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ओ जाने वाले हो सके तो!

कल हमारे प्रिय गायक, महान कलाकार और इंसान मुकेश चंद्र माथुर जी का जन्म दिन है| जिन्हें हम प्रेम से सिर्फ ‘मुकेश’ नाम से पुकारते हैं|

उनकी स्मृति में प्रस्तुत आज का यह गीत फिल्म- ‘बंदिनी’ से है, जिसे लिखा था शैलेन्द्र जी ने और इसका संगीत दिया था सचिन देव बर्मन जी ने|

मुकेश जी के गाए गीत मुझ जैसे बहुत से लोगों को जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं|

आइए आज उस महान गायक की स्मृति में उनका गाया यह गीत दोहराते हैं-


ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना,
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना|


बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे,
ढूंढेंगे तुझे गली-गली सब ये ग़म के मारे|
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना|
ओ जाने वाले —

है तेरा वहां कौन सभी लोग हैं पराए,
परदेश की गर्दिश में कहीं, तू भी खो न जाए|
कांटों भरी डगर है तू दामन बचाना|
ओ जाने वाले—


दे देके ये आवाज कोई हर घड़ी बुलाए,
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए,
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना|
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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दिल सोगवार आज भी है!

आज एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसकी विशेषता है गायक भूपिंदर सिंह की गूँजती आवाज| वैसे उन्होंने यह गीत 1985 में रिलीज़ हुई फिल्म- ऐतबार के लिए, भप्पी लाहिड़ी जी के संगीत निर्देशन में, आशा भोंसले जी के साथ मिलकर गाया है| इसके गीतकार हैं- हसन कमाल जी|


लीजिए आज प्रस्तुत है ये गीत-

किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है,

कहाँ हो तुम के
ये दिल बेकरार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|
वो वादियाँ वो फिजायें के
हम मिले थे जहां,
मेरी वफ़ा का वहीं
पर मजार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

न जाने देख के उनको ये
ये क्यों हुआ एहसास,
के मेरे दिल पे उन्हें
इख़्तियार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

वो प्यार जिसके लिए
हमने छोड़ दी दुनिया,
वफ़ा की राह में घायल
वो प्यार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

यकीं नहीं हैं मगर
आज भी ये लगता है,
मेरी तलाश में शायद
बहार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

न पूछ कितने मोहब्बत में
ज़ख्म खाए हैं,
के जिनको सोच के दिल
सोगवार आज भी है|

वो प्यार जिस के लिए
हमने छोड़ दी दुनिया,
वफ़ा की राह में घायल
वो प्यार आज भी है|

किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|
कहा हो तुम के ये
दिल बेकरार आज भी है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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यूं उठे आह उस गली से हम!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

एक किस्सा याद आ रहा है, एक सज्जन थे, नशे के शौकीन थे, रात में सोते समय भी सिगरेट में नशा मिलाकर पीते थे, एक बार सुट्टे मारते-मारते सो गए, और बाद में अचानक उन्हें धुआं सा महसूस हुआ, कुछ देर तो सोचते रहे कि कहाँ से आ रहा है, बाद में पता चला कि उनका ही कंबल जल रहा था, खैर घर के लोगों ने जल्दी ही उस पर काबू पा लिया और ज्यादा नुक़सान नहीं हुआ।


मुझे मीर तक़ी ‘मीर’ जी की एक गज़ल याद आ रही है, जिसे मेहंदी हसन साहब ने अपनी खूबसूरत आवाज़ में गाया है। यहाँ भी एक नशा है, इश्क़ का नशा, जिसमें जब आग लगती है तो शुरू में पता ही नहीं चलता कि धुआं कहाँ से उठ रहा है।

ऐसा लगता है कि किसी दिलजले की आह, शोला बनकर आसमान में ऊपर उठ रही है। और यह भी कि जो इंसान उस एक ‘दर’ से उठ गया, तो फिर उसके लिए कहीं, कोई ठिकाना नहीं बचता। और फिर शायर जैसे अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि हम उस गली से आज ऐसे उठे, जैसे कोई दुनिया से उठ जाता है।

अब ज्यादा क्या बोलना, वह गज़ल ही पढ़ लेते हैं ना-

देख तो दिल कि जां से उठता है,
ये धुआं सा कहाँ से उठता है।

गोर किस दिलजले की है ये फलक़,
शोला एक सुबह यां से उठता है।

बैठने कौन दे फिर उसको,
जो तेरे आस्तां से उठता है।

यूं उठे आह उस गली से हम,
जैसे कोई जहाँ से उठता है।


मीर साहब ने दो शेर और भी लिखे हैं, लेकिन उनकी भाषा इतनी सरल नहीं है, मैं यहाँ उतनी ही गज़ल दे रहा हूँ, जितनी मेंहदी हसन साहब ने गाई है।

नमस्कार
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ये क्या किया रे दुनियावाले!

आज फिर से मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| ये शानदार गीत 1969 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बेटी’ से है, जिसे लिखा है – शकील बदायुनी साहब ने और सोनिक ओमी जी के संगीत निर्देशन में इसे मुकेश जी ने अपने लाजवाब अंदाज़ में गाया है|


जीवन में ऐसा भी हो सकता है कि हमारे पास कोई न हो जिससे हम शिकायत कर सकें, लेकिन ऐसे में भी आस्थावान लोगों के पास एक सहारा होता है, ईश्वर का, जिससे वे जी भरकर शिकायत कर सकते हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

ये क्या किया रे दुनियावाले
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||



ओ बेदर्दी, ओ हरजाई,
देख ली मैंने तेरी खुदाई|
पहले ही मेरा दिल घायल था,
और भी उस पर चोट लगायी|
तूने रुलाके मुझे, दर-दर
फिरा के मुझे,
कब के यह अरमान निकाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले,
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||


सुबह का सूरज, रात के तारे,
बन गए सब के सब अंगारे|
आस के बंधन तोड़ के तूने,
छीन लिए सभी संग सहारे|
मेरे लहू की कसम,
और भी कर ले सितम,
आज तू दिल की बुझा ले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||
जहाँ के ग़म तूने
सभी मुझको दे डाले|
ये क्या किया रे दुनियावाले||


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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