शीशे के मकाँ कैसे हैं!

पत्थरों वाले वो इंसान वो बेहिस दर-ओ-बाम,
वो मकीं कैसे हैं शीशे के मकाँ कैसे हैं|

राही मासूम रज़ा

मिरे पैरों के निशाँ कैसे हैं!

ऐ सबा तू तो उधर ही से गुज़रती होगी,
उस गली में मिरे पैरों के निशाँ कैसे हैं|

राही मासूम रज़ा

ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं!

जिनसे हम छूट गए अब वो जहाँ कैसे हैं,
शाख़-ए-गुल कैसी है ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं|

राही मासूम रज़ा

मिरे प्यार ने सुलझाए हैं!

ज़िंदगी ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को,
उसके गेसू तो मिरे प्यार ने सुलझाए हैं|

राही मासूम रज़ा

लेकिन आग बरसती है!

दिल की खेती सूख रही है कैसी ये बरसात हुई,
ख़्वाबों के बादल आते हैं लेकिन आग बरसती है|

राही मासूम रज़ा

ख़्वाब देख डालो, इंक़िलाब लाओ!

ये चराग़ जैसे लम्हे कहीं राएगाँ न जाएँ,
कोई ख़्वाब देख डालो कोई इंक़िलाब लाओ|

राही मासूम रज़ा

जो अक्सर हमें याद आए हैं!

हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें,
हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं|

राही मासूम रज़ा

ज़ेहनों के वीराने लोग!

हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं,
हमको दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग|

राही मासूम रज़ा

आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग!

फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई,
फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग|

राही मासूम रज़ा