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क़ैदी – रवींद्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Prisoner’ का भावानुवाद-

 

 

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

 

क़ैदी

`क़ैदी, बताओ मुझे, कौन था जिसने तुम्हे बंधन में बांध दिया?’

 

`वह मेरा मालिक था,’ क़ैदी ने कहा।
`मैंने सोचा कि मैं धन और शक्ति के मामले में हर किसी को पीछे छोड़ सकता हूँ,
और मैंने अपने धन भंडार में खूब धन एकत्र किया, जो मेरे राजा को देय था।
 जब नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया, तब मैं अपने स्वामी के बिस्तर में सो गया था,
और जब मेरी आंख खुली था, तब मैं क़ैदी बन चुका था, अपने ही धन-भंडार में।‘

 

`क़ैदी, बताओ मुझे, कौन था जिसने यह अटूट जंजीर बनाई?’

 

`वह मैं ही था,’ क़ैदी ने कहा, `जिसने बड़ी सावधानी से यह जंज़ीर तैयार की।
मैंने सोचा था कि अपनी अजेय शक्ति के बल पर मैं दुनिया पर कब्ज़ा कर लूंगा
और इस प्रकार मैं निर्बाध स्वतंत्रता अर्जित कर लूंगा।
इस प्रकार मैंने दिन-रात लगकर यह जंज़ीर तैयार की,
अग्नि की क्रूर लपटों और हथौड़े की कठोर चोटों के बल पर।
और जब आखिरकार यह काम पूरा हो गया
और जंज़ीर की कड़ियां पूरी और अभेद्य बन गईं,
तब मैंने पाया कि मैं ही इनके बंधन में जकड़ा हुआ हूँ।’

 

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

Prisoner

 

`Prisoner, tell me, who was it that bound you?’
`It was my master,’ said the prisoner.
`I thought I could outdo everybody in the world in wealth and power,
and I amassed in my own treasure-house the money due to my king.
When sleep overcame me I lay upon the bed that was for my lord,
and on waking up I found I was a prisoner in my own treasure-house.’
`Prisoner, tell me, who was it that wrought this unbreakable chain?’
`It was I,’ said the prisoner, `who forged this chain very carefully.
I thought my invincible power would hold the world captive
leaving me in a freedom undisturbed.
Thus night and day I worked at the chain
with huge fires and cruel hard strokes.
When at last the work was done
and the links were complete and unbreakable,
I found that it held me in its grip.’

 

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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