मुझसे इक नज़्म का वादा है!



आज मैं गुलज़ार साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ| एक अलग ही अंदाज़ में बात काही है इसमें गुलज़ार साहब ने, कुछ एहसास, कुछ अनुभव वे कहते हैं कि शायद तभी होंगे जब जीवन की अंतिम घड़ियां सामने हों, कवि की एक अलग तरह की अभिव्यक्ति है यह भी, आखिर कवि तो हमेशा ही कुछ नया तलाशता रहता है|

लीजिए प्रस्तुत है गुलज़ार साहब की यह छोटी सी नज़्म –


मुझसे इक नज़्म का वादा है,
मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में,
जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद,
उफ़क़ पर पहुंचे
दिन अभी पानी में हो,
रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा, न उजाला हो,
यह न रात, न दिन

ज़िस्म जब ख़त्म हो
और रूह को जब सांस आए

मुझसे इक नज़्म का वादा है मिलेगी मुझको



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है!


आज मैं सुदर्शन फाक़िर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| फाक़िर साहब ने बहुत अच्छी शायरी की है, उनकी बहुत सी ग़ज़लें प्रसिद्ध गायकों ने गयी हैं, जैसे कुछ शेर मुझे याद या रहे हैं-


अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें,
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें|
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ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह,
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह|

और

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़माने वालों
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी|


लीजिए आज प्रस्तुत है, सुदर्शन फाक़िर जी की यह ग़ज़ल –


आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है,
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है|

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है|

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी,
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है|

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब “फ़ाकिर”
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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कितने भूले हुए ज़ख़्मों का पता याद आया!

आज मैं साहिर लुधियानवी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| साहिर साहब का यह गीत फिल्म-‘गुमराह’ के लिए महेंद्र कपूर जी ने गाया था और इसका संगीत तैयार किया था रवि जी ने|

लीजिए आज प्रस्तुत है, साहिर लुधियानवी साहब का यह गीत –


आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख़्मों का पता याद आया

आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था
शोख नज़रों से मुहब्बत का सलाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वह अहद-ए-वफ़ा याद आया

रुह में जल उठे बजती हुई यादों के दिए
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
पर जो माँगे से न पाया वो सिला याद आया

आज वह बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में यह हल्की-सी मुलाक़ात तो है
ग़ैर का हो के भी यह हुस्न मेरे साथ तो है
हाय ! किस वक़्त मुझे कब का गिला याद आया



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मिलना बहुत जरूरी है!

हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

डॉ. कुंवर बेचैन

धरती पर आते हैं पंछी!

सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं,
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं,
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं,
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं|


(गीत-अंश) डॉ. कुंवर बेचैन

जिस मृग पर कस्तूरी है!

गीत अंश

जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

डॉ. कुंवर बेचैन

शाखों से फूलों की बिछुड़न!

गीत का अंश



शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की,
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की,
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की,
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की|

डॉ. कुंवर बेचैन

जितनी हममें दूरी है!

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

डॉ. कुंवर बेचैन

हैं बहुत छोटे!

मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी के बहुत से गीत मैंने पहले शेयर किए हैं| बहुत ही सरल स्वभाव वाले और अत्यंत सृजनशील रचनाकार थे डॉक्टर बेचैन जी, मुझे भी उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत-


जिंदगी की लाश
ढकने के लिए
गीत के जितने कफ़न हैं
हैं बहुत छोटे ।

रात की
प्रतिमा
सुधाकर ने छुई,
पीर यह
फिर से
सितारों सी हुई,
आँख का आकाश
ढकने के लिए
प्रीत के जितने सपन हैं
हैं बहुत छोटे।


खोज में हो
जो
लरजती छाँव की,
दर्द
पगडंडी नहीं
उस गाँव की,
पीर का उपहास
ढकने के लिए
अश्रु के जितने रतन हैं
हैं बहुत छोटे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उस निगाह के बाद!

जनाब कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब भारत के प्रसिद्ध उर्दू शायरों की फेहरिस्त में शामिल हैं| उनकी बहुत सी ग़ज़लें जगजीत सिंह जी ने और अन्य प्रमुख ग़ज़ल गायकों ने गाई हैं| जैसे ‘ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता भी नहीं’ और ‘बस एक वक़्त का खंजर मेरी तलाश में है’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कृष्ण बिहारी नूर साहब की यह ग़ज़ल-

नज़र मिला न सके उससे उस निगाह के बाद।
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद।

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को,
किसी की चाह न थी दिल में, तेरी चाह के बाद।

ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले, कि हो गुनाह के बाद।

कहीं हुई थीं तनाबें तमाम रिश्तों की,
छुपाता सर मैं कहाँ तुम से रस्म-ओ-राह के बाद।

गवाह चाह रहे थे, वो मेरी बेगुनाही का,
जुबाँ से कह न सका कुछ, ‘ख़ुदा गवाह’ के बाद।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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