शीश-महल में एक एक चेहरा!

किसको पत्थर मारूँ ‘क़ैसर’ कौन पराया है,
शीश-महल में एक एक चेहरा अपना लगता है|

क़ैसर उल जाफ़री

इस सूने घर में मेला लगता है!

दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं,
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है|

क़ैसर उल जाफ़री

सबका दामन भीगा लगता है!

इस बस्ती में कौन हमारे आंसू पोंछेगा,
जो मिलता है उसका दामन भीगा लगता है|

क़ैसर उल जाफ़री