क्यों मेरे शेर हैं मक़बूल!

मुझसे करते हैं “क़तील” इसलिये कुछ लोग हसद,
क्यों मेरे शेर हैं मक़बूल हसीनाओं में|

क़तील शिफ़ाई

मुहब्बत नहीं करने देते!

हमको आपस में मुहब्बत नहीं करने देते,
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में|

क़तील शिफ़ाई

किसी टूटे हुए दिल में होगा!

वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा,
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में|

क़तील शिफ़ाई

मेरे हाथ की रेखाओं में!

जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है,
उसको दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में|

क़तील शिफ़ाई

अब तो महंगाई के चर्चे हैं!

हौसला किसमें है यूसुफ़ की ख़रीदारी का,
अब तो महंगाई के चर्चे हैं ज़ुलैख़ाओं में|

क़तील शिफ़ाई

बंट न जाये तेरा बीमार!

जो भी आता है बताता है नया कोई इलाज,
बंट न जाये तेरा बीमार मसीहाओं में|

क़तील शिफ़ाई

मिलावट न करो छाँव में!

ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी थाके-हारे हो,
धूप की तुम तो मिलावट न करो छाँव में|

क़तील शिफ़ाई

बो न सके जो कभी सहराओं में!

उनको भी है किसी भीगे हुए मंज़र की तलाश,
बूँद तक बो न सके जो कभी सहराओं में|

क़तील शिफ़ाई

भँवर बांध लिये पाँवों में!

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में,
हमने ख़ुश होके भँवर बांध लिये पाँवों में|

क़तील शिफ़ाई

और जताया भी नहीं!

तुम तो शायर हो “क़तील” और वो इक आम सा शख़्स,
उसने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं|

क़तील शिफ़ाई