कब फ़ुर्सत सुने फ़रियाद सब!

चार लफ़्ज़ों में कहो जो भी कहो,
उसको कब फ़ुर्सत सुने फ़रियाद सब|

जावेद अख़्तर

हमने गुज़ारिश नहीं की!

ये भी क्या कम है कि दोनों का भरम क़ाएम है,
उसने बख़्शिश नहीं की हमने गुज़ारिश नहीं की|

अहमद फ़राज़

बंद किए जा रहे हैं बुत-ख़ाने!

मिरे जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग,
सुना है बंद किए जा रहे हैं बुत-ख़ाने|

कैफ़ी आज़मी

मेरा दस्त-ए-दुआ’ अकेला था!

बख़्शिश-ए-बे-हिसाब के आगे,
मेरा दस्त-ए-दुआ’ अकेला था|

वसीम बरेलवी

दर्द-ए-दिल है बख़्शिश-ए-दोस्त!

ऐ ख़ुदा दर्द-ए-दिल है बख़्शिश-ए-दोस्त,
आब-ओ-दाना नहीं कि तुझ से कहें|

अहमद फ़राज़

ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता!

पेशानी को सज्दे भी अता कर मिरे मौला,
आँखों से तो ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

अँधेरे में इबादत नहीं करता!

देते हैं उजाले मिरे सज्दों की गवाही,
मैं छुप के अँधेरे में इबादत नहीं करता|

क़तील शिफ़ाई

बन्दगी में मेरा भला न हुआ!

क्या वो नमरूद की ख़ुदायी थी,
बन्दगी में मेरा भला न हुआ|

मिर्ज़ा ग़ालिब

मैं सर झुका रही थी कि!

ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए,
मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

मस्जिद में ख़ुदा को सज्दे!

शेख़ करता तो है मस्जिद में ख़ुदा को सज्दे,
उस के सज्दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं|

ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी