तंगी में उसको शराब क्या देते!

शराब दिल की तलब थी शरा के पहरे में,
हम इतनी तंगी में उसको शराब क्या देते|

मुनीर नियाज़ी

शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता!

वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे,
कि जिनमें शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता|

कैफ़ी आज़मी

गुजरे बरसों बरस!

श्री राम कुमार कृषक जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि हैं| मुझे स्मरण है कि मैंने दिल्ली में बहुत समय पहले, उनके साथ कुछ कवि गोष्ठियों में भाग लिया था, उनके साथ उनके मित्र श्री पुरुषोत्तम प्रतीक भी गोष्ठियों में आते थे| कृषक जी का एक गीत उस समय बहुत प्रसिद्ध था- ‘बागड़ की छोकरियाँ’ जिसको मैंने पहले शेयर किया है, अभी उसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ दोहरा रहा हूँ-

नंगे पाँवों, हाथ कुदाली, सिर बजरी की टोकरियाँ
नंगापन शहरों का ढकतीं, ये बागड़ की छोकरियाँ|


लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राम कुमार कृषक जी का यह नवगीत –

कपड़ा-लत्ता जूता-शूता
जी-भर पास नहीं
भीतर आम नहीं हो पाता
बाहर ख़ास नहीं

जिए ज़माने भर की ख़ातिर
घर को भूल गए
उर-पुर की सीता पर रीझे
खीजे झूल गए
राजतिलक ठुकराया
भाया पर वनवास नहीं

भाड़ फोड़ने निकले इकले
हुए पजलने को
मिले कमेरे हाथ/ मिले पर
खाली मलने को
धँसने को धरती है
उड़ने को आकाश नहीं

औरों को दुख दिया नहीं
सुख पाते भी कैसे
कल परसों क्या यों जाएंगे
आए थे जैसे
गुज़रे बरसों-बरस
गुज़रते बारह मास नहीं !


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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भूख न जाने शर्म!

भूखा पेट न जानता क्या है धर्म-अधर्म,
बेच देय संतान तक, भूख न जाने शर्म|

गोपाल दास नीरज

ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है!

अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में,
कहीं कुछ ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है|

शहरयार

बेटी बेटे!

हमारी हिन्दी फिल्मों के माध्यम से हमको अनेक अमर गीत देने वाले स्वर्गीय शैलेन्द्र जी का आज एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत फिल्म- बेटी-बेटे में फिल्माया गया| गीत में यही है कि किस प्रकार एक माँ अपने बेटे-बेटी को समझाती है कि आज का दिन तो बीत गया अब हमको कल की तैयारी करनी है|

लीजिए प्रस्तुत है शैलेन्द्र जी का यह गीत जो माँ की ममता और गरीबी के संघर्ष को भी बड़ी खूबी से अभिव्यक्त करता है –

आज कल में ढल गया
दिन हुआ तमाम
तू भी सो जा सो गई
रंग भरी शाम|

साँस साँस का हिसाब ले रही है ज़िन्दगी
और बस दिलासे ही दे रही है ज़िन्दगी
रोटियों के ख़्वाब से चल रहा है काम
तू भी सोजा ….

रोटियों-सा गोल-गोल चांद मुस्‍कुरा रहा
दूर अपने देश से मुझे-तुझे बुला रहा
नींद कह रही है चल, मेरी बाहें थाम
तू भी सोजा…

गर कठिन-कठिन है रात ये भी ढल ही जाएगी
आस का संदेशा लेके फिर सुबह तो आएगी
हाथ पैर ढूंढ लेंगे , फिर से कोई काम
तू भी सोजा…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हाल की हो किस तरह ख़बर!

रहबर को उनके हाल की हो किस तरह ख़बर,
लोगों के दरमियां कभी आकर नहीं रहा|

मुनीर नियाज़ी

वो लड़का ग़रीब था!

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में,
मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था|

अंजुम रहबर

हमने फ़ाक़े झेले थे!

ज़हनो-दिल आज भूखे मरते हैं,
उन दिनों हमने फ़ाक़े झेले थे|

जावेद अख़्तर

मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए!

न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए|

दुष्यंत कुमार