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मैं दीन हो जाता हूँ!

आज मैं हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार, तारसप्तक के कवि और बातचीत के लहजे में श्रेष्ठ रचनाएं देने के लिए विख्यात, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों से विभूषित स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

इस रचना में भवानी दादा ने कुछ ऐसे मनोभाव व्यक्त किए हैं कि कई बार किसी रईस व्यक्ति से मिलने के बाद ऐसा ऐहसास होता है कि वह रईस होने के अलावा कुछ नहीं है, यहाँ तक कि इंसान भी नहीं और निरंतर उसके सामने लघुता का कृत्रिम बोध होता है| लीजिए प्रस्तुत है भवानी दादा की यह कविता –


सागर से मिलकर जैसे
नदी खारी हो जाती है
तबीयत वैसे ही
भारी हो जाती है मेरी
सम्पन्नों से मिलकर

व्यक्ति से मिलने का
अनुभव नहीं होता
ऐसा नहीं लगता
धारा से धारा जुड़ी है
एक सुगंध
दूसरी सुगंध की ओर मुड़ी है|


तो कहना चाहिए
सम्पन्न व्यक्ति
व्यक्ति नहीं है
वह सच्ची कोई अभिव्यक्ति
नहीं है

कई बातों का जमाव है
सही किसी भी
अस्तित्व का अभाव है
मैं उससे मिलकर
अस्तित्वहीन हो जाता हूँ


दीनता मेरी
बनावट का कोई तत्व नहीं है
फिर भी धनाढ्य से मिलकर
मैं दीन हो जाता हूँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बेरोज़गार हम!

डॉक्टर शांति सुमन जी हिन्दी की वरिष्ठ नवागीतकार हैं, बहुत वर्ष पहले शायद 1985 के आसपास झारखंड स्थित हिंदुस्तान कॉपर की परियोजना में आयोजित एक कवि सम्मेलन में गांव की स्थिति पर आधारित उनका नवगीत सुना था, जिसकी पंक्तियां थीं-

थाली उतनी की उतनी ही, छोटी हो गई रोटी,
कहती बड़की भौजी मेरे गांव की|


आज फिर से गांव में गरीब परिवार की स्थितियों को ही दर्शाने वाला गीत शेयर कर रहा हूँ, लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर शांति सुमन जी का यह गीत –


पिता किसान अनपढ़ मां, बेरोज़गार हैं हम
जाने राम कहां से होगी
घर की चिन्ता कम|

आंगन की तुलसी-सी बढ़ती
घर में बहन कुमारी
आसमान में चिड़िया-सी
उड़ती इच्छा सुकुमारी

छोटा भाई दिल्ली जाने का भरता है दम ।


पटवन के पैसे होते
तो बिकती नहीं ज़मीन
और तकाजे मुखिया के
ले जाते सुख को छीन

पतले होते मेड़ों पर आंखें जाती हैं थम ।

जहां-तहां फटने को है
साड़ी पिछली होली की
झुकी हुई आंखें लगती हैं
अब करुणा की बोली सी
समय-साल ख़राब टंगे रहते बनकर परचम ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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सार्वजनिक ज़िंदगी!

आज मैं स्वर्गीय सुदामा प्रसाद पांडे जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जिनको कविता की दुनिया में ‘धूमिल’ नाम से जाना जाता था| धूमिल जी के पास चीजों और घटनाओं को देखने का अलग ही नजरिया था, एक अलग मुहावरा था, जिसमें वे आम आदमी की स्थितियों का बड़ा सटीक वर्णन करते थे|


लीजिए आज प्रस्तुत है धूमिल जी की यह कविता –

मैं होटल के तौलिया की तरह
सार्वजनिक हो गया हूँ
क्या ख़ूब, खाओ और पोंछो,
ज़रा सोचो,
यह भी क्या ज़िन्दगी है
जो हमेशा दूसरों के जूठ से गीली रहती है।
कटे हुए पंजे की तरह घूमते हैं अधनंगे बच्चे
गलियों में गोलियाँ खेलते हैं
मगर अव्वल यह कि
देश के नक़्शे की लकीरें इन पर निर्भर हैं
और दोयम यह कि
न सही मुझसे सही आदमी होने की उम्मीद
मगर आज़ादी ने मुझे यह तो सिखलाया है
कि इश्तहार कहाँ चिपकाना है
और पेशाब कहाँ करना है

और इसी तरह ख़ाली हाथ
वक़्त-बेवक़्त मतदान करते हुए
हारे हुओं को हींकते हुए
सफलों का सम्मान करते हुए
मुझे एक जनतान्त्रिक मौत मरना है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अखबारवाला!

श्री रघुवीर सहाय जी अपने समय के एक श्रेष्ठ कवि रहे हैं, बेबाक अंदाज़ में अपनी बात कहते थे, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ जिसे अज्ञेय जी ने शुरू किया था, उनके बाद उसके संपादक रघुवीर सहाय जी बने थे| खबरों के विश्लेषण के मामले में ‘दिनमान’ का अपना विशेष स्थान था|


रघुवीर सहाय जी के अनेक कविता संकलन प्रकाशित हुए हैं और उन्हें अनेक सम्मानों से विभूषित किया गया था|

लीजिए आज रघुवीर सहाय जी की यह कविता प्रस्तुत है –

धधकती धूप में रामू खड़ा है
खड़ा भुलभुल में बदलता पाँव रह रह
बेचता अख़बार जिसमें बड़े सौदे हो रहे हैं ।

एक प्रति पर पाँच पैसे कमीशन है,
और कम पर भी उसे वह बेच सकता है
अगर हम तरस खायें, पाँच रूपये दें
अगर ख़ैरात वह ले ले ।

लगी पूँजी हमारी है छपाई-कल हमारी है
ख़बर हमको पता है, हमारा आतंक है,
हमने बनाई है
यहाँ चलती सड़क पर इस ख़बर को हम ख़रीदें क्यो ?

कमाई पाँच दस अख़बार भर की क्यों न जाने दें ?

वहाँ जब छाँह में रामू दुआएँ दे रहा होगा
ख़बर वातानुकूलित कक्ष में तय कर रही होगी
करेगी कौन रामू के तले की भूमि पर कब्ज़ा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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एक मुट्ठी धान में!

आज मैं प्रसिद्ध कवि और पूर्व सांसद- श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| माननीय उदय प्रताप जन प्रतिनिधि हैं और सामान्य जन की चिंताओं से उनका सीधा सरोकार भी है| श्री उदय प्रताप सिंह जी संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य के रूप में मेरे पूर्व संस्थान – एनटीपीसी में भी आए थे और वहां आयोजित कवि-सम्मेलन में उनका काव्य पाठ सुनने का सुअवसर भी मुझे मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह ग़ज़ल –

ये रोज कोई पूछता है मेरे कान में
हिंदोस्ताँ कहाँ है अब हिंदोस्तान में।

इन बादलों की आँख में पानी नहीं रहा
तन बेचती है भूख एक मुट्ठी धान में।

तस्वीर के लिये भी कोई रूप चाहिये
ये आईना अभिशाप है सूने मकान में।

जनतंत्र में जोंकों की कोई आस्था नहीं
क्या फ़ायदा संशोधनों से संविधान में।


मानो न मानो तुम ’उदय’ लक्षण सुबह के हैं
चमकीला तारा कोई नहीं आसमान में।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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माँ है रेशम के कारख़ाने में!

अली सरदार जाफरी साहब की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में पिछड़े वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का ऐसा चित्रण किया गया है, जिनकी हालत पीढ़ी दर पीढ़ी एक जैसी बनी रहती है, कोई सपने नहीं, कोई बदलाव की उम्मीद नहीं है|

जाफरी साहब एक प्रगतिशील शायर थे, मुद्दतों पहले उन्होंने यह रचना लिखी थी, लेकिन आज भी स्थितियाँ वैसी ही है|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफरी साहब की यह सुंदर रचना-

 

 

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है,
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है|

 

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा,
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूख सरमाये की बढ़ाएगा|

 

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा,
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिये जलाएगा|

 

यह जो नन्हा है भोला-भाला है
खूनी सरमाये का निवाला है,
पूछती है ये, इसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-14 : बचपन!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौदहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

 

बचपन

बचपन के बारे में,
आपके मन में भी कुछ सपनीले खयालात होंगे,
है भी ठीक, अपने आदर्श रूप में- बचपन
एक सुनहरा सपना है,
जो बीत जाने के बाद, बार-बार याद आता है।
कोशिश रहती है हमारी, कि हमारे बच्चे-
हक़ीकत को जानें अवश्य,
पर उसके कड़ुए दंश से घायल न हों।
वे ये तो जानें कि जमीन पथरीली है,
पर उससे उनके नाज़ुक पैर न छिलें,
कोशिश तो यहाँ तक होती है कि उनके पांव
जहाँ तक संभव हो-
पथरीली जमीन को छुएं भी नहीं।
खिलौनों, बादलों, खुले आसमान
और परीलोक को ही वे, अपनी दुनिया मानते रहें।
सचमुच कितने भाग्यशाली हैं ये बच्चे-
यह खयाल तब आता है, जब-
कोई दुधमुहा बच्चा, चाय की दुकान में
कप-प्लेट साफ करता है।
दुकान में चाय-नाश्ता बांटते समय
जब कुछ टूट जाता है उससे, तब
ग्राहक या दुकानदार, पूरी ताकत से
उसके गाल पर, अपनी घृणा के हस्ताक्षर करता है।
सपनों की दुनिया से अनजान ये बच्चे,
जब कहीं काम या भीख मांगते दिखते हैं,
तब आता है खयाल मन में-
कि ये बच्चे, देश का भविष्य हैं!
अपनी पूरी ताकत से कोई छोटा बच्चा
जब रिक्शा के पैडल मारता है,
तब कितनी करुणा से देखते हैं उसको आप!
हम बंटे रहें-
जातियों, संप्रदायों, देशों और प्रदेशों में,
पर क्या कोई ऐसी सूरत नहीं कि
बच्चों को हम, बच्चों की तरह देखें।
कोशिश करें कि ये नौनिहाल-
स्वप्न देखने की अवधि, तालीम की उम्र
ठीक से गुज़ारें
और उसके बाद, ज़िंदगी की लड़ाई में
अपने बलबूते पर, प्रतिभा के दम पर
शामिल हों।
क्या हम सब रच सकते हैं
इस निहायत ज़रूरी सपने को-
अपने परिवेश में!

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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