अब के बरस भी यहीं से निकलेगा!

गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना,
जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा|

राहत इन्दौरी

डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा!

बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन,
जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा|

राहत इन्दौरी

ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा!

इसी गली में वो भूखा फ़क़ीर रहता था,
तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा|

राहत इन्दौरी

ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा!

मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर,
तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा|

राहत इन्दौरी

पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा!

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा,
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा|

राहत इन्दौरी

ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ!

इक न इक रोज़ कहीं ढूँढ ही लूँगा तुझको,
ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

कमज़ोर शाख़ें कि हिला भी न सकूँ!

फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन,
इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ!

फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया,
ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ!

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ,
ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

इक समुंदर कह रहा था-

मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया,
इक समुंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए|

राहत इंदौरी