जनता का दुलारा – शैलेन्द्र!

फिल्म संगीत से जुड़ी पोस्ट्स शेयर करने के क्रम में आज पुनः प्रस्तुत है जनकवि शैलेन्द्र जी पर पहले लिखी गई यह पोस्ट|

आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं।

मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि उनके बेटे राज कपूर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले हैं और उनसे फिल्म में गीत लिखने का अनुरोध किया। शैलेंद्र उस समय अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उन्होंने कहा कि वे फिल्म के लिए गीत नहीं लिखेंगे। पृथ्वीराज जी ने उनसे कहा कि जब उनका मन हो तब वे आकर मिल लें, अगर वे आएंगे तो उनको बहुत अच्छा लगेगा। इत्तफाक़ से वह घड़ी बहुत जल्द आ गई और हमारी फिल्मों को शैलेंद्र जैसा महान गीतकार मिल गया। सिर्फ इतना ही नहीं, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, शंकर जयकिशन का राजकपूर के साथ मिलकर एक ऐसा समूह बना, जिसने हमारी फिल्मों अनेक अविस्मरणीय गीत दिए, जिनमें सिर्फ महान विचार और भावनाएं नहीं अपितु आत्मा धड़कती है। संगीतकार के तौर पर इस समूह में कल्याण जी-आनंद जी और शायद लक्ष्मीकांत प्यारे लाल भी जुड़े। कुछ ऐसा संयोग बन गया कि शैलेंद्र अथवा हसरत गीत लिखेंगे, शंकर जयकिशन उसका संगीत देंगे, मुकेश उसके पुरुष कंठ होंगे और पर्दे पर पर राज कपूर की प्रस्तुति इस सभी का संयोग बनकर वह गीत अमर बन जाएगा-

तुम आज मेरे संग हंस लो
तुम आज मेरे संग गा लो,
और हंसते-गाते इस जीवन की
उलझी राह संवारो।

अथवा

तुम जो हमारे मीत न होते
गीत ये मेरे- गीत न होते।
तुम जो न सुनते,
क्यों गाता मैं,
दर्द से घुट कर रह जाता मैं।
सूनी डगर का एक सितारा-
झिलमिल झिलमिल रूप तुम्हारा।

एक बहुत बड़ी शृंखला है ऐसे गीतों की, जिनमें बहुत गहरी बात को बड़ी सादगी से कह दिया गया है। नशे का गीत है तो उसमें भी बड़ी सरलता से फिलॉसफी कह दी गई है-

मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूँ-
कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम
अब जरा आराम से आ-जा रहा है दम,
कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ।

है जरा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे, ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ।

शराबियों से ही जुड़ी एक और बात, वो रोज तौबा करते हैं और रोज भूल जाते हैं, इन बातों को इस गीत में कितनी खूबसूरती से कहा गया है-

याद आई आधी रात को, कल रात की तौबा,
दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा!

जीने भी न देंगे मुझे, दुश्मन मेरी जां के,
हर बात पे कहते हैं कि- इस बात की तौबा!

बातों में वफा और वो मर मिटने की कस्में,
क्या दौर था, उस दौर के जज़्बात की तौबा।

और फिर सादगी और मानवीयता के दर्शन से भरे ये गीत-

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-
जीना इसी का नाम है।

रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का,
जिंदा है हमीं से नाम प्यार का,
किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे,
मर के भी किसी को याद आएंगे,
कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है।

या फिर-

इन काली सदियों के सिर से, जब रात का आंचल ढ़लकेगा,
जब दुख के बादल छिटकेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी-
वो सुबह कभी तो आएगी।

एक और-

जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वर्ना गाली,
ये संतरी हमारा, ये पासबां हमारा।
चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।

और अंत में-

तुम्हारे महल- चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे,
अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,
न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।

ये सब मैंने कहा, कवि शैलेंद्र जी को याद करके, हालांकि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि जिन गीतों की पंक्तियां मैंने यहाँ लिखी हैं, उनमें कौन सा गीत शैलेंद्र जी का है, कौन सा नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये सभी गीत उसी परंपरा के हैं, जिसके शैलेंद्र जी प्रतिनिधि थे। हाँ इन सभी गीतों को मुकेश जी ने अपनी सीधे दिल में उतर जाने वाली आवाज़ दी है।

मुझे नहीं मालूम कि आपको यह आलेख कैसा लगेगा, लेकिन मुझे इस सफर से गुज़रकर बहुत अच्छा लगा और आगे भी जब मौका मिलेगा, मैं इस प्रकार की बातें करता रहूंगा। हर गीत की कुछ पंक्तियां लिखने के बाद मुझे लगा है कि जो पंक्तियां मैंने यहाँ नहीं दी हैं, उनको लिखता तो और अच्छा रहता। इन अमर गीतों की कुछ पंक्तियों के बहाने मैं शैलेंद्र जी को और इन गीतों से जुड़े सभी महान सर्जकों, कलाकारों को याद करता हूँ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तो मुश्किल होगी!

 एक बार फिर से आज मैं हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी का एक बहुत प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत फिल्म- ‘दिल ही तो है’ के लिए यह गीत साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा था और इसका संगीत रोशन साहब ने तैयार किया था|  

लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल, जो आज भी हमारे दिल में गूंजते है:

तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी|

अब अगर मेल नहीं है तो जुदाई भी नहीं
बात तोड़ी भी नहीं तुमने बनाई भी नहीं,
ये सहारा भी बहुत है मेरे जीने के लिये
तुम अगर मेरी नहीं हो तो पराई भी नहीं,
मेरे दिल को न सराहो तो कोई बात नहीं
गैर के दिल को सराहोगी, तो मुश्किल…

तुम हसीं हो, तुम्हें सब प्यार भी करते होंगे
मैं जो मरता हूँ तो क्या और भी मरते होंगे,
सब की आँखों में इसी शौक़ का तूफ़ां होगा
सब के सीने में यही दर्द उभरते होंगे,
मेरे ग़म में न कराहो तो कोई बात नहीं
और के ग़म में कराहोगी तो मुश्किल…


फूल की तरह हँसो, सब की निगाहों में रहो
अपनी मासूम जवानी की पनाहों में रहो,
मुझको वो दिन न दिखाना तुम्हें अपनी ही क़सम
मैं तरसता रहूँ तुम गैर की बाहों में रहो,
तुम जो मुझसे न निभाओ तो कोई बात नहीं
किसी दुश्मन से निभाओगी तो मुश्किल…

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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तुम्हारी मस्त नज़र!

आज मैं पुरानी फिल्म- ‘दिल ही तो है’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस फिल्म के नायक राज कपूर थे और उनकी नायिका नूतन थीं| इस फिल्म के लिए मुकेश जी ने ये प्यारा सा गीत गाया था|

आज का यह गीत साहिर लुधियानवी जी का लिखा हुआ है और इसे रोशन जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने बड़े मस्ती भरे अन्दाज़ में गाया था|

लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल –


तुम्हारी मस्त नज़र, गर इधर नहीं होती,
नशे में चूर फ़िज़ा इस क़दर नहीं होती|

तुम्हीं को देखने की दिल में आरज़ूएं हैं,
तुम्हारे आगे ही और ऊँची नज़र नहीं होती|

ख़फ़ा न होना अगर बढ़ के थाम लूँ दामन,
ये दिल फ़रेब ख़ता जान कर नहीं होती|

तुम्हारे आने तलक हम को होश रहता है,
फिर उसके बाद हमें कुछ खबर नहीं होती|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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कहता है जोकर!


कल भारतीय सिनेमा जगत के ‘सपनों के सौदागर’ राज कपूर जी का जन्म दिन था और उनके साथी और महान जनकवि शैलेन्द्र जी की पुण्य तिथि भी थी| एक दिन देर से ही सही मैं उन दोनों महान हस्तियों का पुण्य स्मरण करता हूँ|

शैलेन्द्र जी को ‘तीसरी कसम’ बनाने की उनकी धुन ले बैठी थी और राज कपूर साहब भी अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘मेरा नाम जोकर’ की असफलता के बाद बरबाद हो गए थे| उन्होंने अपनी पूरी पूंजी इस फिल्म पर लगा दी थी और उस समय यह फिल्म नहीं चल पाई थी|

मैंने कहीं पढ़ा था कि इस फिल्म की असफलता के बाद राज कपूर नशे की हालत में ख्वाजा अहमद अब्बास जी के पास गए और कहा कि ‘मुझे अब आप ही बचा सकते हो’| अब्बास साहब ने तब ‘बॉबी’ की स्क्रिप्ट लिखकर दी, इस फिल्म में राज कपूर के दोस्त रहे ‘प्राण’ जी ने एक रुपये में काम करना स्वीकार कर लिया और कहा कि अगर अच्छी कमाई हो जाए तो मुझे मेरी फीस दे देना| इसमें एक बड़ी भूमिका राज कपूर के साले प्रेम नाथ जी ने की और हीरो के लिए राजेश खन्ना जैसे स्टार को लेने की स्थिति में राज कपूर नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने बेटे ऋषि कपूर को यह रोल दिया और नई नवेली नायिका डिंपल कपाड़िया को इस फिल्म में लांच किया|

इस फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता प्राप्त की और राज कपूर फिर से समृद्ध हो गए| लेकिन इस फिल्म के बाद राज कपूर ने प्राण जी को एक लाख का चेक भेजा, जिस पर प्राण नाराज हो गए क्योंकि वे तब इससे कहीं अधिक फीस लेते थे, और इसके बाद उनकी दोस्ती भी टूट गई थी|

खैर लीजिए प्रस्तुत है ‘मेरा नाम जोकर’ फिल्म के लिए नीरज जी का लिखा यह गीत जिसे शंकर जयकीशन की जोड़ी के मधुर संगीत में मेरे प्रिय गायक मुकेश जी ने गाया था –

कहता है जोकर सारा ज़माना
आधी हक़ीकत आधा फ़साना
चश्मा उतारो, फिर देखो यारो
दुनिया नयी है, चेहरा पुराना
कहता है जोकर …

धक्के पे धक्का, रेले पे रेला
है भीड़ इतनी पर दिल अकेला
ग़म जब सताये, सीटी बजाना
पर मसखरे से दिल न लगाना
कहता है जोकर …

अपने पे हँस के जग को हँसाया
बन के तमाशा मेले में आया
हिन्दु न मुस्लिम, पूरब न पश्चिम
मज़हब है अपना हँसना हँसाना
कहता है जोकर …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल!

आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का एक बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, और इस गीत के माध्यम से ही मैं मुकेश जी, राज कपूर साहब और मजरूह सुल्तानपुरी साहब को भी याद कर रहा हूँ|

यह गीत फिल्म – ‘धरम करम’ से है, जिसमें राज कपूर साहब ने पहली बार अपने बेटे रणधीर कपूर के निर्देशन में काम किया था |

इस गीत का संगीत राहुल देव बर्मन जी ने तैयार किया था और मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत में जीवन जीने के तरीके के बारे में एक खूबसूरत संदेश भी दिया गया है| लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी के मधुर स्वर में तैयार किया गया यह सुरीला गीत:


इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल,
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल
इक दिन बिक जायेगा …

ला ला ललल्लल्ला

अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए
होनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए,
ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरी
फिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम,
धारा, जो बहती है, बहके रहती है
बहती धारा बन जा, फिर दुनिया से डोल
एक दिन …

परदे के पीछे बैठी साँवल गोरी
थाम के तेरे मेरे मन की डोरी,
ये डोरी ना छूटे, ये बन्धन ना टूटे
भोर होने वाली है अब रैना है थोड़ी, तरम्पम,
सर को झुकाए तू, बैठा क्या है यार
गोरी से नैना जोड़, फिर दुनिया से डोल
एक दिन …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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सारा जहां हमारा 6

पतला है हाल-ए-अपना, लेकिन लहू है गाढ़ा
फौलाद से बना है, हर नौजवाँ हमारा|


मिल-जुलके इस वतन को, ऐसा सजायेंगे हम
हैरत से मुँह तकेगा सारा जहाँ हमारा|


चीन-ओ-अरब हमारा …


वो सुबह कभी तो आएगी

सारा जहां हमारा 5

तालीम है अधूरी, मिलती नही मजूरी
मालूम क्या किसीको, दर्द-ए-निहाँ हमारा
चीन-ओ-अरब हमारा …

फिर सुबह होगी

सारा जहां हमारा 4

होने को हम कलन्दर, आते हैं बोरी बन्दर
हर एक कुली यहाँ का है राज़दाँ हमारा
चीन-ओ-अरब हमारा …

सारा जहां हमारा 3

जितनी भी बिल्डिंगें थीं, सेठों ने बाँट ली हैं
फ़ुटपाथ बम्बई के हैं आशियाँ हमारा|
चीन-ओ-अरब हमारा …

फिर सुबह होगी

सारा जहां हमारा 2

खोली भी छिन गई है, बेन्चें भी छिन गई हैं
सड़कों पे घूमता है अब कारवाँ हमारा
जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वरना गाली
वो सन्तरी हमारा, वो पासबाँ हमारा
चीन-ओ-अरब हमारा …


फिर सुबह होगी