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दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है!

पिछले सप्ताह में ही मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का जन्मदिन आया था और उसके बाद विख्यात निर्माता, निर्देशक और अभिनेता- मनोज कुमार जी का भी जन्मदिन आया जो अब 83 वर्ष के हो गए हैं| मनोज जी जहां एक बहुत अच्छे अभिनेता रहे वहीं उन्होंने राष्ट्रीयता की भावना से भारी बहुत प्यारी फिल्में भी बनाई हैं| एक और खास बात कि स्वर्गीय राज कपूर जी की तरह मनोज कुमार जी ने भी मुकेश जी की मधुर आवाज का भरपूर उपयोग अपनी फिल्मों में किया है|


आज मैं इन दोनों से जुड़ा एक गीत फिल्म- शोर से प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे लिखा था संतोषानंद जी ने और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी और लता जी ने गाकर इस गीत को अमर बना दिया था| एक और बात इस गीत में वायलिन का बहुत सुंदर उपयोग किया गया है|
लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-



एक प्यार का नगमा है
मौजों की रवानी है,
ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||

कुछ पाकर खोना है,
कुछ खोकर पाना है,
जीवन का मतलब तो,
आना और जाना है|
दो पल के जीवन से,
इक उम्र चुरानी है|

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|

एक प्यार का नगमा है||

तू धार है नदिया की,
मैं तेरा किनारा हूँ|
तू मेरा सहारा है,
मैं तेरा सहारा हूँ|
आँखों में समंदर है,
आशाओं का पानी है|


ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||


तूफान को आना है,
आकर चले जाना है,
बादल है ये दो पल का,
छाकर ढल जाना है|
परछाइयाँ रह जातीं,
रह जाती निशानी है|

ज़िंदगी और कुछ भी नहीं,
तेरी मेरी कहानी है|
एक प्यार का नगमा है||



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोई सपनों के दीप जलाए!

आज फिल्म- ‘आनंद’  के लिए मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है, जो आज तक लोगों की ज़ुबान पर है। उस समय राजेश खन्ना जी सुपर स्टार थे और अमिताभ बच्चन के कैरियर को आगे बढ़ाने में इस फिल्म की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

योगेश जी के लिखे इस गीत को मुकेश जी ने सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में गाया था। आइए इसके बोलों के बहाने मुकेश जी के गाये इस अमर गीत को याद कर लेते हैं-

 

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए,
मेरे ख़यालों के आँगन में,
कोई सपनों के दीप जलाए।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए।
कभी यूँ हीं, जब हुईं, बोझल साँसें,
भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें,
तभी मचल के, प्यार से चल के,
छुए कोई मुझे पर नज़र न आए, नज़र न आए।

 

कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते,
कहीं से निकल आए, जनमों के नाते।
घनी थी उलझन, बैरी अपना मन,
अपना ही होके सहे दर्द पराये।
दिल जाने, मेरे सारे, भेद ये गहरे,
खो गए कैसे मेरे, सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने,
मुझसे जुदा न होंगे इनके ये साये, इनके ये साये।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए।

 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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