तीलियों का पुल !

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में बहुत से अपने संस्मरण भी लिखे हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

मुझे हर तीसरे दिन
तीलियों का पुल बुलाता है
शाम कहती है—कहो क्या बात है ?
एक शीशा टूट जाता है


बिखर जाती हैं सितारों की तरह किरचें
(नंगे) पाँव डरते हैं
और उड़-उड़ कर क़िताबों के नए पन्ने
मना करते हैं
बदन सारा कसमसाता है

धूल से मैली हुई है
पर न मैली हुई जो मन से
झाँकती है जब कभी तस्वीर वह
कभी खिड़की, कभी आँगन से
नींद की दो डोरियों के बँधे पाँवों में
कौन है जो थरथराता है ?
एक शीशा टूट जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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याद का आसरा!

स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ साहित्यकार थे जिनको पद्मश्री सम्मान तथा अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्रदान किए गए थे और उन्होंने बच्चों की पत्रिका ‘पराग’ का कुशल संपादन भी किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह गीत –

तेरी याद का ले के आसरा,
मैं कहाँ-कहाँ से गुज़र गया,
उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ,
वो तो आईना देख के डर गया।

मेरे ज़ेहन में कोई ख़्वाब था
उसे देखना भी गुनाह था
वो बिखर गया मेरे सामने
सारा गुनाह मेरे सर गया।

मेरे ग़म का दरिया अथाह है
फ़क़त हौसले से निबाह है
जो चला था साथ निबाहने
वो तो रास्ते में उतर गया।

मुझे स्याहियों में न पाओगे
मैं मिलूंगा लफ़्ज़ों की धूप में
मुझे रोशनी की है जुस्तज़ू
मैं किरन-किरन में बिखर गया।

उसे क्या सुनाता मैं दास्ताँ,
वो तो आईना देख के डर गया।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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दुपहरिया!

आज मैं स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| केदारनाथ सिंह जी हिन्दी के प्रतिष्ठित रचनाकार रहे हैं और उनको ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| आज का यह नवगीत अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक किया गया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का यह नवगीत, जो गर्मी की दोपहर का एक अलग ही चित्र प्रस्तुत करता है –

झरने लगे नीम के पत्ते
बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर-झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —
सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में
रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए
लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाँहों में
भरने लगा एक खोयापन,


बड़ी हो गई कटु कानों को
‘चुर-मुर’ ध्वनि बाँसों के वन की ।

थककर ठहर गई दुपहरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आँखों के इस वीराने में —
और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन,
बीत गईं रातें ठिठुरन की ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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विसर्जन!


छायावाद युग के कवियों और कविताओं का उल्लेख महादेवी जी को याद की बिना कैसे पूरा हो सकता है| महादेवी जी का भी उस युग के साहित्य में अमूल्य योगदान है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता –

निशा की, धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल;

बिछाती थी सपनों के जाल
तुम्हारी वह करुणा की कोर,
गई वह अधरों की मुस्कान
मुझे मधुमय पीडा़ में बोर;

झटक जाता था पागल वात
धूलि में तुहिन कणों के हार;
सिखाने जीवन का संगीत
तभी तुम आये थे इस पार!

गये तब से कितने युग बीत
हुए कितने दीपक निर्वाण!
नहीं पर मैंने पाया सीख
तुम्हारा सा मनमोहन गान।

भूलती थी मैं सीखे राग
बिछलते थे कर बारम्बार,
तुम्हें तब आता था करुणेश!
उन्हीं मेरी भूलों पर प्यार!

नहीं अब गाया जाता देव!
थकी अँगुली हैं ढी़ले तार
विश्ववीणा में अपनी आज
मिला लो यह अस्फुट झंकार!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम कनक किरन!


आज फिर से मैं छायावाद युग के एक और स्तंभ कवि स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी ने जहां कामायनी, आँसू आदि जैसी अमर रचनाएं लिखी हैं, वहीं भारतीय संस्कृति के गौरव की पताका फहराने वाली अनेक कविताएं एवं नाटक भी लिखे थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रूमानी कविता –

तुम कनक किरन के अंतराल में
लुक छिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मोन बने रहते हो क्यो?

अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि की गुंजारों में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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किसान- मैथिलीशरण गुप्त

आज मैं स्वर्गीय मैथिलीशरण ‘गुप्त’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| ‘गुप्त’ जी को राष्ट्रकवि की भी उपाधि प्रदान की गई थी, उन्होंने हमारे धार्मिक, सांस्कृतिक आख्यानों पर आधारित बहुत से मूल्यवान काव्य लिखे हैं, जिनमें रामायण और महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण पात्रों पर आधारित काव्य भी शामिल हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय मैथिलीशरण ‘गुप्त’ जी की हमारे अन्नदाता किसानों की जीवन-स्थितियों से संबंधित एक कविता –

हेमन्त में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है,
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है|

हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ,
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ|

आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में,
अधपेट खाकर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में|

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा,
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा|

देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे,
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे|

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा,
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा|

तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं,
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं|

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है,
है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है|

तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते,
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते|

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है,
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है|

मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है,
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आकुल अंतर!


आज फिर से सुरीले गीतों के सृजक और कवि कुल के गौरव सीनियर बच्चन जी, अर्थात स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कवि जब व्याकुलता का अनुभव करता है तो वह सभी को किसी न किसी रूप में अपनी व्याकुलता में शामिल कर लेता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत –

लहर सागर का नहीं श्रृंगार,
उसकी विकलता है;
अनिल अम्बर का नहीं, खिलवार
उसकी विकलता है;
विविध रूपों में हुआ साकार,
रंगो में सुरंजित,
मृत्तिका का यह नहीं संसार,
उसकी विकलता है।


गन्ध कलिका का नहीं उद्गार,
उसकी विकलता है;
फूल मधुवन का नहीं गलहार,
उसकी विकलता है;
कोकिला का कौन-सा व्यवहार,
ऋतुपति को न भाया?
कूक कोयल की नहीं मनुहार,
उसकी विकलता है।

गान गायक का नहीं व्यापार,
उसकी विकलता है;
राग वीणा की नहीं झंकार,
उसकी विकलता है;
भावनाओं का मधुर आधार
सांसो से विनिर्मित,
गीत कवि-उर का नहीं उपहार,
उसकी विकलता है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कलम सरकंडे की!

श्री रामदरश मिश्र जी हिन्दी के उन श्रेष्ठ श्रेष्ठ रचनाकारों में से एक हैं, जिन्होंने कविता, कहानी और उपन्यास सभी क्षेत्रों में अपनी रचनाओं के माध्यम से उल्लेखनीय योगदान किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता जो कविधर्म की ओर बड़े सधे और शालीन ढंग से स्पष्ट संकेत करती है –

हमारे हाथ में सोने की नहीं
सरकंडे की कलम है।

सरकंडे की कलम
खूबसूरत नहीं, सही लिखती है
वह विरोध के मंच लिखती है
प्रशस्ति-पत्र नहीं लिखती है

हम कठघरे में खड़े हैं, खड़े रहेंगे
और कठघरे में खड़े हर उठे हुए हाथ को
अपने हाथ में ले लेंगे

राजा कौरव हों या पांडव—
हम तो सदा वनवास ही झेलेंगे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इतने बरसों बाद!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| लंबे समय तक बरसात को तरसने के बाद जब गाँव देहात में बारिश होती है तो सबके मन को सरसा जाती है, कृषक परिवारों के मन में एक नया उल्लास आ जाता है| यह गीत इसी स्थिति का है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री अनूप अशेष जी का यह गीत –

इतने बरसों बाद भले से
लगते गीले घर।।

गौरैया के पंख भीग कर
निकले पानी से,
कितने गए अषाढ़
देह के
छप्पर-छानी से।
बिटिया के मन में उगते
चिड़ियों के पीले-पर।।

अबके हरे-बाँस फूटें
आँगन शहनाई में,
कितने छूँछे
हर बसंत
बीते परछाई में।

अंकुराई है धान खेत के
सूखे-डीले पर।।


लाज लगे कोई देखे तो
फूटे पीकों-सी,
दूध-भरी
फूटी दोहनी के
खुलते छींकों-सी।
माँ की आँखों में झाँके-दिन
बंधन ढीले कर।।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कुछ सूखे फूलों के गुलदस्ते!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी अपनी किस्म के अनूठे कवि थे| बातचीत के लहज़े में कविता कहने का उनका निराला अंदाज़ था| मैंने पहले भी भवानी दादा की कुछ कविताएं शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है, हमारे भवानी दादा की यह कविता, जिसमें अभिव्यक्ति का एक अनूठा उदाहरण मिलता है –

कुछ सूखे फूलों के
गुलदस्तों की तरह
बासी शब्दों के
बस्तों को
फेंक नहीं पा रहा हूँ मैं

गुलदस्ते
जो सम्हालकर
रख लिये हैं
उनसे यादें जुड़ी हैं

शब्दों में भी
बसी हैं यादें
बिना खोले इन बस्तों को

बरसों से धरे हूँ
फेंकता नहीं हूँ
ना देता हूँ किसी शोधकर्ता को

बासे हो गये हैं शब्द
सूख गये हैं फूल
मगर नक़ली नहीं हैं वे न झूठे हैं!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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