क्या गाऊँ!

आज फिर हिन्दी कविता के विराट पुरुष- महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| निराला जी ने इस कविता में भी माता सरस्वती के समक्ष अपना विनम्र निवेदन किया है| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता–

क्या गाऊँ? माँ! क्या गाऊँ?
गूँज रहीं हैं जहाँ राग-रागिनियाँ,
गाती हैं किन्नरियाँ कितनी परियाँ
कितनी पंचदशी कामिनियाँ,

वहाँ एक यह लेकर वीणा दीन
तन्त्री-क्षीण, नहीं जिसमें कोई झंकार नवीन,
रुद्ध कण्ठ का राग अधूरा कैसे तुझे सुनाऊँ?–
माँ! क्या गाऊँ?

छाया है मन्दिर में तेरे यह कितना अनुराग!
चढते हैं चरणों पर कितने फूल
मृदु-दल, सरस-पराग;

गन्ध-मोद-मद पीकर मन्द समीर
शिथिल चरण जब कभी बढाती आती,
सजे हुए बजते उसके अधीर नूपुर-मंजीर!

वहाँ एक निर्गन्ध कुसुम उपहार,
नहीं कहीं जिसमें पराग-संचार सुरभि-संसार
कैसे भला चढ़ाऊँ?–
माँ? क्या गाऊँ?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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ऋतुओं की संधि!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गीतकार और कुशल मंच संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत, जिसमें ऋतुओं के संधि काल का विशेष वर्णन किया गया है –

है ऋतुओं की संधि
दिशायें हुई सयानी रे|

दुबली –पतली धार
बही नदिया के कूलो में
बड़े हो गये शूल
शीश तक चढ़े बबूलों में
क्या जागा संकोच
जम गया बहता पानी रे|

कहे ना जाएं दर्द
हुआ कुछ ऐसा अंधेरों को
चंपक – अंजुरी गहे
मनौती गूँथे गज़रों को
है तन –मन की बात
सभी जानी -अंजानी रे

थके -थके से दिखे
गगन चढ़ते सूरज राजा
कैसे बिरहा बोल
सुनाए बसवट का बाजा

पीली -पीली धूप
हुई है दिन की रानी रे
है ऋतुओं कि संधि
दिशायें हुई सयानी रे|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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उस दिन!

काफी लंबे समय के बाद मैं एक बार फिर से अपने प्रिय फिल्मी गीतकार स्वर्गीय शैलेंद्र जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| लेकिन यह फिल्मी गीत नहीं है| शैलेंद्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेंद्र जी का यह प्रेम गीत –


उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी !

जिस दिन तुमने सरल स्नेह भर
मेरी ओर निहारा;
विहंस बहा दी तपते मरुथल में
चंचल रस धारा !
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी !

जिस दिन अरुण अधरों से
तुमने हरी व्यथाएँ;
कर दीं प्रीत-गीत में परिणित
मेरी करुण कथाएँ !
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी !


जिस दिन तुमने बाहों में भर
तन का ताप मिटाया;
प्राण कर दिए पुण्य —
सफल कर दी मिट्टी की काया !
उस दिन ही प्रिय जनम-जनम की
साध हो चुकी पूरी !


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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बादल आये रे!

आज एक बार फिर से मैं, साहित्य के सभी क्षेत्रों में अपने कृतित्व की छाप छोड़ने वाले श्री रामदरश मिश्र जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल –


पानी बरसा धुआँधार फिर बादल आये रे
धन्य धरा का हुआ प्यार, फिर बादल आये रे

धूल चिड़चिड़ी धुली, नहा पत्तियाँ लगीं हँसने
प्रकृति लगी करने सिंगार फिर बादल आये रे

भीगी-भीगी छाँह उड़ रही माँ के आँचल-सी
गला धूप का अहंकार, फिर बादल आये रे

छिपा पत्तियों में पंछी कोई जाने किसको
बुला रहा है बार-बार, फिर बादल आये रे

प्रिया-देश से आने वाली ओ पगली पुरवा
लायी है क्या समाचार, फिर बादल आये रे

जलतरंग बन गयी नदी, उस पर नव-नव तानें
छेड़ रही झुमझुम फुहार फिर बादल आये रे

फूट चली धरती की खुशबू समय थरथराया
लगे काँपने बंद द्वार फिर बादल आये रे

उग आये अंकुर अनंत स्पंदन से भू-तन पर
आँखों में सपने हज़ार फिर बादल आये रे


वन, पर्वत, मैदान सभी गीतों में नहा रहे
आ हम भी छेड़ें मल्हार फिर बादल आये रे


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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जिंदगी अपनी नहीं!

लीजिए आज एक बार फिर से मैं, मेरे लिए बड़े भाई और गुरू जैसा दर्जा रखने वाले, पारंपरिक गीत और नवगीत दोनों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर बेचैन जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

दिवस खरीदे मजदूरी ने
मजबूरी ने रात
शाम हुई नीलाम थकन को
कुंठाओं को प्रात
जिंदगी अपनी नहीं रही ।

काली सड़कों पर पहरा है
अनजाने तम का
नभ में डरा डरा रहता है
चंदा पूनम का
नभ के उर में
चुभी कील-सी
तारों की बारात
कौन सी पीड़ा नहीं सही ?
जिंदगी अपनी नहीं रही।

रोज तीर सी चुभ जाती है
पहली सूर्य-किरन
सूरज
शेर बना फिरता है
मेरे प्राण हिरन
कर जाती है
धूप निगोड़िन
पल-पल पर आघात
जिंदगी आँसू बनी वही।
जिंदगी अपनी नहीं रही।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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वक़्त की मीनार पर!

आज एक बार फिर से मैं नवगीत आंदोलन के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| शंभुनाथ जी ने अपने गीतों और नेतृत्व- संकलन, संपादन आदि के माध्यम से नवगीत को सुदृढ़ आधार प्रदान किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत –


मैं तुम्हारे साथ हूँ
हर मोड़ पर संग-संग मुड़ा हूँ।

तुम जहाँ भी हो वहीं मैं,
जंगलों में या पहाड़ों में,
मंदिरों में, खंडहरों में,
सिन्धु लहरों की पछाड़ों में,

मैं तुम्हारे पाँव से
परछाइयाँ बनकर जुड़ा हूँ।

शाल-वन की छाँव में
चलता हुआ टहनी झुकाता हूँ,
स्वर मिला स्वर में तुम्हारे
पास मृगछौने बुलाता हूँ,

पंख पर बैठा तितलियों के
तुम्हारे संग उड़ा हूँ।

रेत में सूखी नदी की
मैं अजन्ताएँ बनाता हूँ,
द्वार पर बैठा गुफ़ा के
मैं तथागत गीत गाता हूँ,

बोध के वे क्षण, मुझे लगता
कि मैं ख़ुद से बड़ा हूँ।

इन झरोखों से लुटाता
उम्र का अनमोल सरमाया,
मैं दिनों की सीढ़ियाँ
चढ़ता हुआ ऊपर चला आया,

हाथ पकड़े वक़्त की
मीनार पर संग-संग खड़ा हूँ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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आम के हैं पेड़ बाबा!

आज मैं श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ग्रामीण परिवेश को लेकर अनूप जी ने बहुत अच्छे गीत लिखे हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह गीत –

आम के हैं पेड़ बाबा
पिता फल
नाती टिकोरे हैं ।

भात में है दूध
रोटी में रहे घी,
पोपले मुँह की
असीसें
हम रहे हैं जी ।

नीम की हैं छाँह बाबा
खाटें अपनी
रहे जोरे हैं ।

खेल में घुटने
दुकानों रहे खीसे,
मीठी गोली
बात में बादाम-से पीसे ।

शाम की ठंडई बाबा
धूप दिन के
रहे घोरे हैं ।

भूख की कोरों में गीले
फूल में सरसों,
पिता में कुछ ढूँढ़ते
जैसे रहे बरसों ।

खेतों की हैं मेंड़ बाबा
धान-गंधों
रहे बोरे हैं ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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जो कुटिलता से जियेंगे!

आज एक बार मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख कवि और सांसद भी रहे स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी की कविताओं में साफ़गोई और खुद्दारी की अभिव्यक्ति प्रमुखता से मिलती थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह कविता –

छीनकर छ्लछंद से

हक पराया मारकर

अमृत पिया तो क्या पिया ?

हो गये बेशक अमर

जी रहे अमृत उमर

लेकिन अभय अनमोल

सारा छिन गया ।


देवता तो हो गये पर

क्या हुआ देवत्व का ?

आयुभर चिन्ता करो अब

पद प्रतिष्टा,राजसत्ता

और अपने लोक की !

छिन नहीं जाए सुधा सिंहासनों की

एक ही भय

रात दिन आठों प्रहर

प्राण में बैठा रहे–

इस भयातुर अमर

जीवन का करो क्या ?


जो किसी षड्यंत्र मे

छलछंद में शामिल नहीं था

पी गया सारा हलाहल

हो गया कैसे अमर ?

पा गया साम्राज्य

’शिव’- संज्ञा सहित

शिवलोक का —

कर रहा कल्याण सारे विश्व का !



सुर – असुर सब पूजते

उसको निरंतर

साध्य सबका बन गया

कर्म मे कोई कलुष

जिसके नहीं है

शीश पर नीलाभ नभ

खुद छत्र बनकर तन गया !



जो कुटिलता से जियेंगे

वे सदा विचलित रहेंगे

त्राण-त्राता के लिये

मारे फिरेंगे !


हक पराया मारकर

छलछंद से छीना हुआ

अमृत अगर मिल भी गया तो

आप उसका पान करके

उम्र भर फिर क्या करेंगे ?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार !

आज मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि और शिक्षाविद स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कविता के अनेक सम्मानों के अलावा सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान पद्मश्री एवं पद्मभूषण से भी अलंकृत किया गया था| उन्होंने शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में अनेक उच्च पदों को भी सुशोभित किया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता –

मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था।

गति मिली मैं चल पड़ा
पथ पर कहीं रुकना मना था,
राह अनदेखी, अजाना देश
संगी अनसुना था।
चांद सूरज की तरह चलता
न जाना रात दिन है,
किस तरह हम तुम गए मिल
आज भी कहना कठिन है,
तन न आया मांगने अभिसार
मन ही जुड़ गया था।

देख मेरे पंख चल, गतिमय
लता भी लहलहाई
पत्र आँचल में छिपाए मुख
कली भी मुस्कुराई।
एक क्षण को थम गए डैने
समझ विश्राम का पल
पर प्रबल संघर्ष बनकर
आ गई आंधी सदलबल।
डाल झूमी, पर न टूटी
किंतु पंछी उड़ गया था।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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स्वेटर!

एक बार फिर से मैं आज हिन्दी के एक प्रमुख कवि और साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल के प्रमुख सदस्य रहे स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता, जिसमें एक स्वेटर के बहाने देखें क्या क्या कहा गया है –

तुमने जो स्वेटर
मुझे बुनकर दिया है
उसमें कितने घर हैं
यह मैं नहीं जानता,
न ही यह
कि हर घर में तुम कितनी
और किस तरह बैठी हो,
रोशनी आने
और धुआँ निकलने के रास्ते
तुमने छोड़े हैं या नहीं,
सिर्फ़ यह जानता हूँ
कि मेरी एक धड़कन है
और उसके ऊपर चन्द पसलियाँ हैं
और उनसे चिपके
घर ही घर हैं
तुम्हारे रचे घर
मेरे न हो कर भी मेरे लिए.
अब इसे पहनकर
बाहर की बर्फ़ में
मैं निकल जाऊँगा.
गुर्राती कटखनी हवाओं को
मेरी पसलियों तक आने से
रोकने के लिए
तुम्हारे ये घर
कितनी किले बन्दी कर सकेंगे
यह मैं नही जानता,
इतना ज़रूर जानता हूँ
कि उनके नीचे बेचैन
मेरी धड़कनों के साथ
उनका सीधा टकराव शुरू हो गया है.

मानता हूँ
जहाँ पसलियाँ अड़ाऊँगा
वहाँ ये मेरे साथ होंगे
लेकिन जहाँ मात खाऊँगा
वहाँ इन धड़कनों के साथ कौन होगा?
सदियों से
हर एक
एक दूसरे के लिए
ऐसे ही घर रचता रहा है
जो पसलियों के नीचे के लिए नहीं होते !
इससे अच्छा था
तुम प्यार भरी दृष्टि
मशाल की तरह
इन धड़कनों के पास गड़ा देतीं
कम —से—कम उनसे
मैं शत्रुओं का सही— सही
चेहरा तो पहचान लेता
गुर्राती हवाओं के दाँत
कितने नुकीले हैं जान लेता .
अब तो जब मैं
तूफ़ानों से लड़ता— जूझता
औंधे मुँह गिर पड़ूँगा
तो आँखों की बुझती रोशनी में
तुम्हारी सिलाइयाँ
नंगे पेड़ों—सी दीखेंगी
जिन पर न कोई पत्ता होगा न पक्षी
जो धीरे—धीरे बर्फ़ से इस कदर सफ़ेद हो जायेंगी
जैसे लाश गाड़ी में शव ले जाने वाले.
इसके बाद
तूफ़ान खत्म हो जाने पर
शायद तुम मेरी खोज में आओ
और मेरी लाश को
पसलियों पर चिपके अपने घरों के सहारे
पहचान लो
और खुश होओ कि तुमने
मेरी पहचान बनाने में
मदद की है
और दूसरा स्वेटर बुनने लगो.


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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