है कि आयोजनों के सिलसिले में मुझे उनसे कई बार मिलने का और अनेक बार उनका काव्य-पाठ सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है।

 

 

इस गीत की विशेषता यह है कि एक समय था जब आकाशवाणी से प्रातः काल प्रसारित होने वाले ‘ब्रज माधुरी’ कार्यक्रम में नियमित रूप से यह गीत प्रसारित होता है। लीजिए प्रस्तुत है हमारे महान भारतवर्ष का गौरव गान करने वाला यह गीत-

 

सागर चरण पखारे, गंगा शीश चढ़ावे नीर,
मेरे भारत की माटी है चन्दन और अबीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

मंगल भवन अमंगलहारी के गुण तुलसी गावे,
सूरदास का श्याम रंगा मन अनत कहाँ सुख पावे।
जहर का प्याला हँस कर पी गई प्रेम दीवानी मीरा,
ज्यों की त्यों रख दीनी चुनरिया, कह गए दास कबीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

फूटे फरे मटर की भुटिया, भुने झरे झर बेरी,
मिले कलेऊ में बजरा की रोटी मठा मठेरी।
बेटा माँगे गुड की डलिया, बिटिया चना चबेना,
भाभी माँगे खट्टी अमिया, भैया रस की खीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

फूटे रंग मौर के बन में, खोले बंद किवड़िया,
हरी झील में छप छप तैरें मछरी सी किन्नरिया।
लहर लहर में झेलम झूमे, गावे मीठी लोरी,
पर्वत के पीछे नित सोहे, चंदा सा कश्मीर।
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ- सौ नमन करूँ।

 

चैत चाँदनी हँसे , पूस में पछुवा तन मन परसे,
जेठ तपे धरती गिरजा सी, सावन अमृत बरसे।
फागुन मारे रस की भर भर केसरिया पिचकारी
भीजे आंचल , तन मन भीजे, भीजे पचरंग चीर,
सौ-सौ नमन करूँ मैं भैया, सौ-सौ नमन करूँ।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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पथ ही मुड़ गया था – डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन

हिंदी साहित्य का भंडार इतना वृहद है, एक से एक श्रेष्ठ कवि हमारे देश में हुए हैं, जिन्होंने साहित्य में अपना अमूल्य योगदान किया है। कुछ कवि हमें व्यक्तिगत रूप से ज्यादा अच्छे लगते हैं, हम उनकी रचनाओं को अक्सर याद करते हैं लेकिन कितने ही मां भारती के सपूत हैं, जिनको हम भूल जाते हैं।

आज मैं डॉ. शिव मंगल सिंह सुमन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, जिनका रचना-कोश भी अद्वितीय है, अपने समय में वे अक्सर काव्य-मंचों की अध्यक्षता किया करते थे। लीजिए प्रस्तुत है उनकी एक सुंदर रचना-

 

 

मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था।

 

गति मिली मैं चल पड़ा
पथ पर कहीं रुकना मना था,
राह अनदेखी, अजाना देश
संगी अनसुना था।
चांद सूरज की तरह चलता
न जाना रात दिन है,
किस तरह हम तुम गए मिल
आज भी कहना कठिन है,
तन न आया मांगने अभिसार
मन ही जुड़ गया था।

 

देख मेरे पंख चल, गतिमय
लता भी लहलहाई
पत्र आँचल में छिपाए मुख
कली भी मुस्कुराई।
एक क्षण को थम गए डैने
समझ विश्राम का पल
पर प्रबल संघर्ष बनकर
आ गई आंधी सदलबल।
डाल झूमी, पर न टूटी
किंतु पंछी उड़ गया था।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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तीस दिन में एक मुट्ठी दाम याद आए!

पिछली बार मैंने स्व. रमेश रंजक जी का एक प्रेम गीत, शेयर किया था, आज उनका एक गीत जो जुझारूपन का, आम आदमी की बेचारगी का, बड़ी सरल भाषा में सजीव चित्रण करता है, कैसे एक आम इंसान के दिन और महीने बीतते हैं, उसका वर्णन इस गीत में है, लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-

 

 

दोपहर में हड्डियों को शाम याद आए,
और डूबे दिन हज़ारों काम याद आए।

 

काम भी ऐसे कि जिनकी आँख में पानी,
और जिनके बीच मछली-सी परेशानी,
क्या बताएँ किस तरह से ’राम’ याद आए।

 

घुल गई जाने कहाँ से ख़ून में स्याही,
कर्ज़ पर चढ़ती गई मायूस कोताही,
तीस दिन में एक मुट्ठी दाम याद आए।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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ऐसे ही मैं सिमटा- सिहरा, बिखरा तेरे वक्षस्थल में!

आज एक बार फिर से मेरे प्रिय कवियों में से एक, स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक मधुर गीत शेयर कर रहा हूँ। श्री भारत भूषण जी बड़ी नाज़ुक भावनाओं को बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त करने में माहिर थे और अपने समय में कवि सम्मेलनों की शान हुआ करते थे।

लीजिए प्रस्तुत हैं स्व. भारत भूषण जी का यह प्यारा सा गीत –

 

 

 

जैसे पूजा में आँख भरे, झर जाय अश्रु गंगाजल में
ऐसे ही मैं सिमटा, सिहरा
बिखरा तेरे वक्षस्थल में!

 

रामायण के पारायण सा, होठों को तेरा नाम मिला,
उड़ते बादल को घाटी के, मंदिर में जा विश्राम मिला,
ले गये तुम्हारे स्पर्श मुझे,
अस्ताचल से उदयाचल में!

 

मैं राग हुआ तेरे मन का, यह देह हुई वंशी तेरी,
जूठी कर दे तो गीत बनूँ, वृंदावन हो दुनिया मेरी,
फिर कोई मनमोहन दीखा,
बादल से भीने आँचल में!

 

अब रोम रोम में तू ही तू , जागे जागूँ सोये सोऊँ,
जादू छूटा किस तांत्रिक का, मोती उपजें आँसू बोऊँ ,
ढाई आखर की ज्योति जगी,
शब्दों के बीहड़ जंगल में!

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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