Categories
Uncategorized

प्रेमा नदी – सोम ठाकुर

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक माननीय श्री सोम ठाकुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह एक अलग तरह की कविता है जो अपना संपूर्ण प्रभाव पाठक/श्रोता पर छोड़ती है| लीजिए इस कविता का आनंद लीजिए-

 

 

 

मैं कभी गिरता – संभलता हूँ
उछलता -डूब जाता हूँ,
तुम्हारी मधुबनी यादें लिए
प्रेमा नदी|

 

यह बड़ी जादूभरी, टोने चढ़ी है,
फूटती है सब्ज़ धरती से, मगर
नीले गगन के साथ होती है,
रगो में दौड़ती है सनसनी बोती हुई
मन को भिगोती हुई,
उमड़ती है अंधेरी आँधियो के साथ
उजली प्यास का मरुथल पिए, प्रेमा नदी|

 

भोर को सूर्य घड़ी में
खुशबुओं से मैं पिघलता हूँ,
उबालों को हटाते ग्लेशियर लादे हुए
हर वक़्त बहता हूँ,
रुपहली रात की चंद्रा-भंवर में
घूम जाता हूँ,
बहुत खामोश रहता हूँ
मगर वंशी बनाती है मुझे
अपनी छुअन के साथ,
हर अहसास को गुंजन किए
प्रेमा नदी|

 

यह सदानीरा पसारे हाथ
मेरे मुक्त आदिम निर्झरों को माँग लेती है,
कदंबों तक झुलाती है
निचुड़ती बिजलियाँ देकर
भरे बादल उठाती है,
बिछुड़ते दो किनारे को
हरे एकांत का सागर दिए
प्रेमा नदी|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******

Categories
Uncategorized

कविता मेरी मधुशाला- हरिवंश राय बच्चन

आज मन है कि स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी के प्रसिद्ध काव्य – मधुशाला के कुछ छंद आपके साथ शेयर करूँ| ख़ैयाम की रुबाइयों के आधार पर रचित इस काव्य को जब बच्चन जी काव्य मंचों पर प्रस्तुत करते थे तो श्रोता समुदाय झूम उठता था|

 

 

बच्चन जी का यह काव्य अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था| बच्चन जी ने इससे जुड़ी एक घटना का उल्लेख भी अपनी जीवनी में किया है| हुआ यूं था कि बच्चन जी का काव्यपाठ सुनने के बाद एक श्रोता, जो रेल में यात्रा कर रहा था, वह मधुशाला की पंक्तियाँ दोहराते हुए गाड़ी के नीचे आकर मर गया था| इस पर बच्चन जी ने लिखा था कि मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी यह रचना पलायन के लिए प्रेरक बन जाएगी|

लीजिए प्रस्तुत हैं इस काव्य के कुछ छंद-

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।

 

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।

 

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ –
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।

 

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।

 

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।

 

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।

 

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दूर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।

 

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।

 

मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।

 

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।

 

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।

 

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

*****

Categories
Uncategorized

गुनगुनाती रही वेदना!

आज फिर से हिंदी काव्य मंचों के एक पुराने लोकप्रिय हस्ताक्षर- स्व. गोपाल सिंह नेपाली जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। गीत स्वयं अपनी बात कहता है, इसलिए मुझे ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं, लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना।।

 

चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा,
द्वार घर का पवन खटखटाता रहा।
पास आते हुए तुम कहीं छुप गए,
गीत हमको पपीहा रटाता रहा।
तुम कहीं रह गये, हम कहीं रह गए, गुनगुनाती रही वेदना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुस्कुराती रही कामना॥

 

तुम न आए, हमें ही बुलाना पड़ा,
मंदिरों में सुबह-शाम जाना पड़ा।
लाख बातें कहीं मूर्तियाँ चुप रहीं,
बस तुम्हारे लिए सर झुकाता रहा।
प्यार लेकिन वहाँ एकतरफ़ा रहा, लौट आती रही प्रार्थना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना॥

 

शाम को तुम सितारे सजाते चले,
रात को मुँह सुबह का दिखाते चले।
पर दिया प्यार का, काँपता रह गया,
तुम बुझाते चले, हम जलाते चले।
दुख यही है हमें तुम रहे सामने, पर न होता रहा सामना।
रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना॥

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

*******