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एक जाला-सा समय की आँख में उतरा!

आज हिन्दी नवगीत के एक सशक्त हस्ताक्षर- श्री राजेन्द्र गौतम का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में सामान्य जन के लिए संघर्ष और आशावाद का संदेश दिया गया है| यह विश्वास व्यक्त किया गया है की परिस्थितियाँ कितनी ही विकट क्यों न हो, हम लोग मिलकर उनका सामना कर सकते हैं| इस अंधेरी सुरंग के पार रोशनी की सौगात अवश्य मिलेगी|


आइए इस नवगीत का आनंद लेते हैं-



यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा —
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।

सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे,
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है|

सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को,
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है|

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा,
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।


संखिया कोई —
कुओं में डाल जाता है,
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली|
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने,
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली|


पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे,
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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