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Poetry

अखबारवाला!

श्री रघुवीर सहाय जी अपने समय के एक श्रेष्ठ कवि रहे हैं, बेबाक अंदाज़ में अपनी बात कहते थे, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ जिसे अज्ञेय जी ने शुरू किया था, उनके बाद उसके संपादक रघुवीर सहाय जी बने थे| खबरों के विश्लेषण के मामले में ‘दिनमान’ का अपना विशेष स्थान था|


रघुवीर सहाय जी के अनेक कविता संकलन प्रकाशित हुए हैं और उन्हें अनेक सम्मानों से विभूषित किया गया था|

लीजिए आज रघुवीर सहाय जी की यह कविता प्रस्तुत है –

धधकती धूप में रामू खड़ा है
खड़ा भुलभुल में बदलता पाँव रह रह
बेचता अख़बार जिसमें बड़े सौदे हो रहे हैं ।

एक प्रति पर पाँच पैसे कमीशन है,
और कम पर भी उसे वह बेच सकता है
अगर हम तरस खायें, पाँच रूपये दें
अगर ख़ैरात वह ले ले ।

लगी पूँजी हमारी है छपाई-कल हमारी है
ख़बर हमको पता है, हमारा आतंक है,
हमने बनाई है
यहाँ चलती सड़क पर इस ख़बर को हम ख़रीदें क्यो ?

कमाई पाँच दस अख़बार भर की क्यों न जाने दें ?

वहाँ जब छाँह में रामू दुआएँ दे रहा होगा
ख़बर वातानुकूलित कक्ष में तय कर रही होगी
करेगी कौन रामू के तले की भूमि पर कब्ज़ा ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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