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सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं!

सभी को, महान भारतीय गणतन्त्र दिवस की बधाई देते हुए, मैं स्वर्गीय रामधारी सिंह जी दिनकर की एक रचना शेयर करना चाह रहा हूँ| दिनकर जी को राष्ट्रकवि का दर्जा दिया गया था क्योंकि उन्होंने राष्ट्रीय हुंकार से भरी अनेक रचनाएँ लिखी थीं, लेकिन यह रचना एक सुकोमल भावनाओं से युक्त रचना है, जिसमें व्यक्ति यह प्रश्न करता है कि आखिर वह किस श्रेणी में आता है!


एक ऐसा व्यक्तित्व उनकी इस कविता में उभरता है, जो सीमाहीन है| लीजिए दिनकर जी की इस रचना का आनंद लीजिए-


सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता, जो बीन उर में
विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं


जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं

कली की पंखुडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं


मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुदन अनमोल धन कवि का,
इसी से पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं


न देखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धूलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

सुनूं क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं


दबी सी आग हूँ, भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं

बंधा तूफान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं।।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी !

आज फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में अवस्थी जी ने यही व्यक्त किया है कि हमारी व्यक्तिगत आस्थाएँ, आकांक्षाएँ और धार्मिक रुझान कुछ भी हों, हमारे लिए सबसे पहले देश का स्थान है|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की यह रचना-



जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी
तेरे दिल में हो काबा या हो काशी
तू संसारी हो चाहे हो सन्यासी
तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं
तू सब कुछ पीछे, पहले भारतवासी ।

उन सबकी नज़रें आज हमीं पर ठहरीं
जिनके बलिदानों से आज़ादी आई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू महलों में हो या हो मैदानों में
तू आसमान में हो या तहखानों में
पर तेरा भी हिस्सा है बलिदानों में
यदि तुझमें धड़कन नहीं देश के दुख की
तो तेरी गिनती होगी हैवानों में ।

मत भूल कि तेरे ज्ञान सूर्य ने ही तो
दुनिया के अँधियारे को राह दिखाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तेरे पुरखों की जादू भरी कहानी
गौतम से लेकर गाँधी तक की वाणी
गंगा जमना का निर्मल-निर्मल पानी
इन सब पर कोई आँच न आने पाए
सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी ।

भारत का भाल दिनों-दिन जग में चमके
अर्पित है मेरी श्रद्धा और सच्चाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

आज़ादी डरी-डरी है आँखें खोलो
आत्मा के बल को फिर से आज टटोलो
दुश्मन को मारो, उससे मत कुछ बोलो
स्वाधीन देश के जीवन में अब फिर से
अपराजित शोणित की रंगत को घोलो ।

युग-युग के साथी और देश के प्रहरी
नगराज हिमालय ने आवाज़ लगाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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आँखों से आँसू की बिछुड़न, होंठों से बाँसुरियों की!

मेरे लिए गुरु तुल्य – डॉक्टर कुंवर बेचैन जी का एक गीत और आज शेयर कर रहा हूँ| कविता, गीत, ग़ज़ल आदि की यात्रा तो निरंतर चलती रहती है। डॉक्टर बेचैन एक सृजनशील रचनाकार हैं और कवि सम्मेलनों में खूब डूबकर अपने गीत पढ़ते हैं|

कुछ गीत जो बहुत शुरू में उनका सुने थे, आज भी स्मृतियों में टंके रहते हैं- ‘जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से’, ऐसे अनेक गीत हैं, जैसे ‘आँखों में सिर्फ बादल, सुनसान बिजलियाँ हैं, अंगार हैं अधर पर, सब सांस आंधियाँ हैं, रग-रग दौड़ती सी एक आग की नदी है, ये बीसवीं सदी है’ आदि-आदि ।


आइए आज डॉक्टर बेचैन जी के इस गीत का आनंद लेते हैं-

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की,
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की,
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की,
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की|


जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।


सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं,
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं,
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं,
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं|


हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल!

एक बार फिर मैं आज बहुत ही प्यारे और भावुक गीतकार, स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे यह स्मरण करके अच्छा लगता है कि मुझे कई बार उनसे गले मिलने का अवसर मिला था| बहुत ही सरल हृदय व्यक्ति, सृजनशील रचनाकार थे| आज के इस गीत में भी उन्होंने प्रेयसी की आँखों में आए आंसुओं के बहाने क्या-क्या बातें कह दीं, भावुकता की उड़ान में कहाँ-कहाँ पहुँच गए|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह प्यारा सा गीत- –



नींद सुख की
फिर हमें सोने न देगा-
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल ।

छू लिए भीगे कमल-
भीगी ॠचाएँ
मन हुए गीले-
बहीं गीली हवाएँ|


बहुत सम्भव है डुबो दे
सृष्टि सारी,
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल ।

हिमशिखर, सागर, नदी-
झीलें, सरोवर,
ओस, आँसू, मेघ, मधु-
श्रम-बिंदु, निर्झर|

रूप धर अनगिन कथा
कहता दुखों की,
जोगियों-सा घूमता-फिरता हुआ जल ।

लाख बाँहों में कसें
अब ये शिलाएँ,
लाख आमंत्रित करें
गिरि-कंदराएँ|


अब समंदर तक
पहुँचकर ही रुकेगा,
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अलविदा राहत इंदौरी जी!

विख्यात उर्दू शायर और फिल्मी गीतकार राहत इंदौरी जी नहीं रहे| जैसा कि राहत जी ने खुद ही अपने संदेश द्वारा अपने प्रशंसकों को सूचित किया था, वे कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने के बाद इंदौर के अरविंदो अस्पताल में भर्ती हुए थे और शायद 24 घंटे से कम अवधि में ही दिल का दौरा पड़ जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई| 1जनवरी 1950 को जन्मे राहत जी 70 वर्ष के थे| कोरोना के साथ ये विशेष खतरा रहता है कि यदि व्यक्ति की उम्र अधिक है अथवा उसको कोई गंभीर रोग है, जैसे – मधुमेह, हृदय रोग आदि तो कोरोना की स्थिति में उसकी आंतरिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाने के कारण मृत्यु का खतरा अधिक हो जाता है|


किसी का अंदाज़-ए-बयां अक्सर उसकी पहचान बनता है और रचनात्मकता के क्षेत्र में तो यही मुख्य बात होती है| किसी ने कहा था कि अगर आप कविता में लिखते हैं कि ‘मैं भूखा हूँ’ तो यह बात तो कोई वास्तव में भूखा व्यक्ति ज्यादा प्रभावी ढंग से कह सकता है| आपकी रचना की खूबसूरती तो इसमें है कि आप ‘भूख’ शब्द का प्रयोग किए बिना उसका एहसास करा दें|


राहत जी का अंदाज़ वास्तव में निराला था, जैसे कविता के बारे में यह भी कहा जाता है ‘दिव्य अर्थ का प्रतिपादन’! राहत जी को मुशायरे लूटने वाला शायर कहा जाता था| उनके मंच पर आते ही श्रोता मानते थे कि अब मज़ा आने वाला है| उनकी याद में आज मैं उनके कुछ छिटपुट शेर प्रस्तुत करते हुए उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


रोज तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चाँद पागल है, अंधेरे में निकाल पड़ता है|
****
बनके इक हादसा किरदार में आ जाएगा,
जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा|
*****
ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|
***
दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ|
***
मैं देर रात गए जब भी घर पहुँचता हूँ
वो देखती है बहुत छान के, फटक के मुझे|
***
मैं बस्ती में आख़िर किस से बात करूँ,
मेरे जैसा कोई पागल भेजो न|
***
नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से,
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं|

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ, रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं|
***
उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब,
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब|
***
दोस्ती जब किसी से की जाये|
दुश्मनों की भी राय ली जाये|


ये कुछ शेर राहत जी के, उनकी याद में शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनके शेर और गज़लें शामिल करने के लिए बहुत से ग्रंथ भी कम पड़ जाएंगे| इन शब्दों के साथ में इस जनता के लाडले शायर को अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मिली हमें अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी!

मेरे अग्रजों में से एक डॉ कुँवर बेचैन जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी उस महानन्द मिशन कॉलेज, गाजियाबाद में प्रोफेसर रहे हैं जहां मैंने कुछ समय अध्ययन किया, यद्यपि मेरे विषय अलग थे|

दिल्ली में रहते हुए गोष्ठियों आदि में उनको सुनने का अवसर मिल जाता था, बाद में जब मैं अपनी नियोजक संस्था के लिए आयोजन करता तब उनको वहाँ आमंत्रित करने का अवसर भी मिला|

बेचैन जी कविता के लिए समर्पित व्यक्ति हैं और एक से एक मधुर और प्रभावशाली गीत उन्होंने लिखे हैं| यह गीत भी अपने आप में अलग तरह का है|

लीजिए प्रस्तुत है बेचैन जी का यह गीत –

 

 

प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी,
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी|

 

भोर नहीं काला सपना था पलकों के दरवाज़े पर,
हमने यों ही डर के मारे आँख न खोली बाबू जी|

 

दिल के अंदर ज़ख्म बहुत हैं इनका भी उपचार करो,
जिसने हम पर तीर चलाए मारो गोली बाबू जी|

 

हम पर कोई वार न करना हैं कहार हम शब्द नहीं,
अपने ही कंधों पर है कविता की डोली बाबू जी|

 

यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए,
मिली हमें अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी|

 

सुबह सवेरे जिन हाथों को मेहनत के घर भेजा था,
वही शाम को लेकर लौटे खाली झोली बाबू जी|

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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