कितने दाग लगे चादर में!

एक समय था जब दिल्ली में रहते हुए कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों आदि के माध्यम से अनेक श्रेष्ठ कवियों को सुनने का मौका मिलता है| अब वैसा माहौल नहीं रहा, एक तो ‘कोरोना’ ने भी बहुत कुछ बदल दिया है|


हाँ तो पुराने समय के काव्य-मंचों पर उभरने वाले बहुत से कवि, जिनकी कविताएं मैं शेयर करता रहा हूँ, उनमें से जो नाम मुझे आज याद आ रहा है, वे हैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी, लीजिए आज उनका एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ-

अगर चल सको साथ चलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने चलकर आए हो तुम, कितनी मंज़िल शेष रह गई?

हम तुम एक डगर के राही
आगे-पीछे का अन्तर है,
धरती की अर्थी पर सबको
मिला कफ़न यह नीलाम्बर है ।
अगर जल सको साथ जलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
अभी चिताओं के मेले में कितनी हलचल शेष रह गई ?


मुझे ओस की बूंद समझकर
प्यासी किरन रोज़ आती है,
फूलों की मुस्कान चमन में
फिर भी मुझे रोज़ लाती है ।
तड़प सको तो साथ तड़प लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी धरा भिगोई तुमने कितनी मरुथल शेष रह गई ?

अवनी पर चातक प्यासे हैं
अम्बर में चपला प्यासी है,
किसकी प्यास बुझाए बादल
ये याचक हैं, वह दासी है ।
बनो तृप्ति बन सको अगर तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी प्यास बुझा लाए हो, कितनी असफल शेष रह गई ?


जीवन एक ग्रंथ है जिसका
सही एक अनुवाद नहीं है,
तुम्हें बताऊँ कैसे साथी
अर्थ मुझे भी याद नहीं है ?
बुझा सको तो साथ बुझाओ, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
मरघट के घट की वह ज्वाला, कितनी चंचल शेष रह गई ?

घाट-घाट पर घूम रहे हैं
भरते अपनी सभी गगरिया,
बदल-बदल कर ओढ़ रहे हैं
अपनी-अपनी सभी चदरिया ।
ओढ़ सको तो साथ ओढ़ लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने दाग़ लगे चादर में, कितनी निर्मल शेष रह गई ?


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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लोग यों ही हैं झिझकते सोचते!

कल मैंने खड़ी बोली हिन्दी के एक प्रारंभिक प्रमुख कवि स्वर्गीय अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी की एक रचना प्रस्तुत की थी। आज फिर से स्वर्गीय ‘हरिऔध’ जी की एक और रचना शेयर कर रहा हूँ, जिसे मैंने अपने स्कूल के पाठ्यक्रम में भी पढ़ा था|


कविता के क्या दायित्व हैं और कवियों से हम क्या अपेक्षा कर सकते हैं, यह भी समय के साथ बदलता जाता है| प्रारंभ में कविगण प्रेरणा देना भी अपना दायित्व समझते थे| कुछ ऐसा ही इस कविता में ‘बूंद’ के उदाहरण से उन लोगों से कहा गया है, जो कार्य-व्यवसाय आदि के लिए घर से दूर जाने में डरते हैं|


लीजिए प्रस्तुत है हरिऔध जी की यह रचना-

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी।

दैव मेरे भाग्य में है क्या लिखा, मैं बचूंगी या मिलूंगी धूल में,
चू पडूंगी या कमल के फूल में।
बह गई उस काल एक ऐसी हवा
वो समंदर ओर आई अनमनी,
एक सुंदर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी, मोती बनी।


लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
किंतु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूंद लौं कुछ और ही देता है कर।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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तुम प्राणों की अगन हरो तो!

 

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक भावुकता और प्रेम से भरा गीत शेयर कर लूँ| भावुकता वैसे तो जीवन में कठिनाई से ही कहीं काम आती है, आजकल बहुत कम मिलते हैं इसको समझने वाले, परंतु कवि-गीतकारों के लिए तो यह बहुत बड़ी पूंजी होती है, अनेक गीत इसके कारण ही जन्म लेते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह खूबसूरत गीत-

 

 

सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ
प्रिय मिलने का वचन भरो तो !

 

पलकों-पलकों शूल बुहारूँ
अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ,
भँवरों पर पहरा बिठला दूँ
कहीं न जूठी कर दें कलियाँ|
फूट पड़े पतझर से लाली
तुम अरुणारे चरन धरो तो !

 

रात न मेरी दूध नहाई
प्रात न मेरा फूलों वाला,
तार-तार हो गया निमोही
काया का रंगीन दुशाला|

 

जीवन सिंदूरी हो जाए
तुम चितवन की किरन करो तो !

 

सूरज को अधरों पर धर लूँ
काजल कर आँजूँ अँधियारी,
युग-युग के पल छिन गिन-गिनकर
बाट निहारूँ प्राण तुम्हारी|
साँसों की जंज़ीरें तोड़ूँ
तुम प्राणों की अगन हरो तो|

 

 

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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सपने ताजमहल के हैं!

आज मैं हिन्दी बहुत प्यारे कवि/ गीतकार स्वर्गीय बाल स्वरूप राही जी की एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ| राही जी ने बहुत अच्छे गीत और गज़लें हमें दी हैं| आज की ये गजल भी आशा है आपको पसंद आएगी-

 

 

उनके वादे कल के हैं,
हम मेहमाँ दो पल के हैं ।

 

कहने को दो पलकें हैं,
कितने सागर छलके हैं ।

 

मदिरालय की मेज़ों पर,
सौदे गंगा जल के हैं ।

 

नई सुबह के क्या कहने,
ठेकेदार धुँधलके हैं ।

 

जो आधे में छूटी हम,
मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं ।

 

बिछे पाँव में क़िस्मत है,
टुकड़े तो मखमल के हैं ।

 

रेत भरी है आँखों में,
सपने ताजमहल के हैं ।

 

क्या दिमाग़ का हाल कहें,
सब आसार खलल के हैं ।

 

सुने आपकी राही कौन,
आप भला किस दल के हैं ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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भर-भर आई आँख , ब्याज से पाँच-पचास हुए!

आज मैं अपने प्रिय कवियों में से एक, स्व. रमेश रंजक जी का एक प्यारा सा गीत, बिना किसी भूमिका के शेयर करूंगा।

 

जितने दूर हुए तुम हमसे
उतने पास हुए,
दर्द गीत बन गया
जिस घड़ी प्राण उदास हुए।

 

याद किसी ज़िद्दी बालक-सी
पकड़ एक उँगली,
उगी जिस तरह प्रीत उसी
आँगन की ओर चली,
भर-भर आई आँख ब्याज से
पाँच-पचास हुए।

 

सुबह तुम्हारे ही सुहाग की
साड़ी में आई,
जाते-जाते शाम तुम्हारे
ढंग से शरमाई,
सुधि की गन्ध मिली, पतझर के
दिन मधुमास हुए।

 

रात झुकी तुलसी-चौरे पर
दिन के पूजन को,
ऐसा लगा कि जैसे तुमने
परस दिया मन को,
युग-युग के भूले-बिसरे
दो नाम समास हुए।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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