ख्वाबों का मसअला भी है!

सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी,
हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है|

राहत इन्दौरी

पत्थर भी है खुदा भी है!

मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ,
मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है|

राहत इन्दौरी

भला ही नहीं, बुरा भी है!

जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है,
वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है|

राहत इन्दौरी

चारागर भी पुराना चाहिए था!

अपनी ग़ज़लों में एक खास तरह का ‘पंच’ लेकर आने वाले स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अक्सर अपने श्रोताओं को चौंका देते थे, ऐसी कोई बात अपनी शायरी में लेकर आते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की यह ग़ज़ल-



वफ़ा को आज़माना चाहिए था, हमारा दिल दुखाना चाहिए था,
आना न आना मेरी है मर्ज़ी, मगर तुमको बुलाना चाहिए था|

हमारी ख्वाहिश एक घर की थी, उसे सारा ज़माना चाहिए था,
मेरी आँखें कहाँ जी नम हुई थीं, समुन्दर को बहाना चाहिए था|

जहाँ पर पंहुचना मैं चाहता हूँ, वहां पे पंहुच जाना चाहिए था,
हमारा ज़ख्म पुराना बहुत है, चारागर भी पुराना चाहिए था|

मुझसे पहले वो किसी और की थी, मगर कुछ शायराना चाहिए था,
चलो माना ये छोटी बात है, पर तुम्हें सब कुछ बताना चाहिए था|

तेरा भी शहर में कोई नहीं था, मुझे भी एक ठिकाना चाहिए था,
कि किसको किस तरह से भूलते हैं, तुम्हें मुझको सिखाना चाहिए था|

ऐसा लगता है लहू में हमको, कलम को भी डुबाना चाहिए था,
तू मेरे साथ रहकर तंज़ ना कर, तुझे जाना था जाना चाहिए था|

क्या बस मैंने ही की है बेवफाई,जो भी सच है बताना चाहिए था,
मेरी बर्बादी पे वो यह चाहता है, मुझे भी मुस्कुराना चाहिए था|

बस एक तू ही मेरे साथ में है, तुझे भी रूठ जाना चाहिए था,
हमारे पास जो ये फन है मियां, हमें इससे कमाना चाहिए था|

अब ये ताज किस काम का है, हमें सर को बचाना चाहिए था,
उसी को याद रखा उम्र भर कि, जिसको भूल जाना चाहिए था|

मुझे बातें भी करनी थी उससे, गले से भी लगाना चाहिए था,
उसने प्यार से जब था बुलाया, हमें मर के भी जाना चाहिए था|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूं !

आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अपने सबसे अलग अंदाज़ ए बयां के लिए प्रसिद्ध थे| जो एक अलग प्रकार का ‘पंच’ उनकी रचनाओं में आता था वो पाठकों और श्रोताओं का मन मोह लेता था|

लीजिए प्रस्तुत है राहत इन्दौरी साहब की यह ग़ज़ल

मोम के पास कभी आग को लाकर देखूं
सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूं |

कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में
और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूं |

मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर
दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूं |

दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूं |

तेरे बारे में सुना ये है के तू सूरज है
मैं ज़रा देर तेरे साये में आ कर देखूं |

याद आता है के पहले भी कई बार यूं ही
मैने सोचा था के मैं तुझको भुला कर देखूं |

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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चांद पागल है!

आज राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, राहत साहब की शायरी में अक्सर एक ‘पंच’ होता है जो अचानक श्रोताओं को अपनी ओर खींच लेता है, कोई ऐसी बात जिसकी हम सामान्यतः कविता / शायरी में उम्मीद नहीं करते, जैसे आज की इस ग़ज़ल में ही- ‘चांद पागल है, अंधेरे की तरह में निकल पड़ता है’|

लीजिए आज राहत इन्दौरी जी की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-


रोज़ तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है|
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता है|

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता है|

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता है|

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता है|

उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तेरे घर में आईना भी है!

आज मैं स्वर्गीय राहत इन्दौरी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| ग़ज़ल की खूबसूरती इसमें होती है कि कम शब्दों में सादगी के साथ बड़ी बात कह दी जाती है और राहत इन्दौरी साहब इस काम में पूरी तरह माहिर थे|

लीजिए प्रस्तुत है ज़नाब राहत इन्दौरी साहब की यह ग़ज़ल-

जो मेरा दोस्त भी है, मेरा हमनवा भी है,
वो शख्स, सिर्फ भला ही नहीं, बुरा भी है|

मैं पूजता हूँ जिसे, उससे बेनियाज़ भी हूँ,
मेरी नज़र में वो पत्थर भी है खुदा भी है|

सवाल नींद का होता तो कोई बात ना थी,
हमारे सामने ख्वाबों का मसअला भी है|


जवाब दे ना सका, और बन गया दुश्मन,
सवाल था, के तेरे घर में आईना भी है?

ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन,
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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