अन्वेषण!

आज फिर से मैं श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| त्रिपाठी जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और स्वाधीनता सेनानी भी थे| उनकी कुछ कविताओं का प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है| जैसे- ‘हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए, शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए’ अथवा ‘मैं ढूँढता तुझे था जब कुंज और वन में, तू खोजता मुझे था तब दिन के सदन में|’
श्री रामनरेश त्रिपाठी जी के बारे में एक प्रसंग मैंने पढ़ा था, श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की एक प्रसिद्ध कविता है- ‘जन को जन के आगे कर फैलाते देखा’| एक बार की बात है कि वे और नेहरू जी एक ही जेल में बंद थे, और कोई उनका भक्त व्यक्ति उनको पंखा झल रहा था| इस पर नेहरू जी ने उनको कविता की एक पंक्ति सुनाई- ‘जन को जन के आगे विजन डुलाते देखा|’
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की यह रचना –

हृदय को हम सदा तेरे लिए तैयार करते हैं।
तुझे आनंद-सा सुख-सा सदा हम प्यार करते हैं॥

तुझे हँसता हुआ देखें किसी दुखिया के मुखड़े पर।
इसी से सत्पुरुष प्रत्येक का उपकार करते हैं॥

बताते हैं पता तारे गगन में और उपवन में,
सुमन संकेत तेरी ओर बारंबार करते हैं॥

अनोखी बात है तेरे निराले प्रेम बंधन में
उलझकर भक्त उलझन से जगत को पार करते हैं॥

न होती आह तो तेरी दया का क्या पता होता।
इसीसे दीन जन दिनरात हाहाकार करते हैं॥

हमें तू सींचने दे आँसुओं से पंथ जीवन का
जगत के ताप का हम तो यही उपचार करते हैं॥


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इस तरह माँगा मुझे!

तुमने देखा है किसी मीरा को मंदिर में कभी,
एक दिन उसने ख़ुदा से इस तरह माँगा मुझे|

बशीर बद्र

सदाओं का घर नहीं होता!

मुझे तलाश करोगे तो फिर न पाओगे,
मैं इक सदा हूँ सदाओं का घर नहीं होता|

वसीम बरेलवी

माँ दुआ करती हुई!

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है|

मुनव्वर राना

मेरे नाम का बादल भेजो न!

धूप बहुत है मौसम जल-थल भेजो न,
बाबा मेरे नाम का बादल भेजो न|

राहत इन्दौरी

सबके अपने-अपने साँचे हैं!

चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने साँचे हैं,
जो मूरत में ढल जाये वो पैकर अच्छा लगता है|

निदा फ़ाज़ली

अपना ख़ुदा ढूंढ रहे हैं!

पूजा में, नमाज़ों में, अज़ानों में, भजन में,
ये लोग कहाँ अपना ख़ुदा ढूंढ रहे हैं|

राजेश रेड्डी

फिर चाहे दीवाना कर दे!

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह,
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह|

क़तील शिफ़ाई

फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह!

एक बार फिर से आज मैं भारतीय उप महाद्वीप के मशहूर शायर क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|

वास्तव में ये कवि, शायर और कलाकार ही होते हैं जिनको देश की सीमा में नहीं बांधा जा सकता| क़तील साहब की बहुत सी ग़ज़लों को अनेक भारतीय और पाकिस्तानी गायकों ने गाया है और ये गायक कलाकार भी किसी देश की सीमा के मोहताज नहीं हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है, क़तील शिफाई साहब की यह ग़ज़ल –


दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह,
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह|

मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे,
रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह|

सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके,
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह|

या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे,
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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