जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता!

उर्दू के विख्यात शायर निदा फाजली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ, निदा साहब बड़ी सहज भाषा में बहुत गहरी बात कह देते हैं| उनकी कुछ पंक्तियाँ जो बरबस याद आ जाती हैं, वे हैं- ‘मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’, ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’, ‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|

couple romancing

लीजिए आज उनकी इस गजल का आनंद लेते हैं-

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता|

सब कुछ तो है, क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता |

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता|

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता|

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कल मेरी नींदों में छुपकर ,जाग रहा था जाने कौन!

आज मैं फिर से निदा फाजली साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| निदा साहब मेरे प्रिय शायर रहे हैं, जहां उन्होने शायरी में अनेक प्रयोग किए हैं, वहीं कभी-कभी वे फकीर जैसे लगते हैं| कुछ पंक्तियाँ उनकी तो दिल में बसी रहती हैं, जैसे- ‘मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार, दिल ने दिल से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’,  ‘दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है’,  ‘गरज-बरस प्यासी धरती पर, फिर पानी दे मौला’ आदि-आदि|

 

आज की यह गजल भी अपने आप में अनूठी है| लीजिए इसका आनंद लीजिए-

 

 

मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन।

 

सदियों-सदियों वही तमाशा
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं
खो जाता है जाने कौन।

 

जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन।

 

मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन।

 

किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर, सुनेगा जुगनुओं का हुक्मनामा!

आज सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। जब अपनी नियोजक कंपनी के लिए मैं कवि सम्मेलनों का आयोजन किया करता था तब अनेक बार उनसे मिलने का अवसर मिला, बहुत सहृदय व्यक्ति और अत्यंत उच्च कोटि के रचनाकार हैं। उनके अनेक गीत मन पर अंकित हैं। राष्ट्र, राष्ट्रभाषा और रचनाकर के स्वाभिमान को लेकर उनकी अनेक अत्यंत प्रभावशाली रचनाएं हैं।
आज उनका जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह एक व्यंग्य गीत है, जिसमें यह अभिव्यक्त किया गया है कि आज हर क्षेत्र में, लोगों के पास चिंतन-मनन, संवेदन और भावनाओं की गहराई नहीं है लेकिन अहंकार अक्सर प्रदर्शित होता रहता है। लीजिए प्रस्तुत है यह भावपूर्ण गीत-

 

 

नज़रिए हो गये छोटे हमारे,
मगर बौने बड़े दिखने लगे हैं।
चले इंसानियत की राह पर जो,
मुसीबत में पड़े दिखने लगे है।

 

समय के पृष्ठ पर हमने लिखी थी
छबीले मोर पंखों से ऋचाएँ,
सुनी थी इस दिशा में उस दिशा तक
अंधेरो ने मशालों की कथाएँ।
हुए हैं बोल अब दो कौड़ियों के,
कलम हीरे- जड़े दिखने लगे हैं।

 

हुआ होगा कही ईमान मँहगा
यहाँ वह बिक रहा है नीची दरों पर,
गिरा है मोल सच्चे आदमी का
टिका बाज़ार कच्चे शेयरों पर,
पुराने दर्द से भीगी नज़र को
सुहाने आँकड़े दिखने लगे हैं।

 

हमारा घर अजायब घर बना है
सपोले आस्तीनों में पले हैं,
हमारा देश हैं खूनों नहाया
यहाँ के लोग नाखूनों फले हैं,
कहीं वाचाल मुर्दे चल रहे है
कही ज़िंदा गड़े दिखने लगे हैं।

 

मुनादी द्वारका ने यह सुना दी
कि खाली हाथ लौटेगा सुदामा,
सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर
सुनेगा जुगनुओं का हुक्मनामा,
चरण जिनके सितारों ने छुए वे
कतारों में खड़े दिखने लगे हैं।

 

यहाँ पर मज़हबी अंधे कुए हैं
यहाँ मेले लगे है भ्रांतियों के
लगी है क्रूर ग्रहवाली दशा भी,
महूरत क्या निकालें क्रांतियों के
सगुन कैसे विचारें मंज़िलो के,
हमें सूने घड़े दिखने लगे हैं।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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वो सांवली सी एक लड़की!

आज फिर से मैं अपने एक प्रिय शायर स्व. निदा फाज़ली जी की रचना शेयर कर रहा हूँ। उनकी रचनाओं में, गज़लों में, दोहों में एक अलग तरह की रवानी, सादगी, ताज़गी और मिट्टी का सौंधापन देखने को मिलता है।

कल मैने ‘मां’ के बारे में उनकी एक रचना शेयर की थी, बाद में याद आया कि यह रचना मैं पहले भी शेयर कर चुका था।
आज जो रचना शेयर कर रहा हूँ, वो इस बात की बानगी है कि एक सच्चा रचनाकार अपने परिवेश से इस क़दर जुड़ा होता है, कि मानो आस-पास जो कुछ है, वो उसके व्यक्तित्व का ही एक हिस्सा है। लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह रचना-

 

 

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की,
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है।
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है।

 

बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है।
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ,
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे,
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे।

 

मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ,
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं,
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं,
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे,
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे।

निदा फ़ाज़ली

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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