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सिर्फ अंगूठे हैं हम लोग!

आज किसी ब्लॉग पोस्ट में ही शेरजंग गर्ग जी का उल्लेख देखा तो सोचा कि उनकी ही रचना आज शेयर की जाए| बहुत पहले जब मैं दिल्ली में रहता था (1980 तक) तब कुछ कवि गोष्ठियों में उनका रचना पाठ सुनने का मौका मिला था, श्रेष्ठ रचनाकार हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शेरजंग गर्ग जी की लिखी एक ग़ज़ल-

ख़ुद से रूठे हैं हम लोग।
टूटे-फूटे हैं हम लोग॥

सत्य चुराता नज़रें हमसे,
इतने झूठे हैं हम लोग।

इसे साध लें, उसे बांध लें,
सचमुच खूँटे हैं हम लोग।

क्या कर लेंगी वे तलवारें,
जिनकी मूँठें हैं हम लोग।

मय-ख़्वारों की हर महफ़िल में,
खाली घूंटें हैं हम लोग।


हमें अजायबघर में रख दो,
बहुत अनूठे हैं हम लोग।

हस्ताक्षर तो बन न सकेंगे,
सिर्फ़ अँगूठे हैं हम लोग।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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हाट-बाज़ारों बिक न सका मैं!

आज मैं कुशल गीतकार नईम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नईम जी ने इस नवगीत में कवि की निष्ठा और प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है| बाकी कविता अपनी बात स्वयं कहती है| लीजिए प्रस्तुत है ये गीत-

लिखने जैसा लिख न सका मैं
सिकता रहा भाड़ में लेकिन,
ठीक तरह से सिक न सका मैं ।

गत दुर्गत जो भी होना थी, ख़ुद होकर मैं रहा झेलता,
अपने हाथों बना खिलौना, अपने से ही रहा खेलता.
परम्परित विश्वास भरोसों पर
यक़ीन से टिक न सका मैं ।


अपने बदरंग आईनों में, यदा-कदा ही रहा झांकता,
थी औक़ात, हैसियत, लेकिन अपने को कम रहा आंकता,
ऊँची लगी बोलियाँ लेकिन,
हाट-बाज़ारों बिक न सका मैं ।

अपने करे-धरे का अब तक, लगा न पाया लेखा-जोखा,
चढ़ न सकेगा अपने पर अब भले रंग हो बिलकुल चोखा,
चढ़ा हुआ पीठों मंचों पर
कभी आपको दिख न सका मैं ।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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इससे पहले कि बेवफा हो जाएं !

आज एक बार फिर मैं भारतीय उपमहाद्वीप के बहुत विख्यात शायर अहमद फराज़ साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| फराज़ साहब अपने अंदाज़ ए बयां और बेहतरीन ग़ज़लों के लिए जाने जाते थे और वे पाकिस्तान के संभवतः सबसे प्रसिद्ध शायरों में शामिल थे|

लीजिए आज फराज़ साहब की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

इससे पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ

बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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अगर रिश्ते नहीं ढोते !

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में रंजक जी ने इस स्थिति पर प्रहार किया है कि लोग ज़िंदगी भर औपचारिकताओं को ढोते हैं| क्या ही अच्छा हो कि हम प्रेम के संबंध जिए और मात्र औपचारिकता वाले रिश्तों को यथासंभव छोड़ दें|

लीजिए प्रस्तुत है रंजक जी का यह गीत-

बन्धु रे!
हम-तुम
घने जंगल की तरह होते
नम भर वाले अगर
रिश्ते नहीं ढोते
बन्धु रे, हम-तुम!


फिर न रेगिस्तान होते
देह में ऐसे
फिर न आते घर कि हम
मेहमान हों जैसे
हड्डियों को काटती क्यों
औपचारिकता
खोखली मुस्कान की
तह में नहीं रोते
बन्धु रे, हम-तुम!


चेहरों से उड़ गई
पहचान बचपन की
अजनबी से कौन फिर
बातें करे मन की
बात करने के लिए
अख़बार की कतरन

फेंक देते हैं हवा में
जागते-सोते
बन्धु रे, हम-तुम!


दृष्टि स्नेहिल
दूसरों के वास्ते रख कर
ख़ून हो कर
हो गये नाख़ून से बदतर
कनखियों के दंश
दरके हुए आँगन की
आड़ में काँटे नहीं बोते
बन्धु रे, हम-तुम!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| ******

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कवियों के कंकाल!

कृष्ण कल्पित जी मेरे अत्यंत प्रिय मित्र रहे हैं| मैं 1980 से 1983 तक आकाशवाणी, जयपुर में कार्यरत था, उस दौरान ही मेरा युवा कवि कृष्ण कल्पित जी से परिचय हुआ, वैसे मैं भी उस समय युवा था, उनसे कुछ वर्ष बड़ा था| उस समय कल्पित जी का एक गीत बहुत प्रसिद्ध था उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं –


राजा-रानी, प्रजा, मंतरी, बेटा इकलौता
मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता|

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,
राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई|
राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता|


कल्पित जी से संबंधित एक और बात याद आ रही है| जयपुर की नौकरी छोड़ने के बाद मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी इकाई में कार्य करने लगा जो झारखंड क्षेत्र में स्थित थी, जो बाद में अलग राज्य बना और कल्पित जी ने आकाशवाणी में कार्यक्रम निष्पादक के रूप में कार्यग्रहण किया और उनकी तैनाती रांची आकाशवाणी केंद्र में हुई, जिसके क्षेत्र में हमारी परियोजना भी आती थी | कल्पित जी को यह मालूम हुआ कि मैं इस परियोजना में हूँ और राजभाषा का काम तो मैं पहले से देखता था, उन्होंने अनुमान से मेरे नाम कविता-पाठ का एक अनुबंध बनाकर भेज दिया कि अगर मैं वहाँ हूँ, तो कविता-पाठ के लिए आ जाऊंगा| इस प्रकार मैं जब तक वहाँ था, समय-समय पर आकाशवाणी-रांची कविता पाठ हेतु जाता रहा|

काफी समय बाद मुझे मालूम हुआ, वे दिल्ली स्थित आकाशवाणी महानिदेशालय में काफी ऊंचे पद पर कार्यरत थे, (अब तक तो शायद सेवानिवृत्त हो गए होंगे, ) लेकिन फिर उनसे मिलना नहीं हो पाया, मैं तो अब वैसे ही गोवा में आकर सबसे दूर हो गया हूँ |

लीजिए आज मेरे पुराने मित्र और श्रेष्ठ कवि कृष्ण कल्पित जी की इस कविता का आनंद लीजिए-


मैं देखना चाहता था कि
शब्दों में कितनी शक्ति बची हुई है

बेचैनी में कितनी बेचैनी
शान्ति में कितनी शान्ति

मैंने देखा प्यार नामक शब्द में
कुछ जलने की गन्ध आ रही थी

झूठ अब उतना झूठा नहीं रहा था
जितने महान थे उतने टुच्चे थे,
लुच्चे थे

जितने भी सदाचारी थे

सच्चाई पर अब किसी को यक़ीन नहीं था
धीरज में धैर्य गायब था

पानी अब प्यास नहीं बुझाता था
अग्नि के साथ-साथ चलता था अग्नि-शमन दस्ता

शब्दों के सिर्फ़ खोखल बचे थे
उनका अर्थ सूख गया था


जब भी लिखता था कविता
एक संरचना हाथ आती थी

कवि अब कहाँ थे
हर तरफ़ कवियों के कंकाल थे !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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लेकिन मकाँ नहीं मिलता!

निदा फ़ाज़ली साहब मेरे अत्यंत प्रिय शायर रहे हैं| उनमें कवि-शायर और संत, सबके गुण शामिल थे| क्या दोहे, क्या ग़ज़लें और क्या गीत, हर जगह उन्होंने अपना कमाल दिखाया था| उनकी प्रमुख विशेषता थी सरल भाषा में गहरी बात कहना|

लीजिए आज निदा फ़ाज़ली साहब की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-



कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता|

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले,
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता|

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो,
जहाँ उमीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता|

कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें,
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता|

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं,
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता|


चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है,
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता|

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है,
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता|

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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काला काला है युगबोध!

केदारनाथ सिंह जी आधुनिक हिन्दी कविता का एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं, जिनको साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हुए थे| हर कवि का अपना अलग अंदाज़-ए-बयां होता है| आज केदारनाथ सिंह जी के रचनाकर्म की बानगी उनकी इस कविता के माध्यम से देखते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है केदारनाथ सिंह जी की यह कविता-


काली मिट्टी काले घर
दिनभर बैठे-ठाले घर|

काली नदिया काला धन
सूख रहे हैं सारे बन|

काला सूरज काले हाथ
झुके हुए हैं सारे माथ|

काली बहसें काला न्याय
खाली मेज पी रही चाय|

काले अक्षर काली रात
कौन करे अब किससे बात|

काली जनता काला क्रोध
काला-काला है युगबोध|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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यार जुलाहे!

आज गुलज़ार साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ, गुलज़ार साहब की शायरी उनके अंदाज़ ए बयां के कारण अलग से पहचानी जाती है| आज की इस नज़्म में भी उन्होंने इंसानी रिश्तों में, प्रेम संबंधों में पड़ जाने वाली गांठों का बड़ी सहजता और प्रभावी ढंग से बयान किया है, जुलाहे की कलाकारी के बहाने से!

लीजिए आज गुलज़ार साहब की इस नज़्म का आनंद लीजिए-


मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे|
अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो,
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई|


मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चांद पागल है!

आज राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, राहत साहब की शायरी में अक्सर एक ‘पंच’ होता है जो अचानक श्रोताओं को अपनी ओर खींच लेता है, कोई ऐसी बात जिसकी हम सामान्यतः कविता / शायरी में उम्मीद नहीं करते, जैसे आज की इस ग़ज़ल में ही- ‘चांद पागल है, अंधेरे की तरह में निकल पड़ता है’|

लीजिए आज राहत इन्दौरी जी की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-


रोज़ तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है|
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता है|

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता है|

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता है|

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता है|

उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वर्ना रो पड़ोगे!

आज एक बार फिर मैं अपने अग्रज और गुरु तुल्य तथा हिन्दी काव्य मंचों के प्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

रचना अपना परिचय स्वयं देती है, लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत-


बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हैं हवा के पास
अनगिन आरियाँ
कटखने तूफान की
तैयारियाँ
कर न देना आँधियों को
रोकने की भूल
वर्ना रो पड़ोगे।

हर नदी पर
अब प्रलय के खेल हैं
हर लहर के ढंग भी
बेमेल हैं
फेंक मत देना नदी पर
निज व्यथा की धूल
वर्ना रो पड़ोगे।

बंद होंठों में छुपा लो
ये हँसी के फूल
वर्ना रो पड़ोगे।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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