सायों को गले लगा रहा हूँ!

आया न ‘क़तील’ दोस्त कोई,
सायों को गले लगा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

दर अपना ही खटखटा रहा हूँ!

मुमकिन है जवाब दे उदासी,
दर अपना ही खटखटा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ!

है शहर में क़हत पत्थरों का,
जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ!

दरिया-ए-फ़ुरात है ये दुनिया,
प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ!

अहबाब को दे रहा हूँ धोखा,
चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

सूरज से बदन छुपा रहा हूँ!

सीने में मिरे है मोम का दिल,
सूरज से बदन छुपा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

शीशे के महल बना रहा हूँ!

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ,
शीशे के महल बना रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

कोई भी फूल मुरझाया न था!

सिर्फ़ ख़ुश्बू की कमी थी ग़ौर के क़ाबिल ‘क़तील’,
वर्ना गुलशन में कोई भी फूल मुरझाया न था|

क़तील शिफ़ाई

झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ!

अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ,
अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था|

क़तील शिफ़ाई