अच्छी-सी जगह ढूंढ रहे हैं!

ईमां की तिजारत के लिए इन दिनों हम भी,
बाज़ार में अच्छी-सी जगह ढूंढ रहे हैं|

राजेश रेड्डी

अपना पता ढूंढ रहे हैं!

पहले तो ज़माने में कहीं खो दिया ख़ुद को,
आईने में अब अपना पता ढूंढ रहे हैं|

राजेश रेड्डी

अपना ख़ुदा ढूंढ रहे हैं!

पूजा में, नमाज़ों में, अज़ानों में, भजन में,
ये लोग कहाँ अपना ख़ुदा ढूंढ रहे हैं|

राजेश रेड्डी

सिरा ढूंढ रहे हैं!

दुनिया को समझ लेने की कोशिश में लगे हम,
उलझे हुए धागों का सिरा ढूंढ रहे हैं|

राजेश रेड्डी

वफ़ा ढूंढ रहे हैं!

इस अहद के इंसां मे वफ़ा ढूंढ रहे हैं,
हम ज़हर की शीशी मे दवा ढूंढ रहे हैं|

राजेश रेड्डी

शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही!

आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ शेयर और ग़ज़ल लेखक राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राजेश जी की कुछ ग़ज़लें मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की ग़ज़ल में उन्होंने यह व्यक्त किया है कि वर्तमान समय में लोगों को प्रभावित करने के लिए सच में झूठ की मिलावट बहुत जरूरी है और लोगों को खुद्दारी की काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


अपने सच में झूठ की मिक्दार थोड़ी कम रही ।
कितनी कोशिश की, मगर, हर बार थोड़ी कम रही ।

कुछ अना भी बिकने को तैयार थोड़ी कम रही,
और कुछ दीनार की झनकार थोड़ी कम रही ।

ज़िन्दगी ! तेरे क़दम भी हर बुलन्दी चूमती,
तू ही झुकने के लिए तैयार थोड़ी कम रही ।

सुनते आए हैं कि पानी से भी कट जाते हैं संग,
शायद अपने आँसुओं की धार थोड़ी कम रही ।

या तो इस दुनिया के मनवाने में कोई बात थी,
या हमारी नीयत-ए-इनकार थोड़ी कम रही ।

रंग और ख़ुशबू का जादू अबके पहले सा न था,
मौसम-ए-गुल में बहार इस बार थोड़ी कम रही ।


आज दिल को अक़्ल ने जल्दी ही राज़ी कर लिया
रोज़ से कुछ आज की तकरार थोड़ी कम रही ।

लोग सुन कर दास्ताँ चुप रह गए, रोए नहीं,
शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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किसको इल्ज़ाम दूँ मैं!

किसको इल्ज़ाम दूँ मैं किसको ख़तावार कहूँ,
मेरी बरबादी का बाइस तो छुपा है मुझमें|

राजेश रेड्डी

इक दश्त बचा है मुझमें!

इक ज़माना था कई ख्वाबों से आबाद था मैं,
अब तो ले दे के बस इक दश्त बचा है मुझमें|

राजेश रेड्डी

मैं समुन्दर हूँ उदासी का—

मैं समुन्दर हूँ उदासी का अकेलेपन का,
ग़म का इक दरिया अभी आके मिला है मुझमें|

राजेश रेड्डी

मुझसे ख़फ़ा है मुझमें!

हँसना चाहूँ भी तो हँसने नहीं देता मुझको,
ऐसा लगता है कोई मुझसे ख़फ़ा है मुझमें|

राजेश रेड्डी