जिससे अपनी पीर कहूँ मैं!

आज मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे अत्यंत प्रिय कवि से संबंधित है|
लीजिए फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। कविता, गीत आदि स्वयं अपनी बात कहते हैं और जितना ज्यादा प्रभावी रूप से कहते हैं, वही उसकी सफलता की पहचान है।

लीजिए आज के लिए स्व. भारत भूषण जी का यह गीत आपको समर्पित है-

जिस पल तेरी याद सताए, आधी रात नींद जग जाये,
ओ पाहन! इतना बतला दे, उस पल किसकी बाहँ गहूँ मैं।
अपने अपने चाँद भुजाओं,
में भर भर कर दुनिया सोये।
सारी सारी रात अकेला,
मैं रोऊँ या शबनम रोये।
करवट में दहकें अंगारे, नभ से चंदा ताना मारे,
प्यासे अरमानों को मन में दाबे कैसे मौन रहूँ मैं।

गाऊँ कैसा गीत कि जिससे,
तेरा पत्थर मन पिघलाऊँ,
जाऊँ किसके द्वार जहाँ ये,
अपना दुखिया मन बहलाऊँ।
गली गली डोलूँ बौराया, बैरिन हुई स्वयं की छाया,
मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं।


टूट गया जिससे मन दर्पण,
किस रूपा की नजर लगी है।
घर घर में खिल रही चाँदनी,
मेरे आँगन धूप जगी है।
सुधियाँ नागन सी लिपटी हैं, आँसू आँसू में सिमटी हैं।
छोटे से जीवन में कितना, दर्द-दाह अब और सहूँ मैं।

फटा पड़ रहा है मन मेरा,
पिघली आग बही काया में।
अब न जिया जाता निर्मोही,
गम की जलन भरी छाया में।
बिजली ने ज्यों फूल छुआ है, ऐसा मेरा हृदय हुआ है।
पता नहीं क्या क्या कहता हूँ, अपने बस में आज न हूँ मैं।



(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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याद का आसरा!

आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| ‘नंदन’ जी एक श्रेष्ठ कवि और बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका के संपादक थे| पहले भी मैंने नंदन जी की कुछ रचनाएं शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह सुंदर गीत–


तेरी याद का ले के आसरा ,मैं कहाँ-कहाँ से गुज़र गया,
उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ, वो तो आईना देख के डर गया।

मेरे ज़ेहन में कोई ख़्वाब था
उसे देखना भी गुनाह था
वो बिखर गया मेरे सामने
सारा गुनाह मेरे सर गया।

मेरे ग़म का दरिया अथाह है
फ़क़त हौसले से निबाह है
जो चला था साथ निबाहने
वो तो रास्ते में उतर गया।

मुझे स्याहियों में न पाओगे
मैं मिलूंगा लफ़्ज़ों की धूप में
मुझे रोशनी की है जुस्तज़ू
मैं किरन-किरन में बिखर गया।

उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ, वो तो आईना देख के डर गया।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पथ में किरण-छुरे!

आज एक बार फिर मैं अपने अग्रज और गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी उन कवियों में शामिल हैं, जिनके गीतों को मैं कविता का शौक पैदा होने के बाद अक्सर गुनगुनाया करता था|

मैंने पहले भी बेचैन जी की बहुत सी कविताएं और गीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह सुंदर नवगीत–

नित आवारा धूप घोंपती
पथ में किरण-छुरे।
आज के
दिन हैं बहुत बुरे ।

जो चाही
गाली फूलों को
कांटों ने बक दी
पगडंडी के
अधरों पर फिर
गर्म रेत रख दी
चारों ओर
तपन के निर्मम
सौ-सौ जाल पुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।

सूखी हुई
झुकी शाखों पर
कोलाहल लटका
क्रुद्ध छाँव को
इधर-उधर
खो जाने का खटका
गाते हैं
अश्लील गीत अब
पावन तानपुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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फसल!!

एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के माध्यम से पत्रकारिता को भी अपनी अमूल्य सेवाएं देने वाले स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ|

मैंने पहले भी सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह सुंदर कविता–

हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह
पकड़ भी लूँ कलम तो
फिर भी फसल काटने
मिलेगी नहीं हम को ।

हम तो ज़मीन ही तैयार कर पायेंगे
क्रांतिबीज बोने कुछ बिरले ही आयेंगे
हरा-भरा वही करेंगें मेरे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को ।

कल जो भी फसल उगेगी, लहलहाएगी
मेरे ना रहने पर भी
हवा से इठलाएगी
तब मेरी आत्मा सुनहरी धूप बन बरसेगी
जिन्होने बीज बोए थे
उन्हीं के चरण परसेगी
काटेंगे उसे जो फिर वो ही उसे बोएंगे
हम तो कहीं धरती के नीचे दबे सोयेंगे ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कितने दिन चलेगा!


लीजिए एक बा फिर मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि, गीतकार, जिन्होंने साहित्य जगत और हमारी फिल्मों को भी अनेक अमर रचनाएं दी हैं और जिनको हम गीतों के राजकुंवर के नाम से जानते थे, ऐसे स्वर्गीय गोपालदास नीरज जी का एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ|

मैंने पहले भी नीरज जी के बहुत से गीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय गोपालदास नीरज जी का यह सुंदर गीत–

रूप की इस काँपती लौ के तले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा ?


नील-सर में नींद की नीली लहर,
खोजती है भोर का तट रात भर,
किन्तु आता प्रात जब गाती ऊषा,
बूँद बन कर हर लहर जाती बिखर,
प्राप्ति ही जब मृत्यु है अस्तित्व की,
यह हृदय-व्यापार कितने दिन चलेगा ?

रूप की इस काँपती लौ के तले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा ?

‘ताज’ यमुना से सदा कहता अभय-
‘काल पर मैं प्रेम-यौवन की विजय’
बोलती यमुना-‘अरे तू क्षुद्र क्या-
एक मेरी बूँद में डूबा प्रणय’
जी रही जब एक जल-कण पर तृषा,
तृप्ति का आधार कितने दिन चलेगा ?

रूप की इस काँपती लौ के तले

यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा ?

स्वर्ग को भू की चुनौती सा अमर,
है खड़ा जो वह हिमालय का शिखर,
एक दिन हो भूविलुंठित गल-पिघल,
जल उठेगा बन मरुस्थल अग्नि-सर,
थिर न जब सत्ता पहाड़ों की यहाँ,
अश्रु का श्रृंगार कितने दिन चलेगा ?

रूप की इस काँपती लौ के तले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा ?


गूँजते थे फूल के स्वर कल जहाँ,
तैरते थे रूप के बादल जहाँ,
अब गरजती रात सुरसा-सी खड़ी,
घन-प्रभंजन की अनल-हलचल वहाँ,
काल की जिस बाढ़ में डूबी प्रकृति,
श्‍वांस का पतवार कितने दिन चलेगा ?

रूप की इस काँपती लौ के तले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा ?

विश्‍व भर में जो सुबह लाती किरण,
साँझ देती है वही तम को शरण,
ज्योति सत्य, असत्य तम फिर भी सदा,
है किया करता दिवस निशि को वरण,
सत्य भी जब थिर नहीं निज रूप में,
स्वप्न का संसार कितने दिन चलेगा ?

रूप की इस काँपती लौ के तले
यह हमारा प्यार कितने दिन चलेगा
?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हम न होंगे!

आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक और सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी की कुछ कविताएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ और उनके बारे में अपनी जानकारी भी शेयर कर चुका हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की एक और सुंदर कविता जिसमें उन्होंने बताया कि किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर भी ये दुनिया वैसे ही चलती रहती है –
हम न होंगे-
जीवन और उसका अनन्त स्पन्दन,
कड़ी धूप में घास की हरीतिमा,
प्रेम और मंदिरों का पुरातन स्थापत्य,
अक्षर, भाषा और सुन्दर कविताएँ,
इत्यादि, लेकिन, फिर भी सब होंगे-
किलकारी, उदासी और गान सब-
बस हम न होंगे।

शायद कभी किसी सपने की दरार में,
किसी भी क्षण भर की याद में,
किसी शब्द की अनसुनी अन्तर्ध्वनि में-
हमारे होने की हलकी सी छाप बची होगी
बस हम न होंगे।

देवता होंगे, दुष्ट होंगे,
जंगलों को छोड़कर बस्तियों में<
मठ बनाते सन्त होंगे,
दुबकी हुई पवित्रता होगी,
रौब जमाते पाप होंगे,
फटे-चिथड़े भरे-पूरे लोग होंगे,
बस हम न होंगे।

संसार के कोई सुख-दुख कम न होंगे
बस हम न होंगे।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आँखें बोलेंगी!

आज एक और सुंदर कविता स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनके बारे में काफी लिखा भी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक और सुंदर कविता –


जीभ की ज़रूरत नहीं है

क्योंकि कहकर या बोलकर
मन की बातें ज़ाहिर करने की
सूरत नहीं है

हम
बोलेंगे नहीं अब
घूमेंगे-भर खुले में

लोग
आँखें देखेंगे हमारी
आँखें हमारी बोलेंगी

बेचैनी घोलेंगी
हमारी आँखें
वातावरण में

जैसे प्रकृति घोलती है
प्रतिक्षण जीवन
करोड़ों बरस के आग्रही मरण में

और
सुगबुगाना पड़ता है
उसे

संग से
शरारे
छूटने लगते हैं

पहाड़ की छाती से
फूटने लगते हैं
झरने !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक उम्र मुस्कान की!

आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में काफी लिखा भी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर गीत –

इतनी ही थी अवधि हमारी अनबोली पहचान की
जैसे लाज भरे होठों पर एक उमर मुस्कान की

पल भर का परिचय था लेकिन
सुघर घड़ी तस्वीर-सी
टँगी रही प्यासी आँखों में
आकृति एक लकीर-सी

गन्ध झूलती रही शिराओं में अधखिले विहान की
जैसे आँगन में सुधि झूले बिना रुके मेहमान की

सागर के सिरहाने, अम्बर का
सूनापन ओढ़ कर
खड़ी रही अनमनी विदाई
टूटी ख़ुशियाँ जोड़ कर


प्यास देखती रही दूर तक रेखाएँ जलयान की
जैसे पढ़े रोशनी कोई ग़ज़ल किसी दीवान की|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कड़वे आचमन के बाद!

आज एक बार फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में भी काफी कुछ लिखा है, इसलिए आज सीधे उनका यह सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ|

आज कड़वे आचमन के बाद
वंशी को समर्पित हैं–
भरी आँखें, सहमते गीत
भारी मन

ये हमारी मुक्त चंद्रा -घटियाँ हैं
प्यार का संवाद इनमें साँस लेगा
सभ्यता के द्वार महकी रोशनी को
एक अनहदनाद फिर विस्तार देगा
खोल देंगे सप्तकों की गाँठ
पीली सरगमों के आँचलों में
बाँध देंगे हम हरे गुंजन


रच रही जो राग संजीवन हमारा
मातमो से घिर गई शहनाइयाँ वे
कर रही शृंगार मीठे स्वप्न से जो
धन्य हैं संसार की अगनाईयाँ वे
सौंप देंगे हम समय को आज
अपने गुनगुनाते आँसुओ से
धुले दर्पण, फागुनी चितवन

फिर हमारी ही प्रतीक्षा में कहीं पर
अनमने श्यामल गुलाबों के नयन हैं
फूटने को हैं कहीं अंकुर नुकीले
पत्तियों के अनसुने रेशम -वचन हैं
बाँट देंगे हम अनन्त वसंत
अपना बस यही धन है
हमारा बस यही है मन
यही है प्रन
आज कड़वे आचमन के बाद|

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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तस्वीर अधूरी रहनी थी!

आज एक पुरानी पोस्ट फिर से शेयर कर रहा हूँ|

हिंदी के एक अत्यंत श्रेष्ठ गीतकार थे श्री भारत भूषण जी, मेरठ के रहने वाले थे और काव्य मंचों पर मधुरता बिखेरते थे। मैं यह नहीं कह सकता कि वे सबसे लोकप्रिय थे, परंतु जो लोग कवि-सम्मेलनों में कविता, गीतों के आस्वादन के लिए जाते थे, उनको भारत भूषण जी के गीतों से बहुत सुकून मिलता था।

वैसे भारत भूषण जी ने बहुत से अमर गीत लिखे हैं- ‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा- उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’; ‘मैं बनफूल भला मेरा, कैसा खिलना, क्या मुर्झाना’, ‘आधी उमर करके धुआं, ये तो कहो किसके हुए’ आदि-आदि।

आज जो गीत मुझे बरबस याद आ रहा है वह एक ऐसा गीत है, जिसमें वे लोग जो जीवन में मनचाही उपलब्धियां नहीं कर पाते, असफल रहते हैं, वे अपने आप को किस तरह समझाते हैं, बहुत सुंदर उपमाएं दी हैं इस गीत में भारत भूषण जी ने, प्रस्तुत यह गीत-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा,

धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।

रेती पर लिखे नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था,

मलयानिल के बहकाने पर, बस एक प्रभात निखरना था,

गूंगे के मनोभाव जैसे, वाणी स्वीकार न कर पाए,

ऐसे ही मेरा हृदय कुसुम, असमर्पित सूख बिखरना था,

जैसे कोई प्यासा मरता, जल के अभाव में विष पी ले,

मेरे जीवन में भी ऐसी, कोई मजबूरी रहनी थी।

धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी॥




इच्छाओं के उगते बिरुवे, सब के सब सफल नहीं होते,

हर एक लहर के जूड़े में, अरुणारे कमल नहीं होते,

माटी का अंतर नहीं मगर, अंतर रेखाओं का तो है,

हर एक दीप के हंसने को, शीशे के महल नहीं होते,

दर्पण में परछाई जैसे, दीखे तो पर अनछुई रहे,

सारे सुख वैभव से यूं ही, मेरी भी दूरी रहनी थी।

धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी॥




मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,

चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,

ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,

तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे।

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।

धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।।



इस गीत के साथ मैं उस महान गीतकार का विनम्र स्मरण करता हूँ।


नमस्कार

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